<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>The Voice TV Feed</title><link>https://thevoicetv.in</link><description>The Voice TV Feed Description</description><item><title>भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स देशों ने एआई, डेटा साझाकरण और तकनीकी सहयोग पर बढ़ाया फोकस</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=54128</link><description>भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 के तहत भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (आईएनएसए) ने सतत विकास के लिए एआई का उपयोग और वैश्विक दक्षिण सहयोग को मजबूत करना विषय पर ब्रिक्स विज्ञान अकादमी फोरम 2026 की पहली बैठक का आयोजन किया। वर्चुअल माध्यम से आयोजित इस सम्मेलन में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका, बेलारूस, नाइजीरिया और वियतनाम सहित 10 देशों की विज्ञान अकादमियों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य जिम्मेदार, न्यायसंगत और समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) विकास के लिए साझा दृष्टिकोण तैयार करना था।
जिम्मेदार एआई विकास पर बनी सहमति
बैठक के दौरान विज्ञान और सतत विकास के लिए एआई संबंधी मसौदा घोषणापत्र की समीक्षा की गई और उसे और मजबूत बनाने पर सहमति बनी। प्रतिभागी देशों ने साझा कंप्यूटिंग अवसंरचना, सहयोगात्मक डेटा प्लेटफॉर्म और बहुभाषी एआई मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही संयुक्त कार्यबलों के गठन, शोधकर्ताओं की गतिशीलता बढ़ाने और ओपन-सोर्स वैज्ञानिक अवसंरचना को प्रोत्साहित करने का भी आह्वान किया गया। फोरम की दूसरी प्रत्यक्ष बैठक 22-23 जुलाई 2026 को आईआईटी हैदराबाद में आयोजित की जाएगी।
ब्रिक्स विज्ञान सहयोग में भारत की अग्रणी भूमिका
भारत वर्ष 2026 में लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण विषय के साथ ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। इसी क्रम में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी सदस्य और सहयोगी देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग को नई दिशा देने का कार्य कर रही है। आईएनएसए के अध्यक्ष प्रोफेसर शेखर सी. मांडे ने कहा कि यह मंच केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक दक्षिण में समावेशी और सतत विकास के लिए एआई को एक व्यावहारिक साधन बनाने का प्रयास है।
एआई क्षमता में असमानता कम करने पर फोकस
आईआईटी दिल्ली के लोक नीति संकाय के संस्थापक प्रमुख प्रोफेसर अंबुज सागर ने घोषणापत्र का मसौदा प्रस्तुत किया। इसमें विकसित और विकासशील देशों के बीच एआई क्षमता के असमान वितरण और बढ़ते डिजिटल अंतर को प्रमुख चुनौती बताया गया। मसौदे में सामग्री विज्ञान, औषधि विकास, जलवायु मॉडलिंग और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान को गति देने के लिए एआई के उपयोग पर जोर दिया गया, साथ ही यह सुनिश्चित करने की बात कही गई कि इसके लाभ वैश्विक दक्षिण के देशों तक समान रूप से पहुंचें।
विभिन्न देशों ने रखे अपने सुझाव
सम्मेलन में सहभागी देशों ने अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को साझा किया। चीन ने एआई तत्परता मानकों, वैज्ञानिक डेटा साझाकरण और जिम्मेदार एआई मूल्यांकन तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया। मिस्र ने खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने में एआई की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। इंडोनेशिया ने आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन नियंत्रण और टिकाऊ कृषि में एआई के उपयोग पर बल दिया, जबकि इथियोपिया ने साइबर सुरक्षा और डिजिटल संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता जताई। वियतनाम ने एआई कौशल विकास के लिए संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों और साझा डिजिटल अवसंरचना का प्रस्ताव रखा। नाइजीरिया ने राष्ट्रीय विकास और वैज्ञानिक नवाचार में एआई की भूमिका को रेखांकित किया, जबकि दक्षिण अफ्रीका और बेलारूस ने ओपन-सोर्स मॉडल, डेटा सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में एआई के जिम्मेदार उपयोग पर जोर दिया।
साझा प्राथमिकताओं पर बनी व्यापक सहमति
विचार-विमर्श के बाद आईएनएसए के उपाध्यक्ष (विज्ञान नीति) प्रोफेसर अनुराग अग्रवाल ने साझा कंप्यूटिंग अवसंरचना, खुले डेटा इकोसिस्टम, प्रौद्योगिकी संप्रभुता, ऊर्जा-कुशल डेटा केंद्रों, मानव संसाधन विकास और बहुभाषी एआई संसाधनों को प्रमुख साझा प्राथमिकताओं के रूप में चिन्हित किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से ब्रिक्स देश एआई के क्षेत्र में अधिक न्यायसंगत और समावेशी परिवर्तन ला सकते हैं, जिससे सतत विकास के लक्ष्यों को गति मिलेगी।
मानविकी और नैतिकता को भी मिलेगा महत्व
बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि एआई विकास केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं होना चाहिए। मानविकी और सामाजिक विज्ञान को भी इसका अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। प्रतिभागियों ने कहा कि विश्वसनीय एआई प्रणालियों के लिए मजबूत शासन ढांचा, नैतिक मानक और प्रभावी डेटा-साझाकरण तंत्र आवश्यक हैं।
घोषणापत्र को अंतिम रूप देने की तैयारी
बैठक में प्राप्त सुझावों को संशोधित मसौदा घोषणापत्र में शामिल किया जाएगा। आईएनएसए के कार्यकारी निदेशक डॉ. ब्रजेश पांडे ने बताया कि जुलाई में आईआईटी हैदराबाद में होने वाली अगली बैठक में घोषणापत्र को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि यह पहल वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करने, ज्ञान साझाकरण को बढ़ावा देने और एआई आधारित सतत विकास के लिए साझा रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। </description><guid>54128</guid><pubDate>10-Jun-2026 12:14:03 pm</pubDate></item><item><title>एप्पल ने लॉन्च किया Siri AI, पहले से ज्यादा स्मार्ट और सक्षम होगा असिस्टेंट</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=54038</link><description>एप्पल ने अपने वार्षिक वर्ल्डवाइड डेवलपर्स कॉन्फ्रेंस (डब्ल्यूडब्ल्यूडीसी) 2026 में आगामी सॉफ्टवेयर संस्करणों की घोषणा करते हुए अगली पीढ़ी के Apple Intelligence और नए Siri AI को पेश किया। कंपनी के अनुसार, नया Siri पहले की तुलना में अधिक बुद्धिमान, जानकार और सक्षम होगा।
एप्पल ने बताया कि iOS 27, iPadOS 27, macOS 27, watchOS 27, visionOS 27 और tvOS 27 के साथ उपयोगकर्ताओं को बेहतर प्रदर्शन, नया डिजाइन और अधिक सहज अनुभव मिलेगा। इसके साथ ही बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए नए पैरेंटल कंट्रोल फीचर्स भी जोड़े गए हैं।
एप्पल के सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग विभाग के वरिष्ठ उपाध्यक्ष क्रेग फेडेरिघी ने सम्मेलन में कहा, एप्पल उत्पाद लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इस वर्ष हम उपयोगकर्ताओं को और अधिक सक्षम बनाने के लिए नई शक्तिशाली सुविधाएं ला रहे हैं।
उन्होंने कहा, हम अपने सभी प्लेटफॉर्म पर Apple Intelligence की अगली पीढ़ी पेश कर रहे हैं। साथ ही Siri AI को अधिक बुद्धिमान, जानकार और सक्षम बनाया गया है। परिवारों के लिए नए सुरक्षा उपकरण और सॉफ्टवेयर को पहले से अधिक तेज, भरोसेमंद और उपयोगकर्ता अनुकूल बनाया गया है।
कंपनी के अनुसार, Apple Intelligence की नई संरचना उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता को सुरक्षित रखने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। इसी तकनीक के आधार पर नया Siri AI काम करेगा।
नया Siri AI उपयोगकर्ता की स्क्रीन पर मौजूद सामग्री से जुड़े सवालों का जवाब दे सकेगा, व्यक्तिगत संदर्भ को समझते हुए विभिन्न ऐप्स में जानकारी खोज सकेगा और इंटरनेट से ताजा जानकारी प्राप्त कर उपयोगी उत्तर तैयार करेगा।
इसके अलावा Apple Intelligence की नई क्षमताएं फोटो एडिटिंग, सफारी में कई टैब्स के बीच ब्राउजिंग, इमेज प्लेग्राउंड के जरिए रचनात्मक कार्य, मैसेज और मेल में बेहतर संवाद जैसी सुविधाओं को भी और उन्नत बनाएंगी।
बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एप्पल ने नए पैरेंटल कंट्रोल फीचर्स भी पेश किए हैं। कंपनी ने कहा कि अब माता-पिता आसानी से तय कर सकेंगे कि बच्चे कौन-से ऐप्स इस्तेमाल कर सकते हैं, किन लोगों से संपर्क कर सकते हैं और उन्हें ऐप्स तक कब पहुंच मिलेगी।
नए चाइल्ड अकाउंट सेटअप के जरिए अभिभावक आयु के अनुरूप सुरक्षा सुविधाएं सक्रिय कर सकेंगे। साथ ही वे यह भी नियंत्रित कर पाएंगे कि समय के साथ कौन-से नए ऐप्स बच्चों के लिए उपलब्ध हों।
कम्युनिकेशन सेफ्टी फीचर के तहत बच्चों के हर नए संपर्क को जोड़ने से पहले माता-पिता की अनुमति आवश्यक होगी। यदि किसी बातचीत में आपत्तिजनक या हिंसक सामग्री साझा की जाती है तो सिस्टम स्वतः हस्तक्षेप करेगा।
एप्पल वॉच के लिए भी कई नए फीचर्स पेश किए गए हैं। इनमें पांच Siri-सुझावित ऐप्स वाले नए डायनामिक ऐप ग्रिड, स्मार्ट स्टैक में नए टैप जेस्चर और एकीकृत फाइंड माई ऐप शामिल हैं, जिसमें डिवाइस, वस्तुएं और लोगों को खोजने की सुविधा एक ही स्थान पर मिलेगी।
कंपनी ने बताया कि नए फीचर्स डेवलपर प्रोग्राम के तहत परीक्षण के लिए आज से उपलब्ध हैं, जबकि सार्वजनिक बीटा संस्करण अगले महीने जारी किया जाएगा। </description><guid>54038</guid><pubDate>09-Jun-2026 11:24:40 am</pubDate></item><item><title>चंद्र मिशन में फैशन की एंट्री, NASA एस्ट्रोनॉट्स पहनेंगे प्राडा के लॉन्ग जॉन्स </title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=54014</link><description>इटैलियन फैशन हाउस प्राडा ने रविवार को NASA के एस्ट्रोनॉट्स के स्पेस में जाने के लिए इनर-लेयर गारमेंट पेश किया। यह ब्रांड की स्पेस इंडस्ट्री में कदम रखने वाली पहली बड़ी लग्ज़री कंपनी बनने की कोशिश को दिखाता है। ह्यूस्टन के स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर एक्सिओम स्पेस के साथ मिलकर बनाया गया यह बॉडी-हगिंग सूट, गारमेंट में बुने हुए वेंटिलेशन ट्यूब के साथ आता है। प्राडा के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर लोरेंजो बर्टेली ने प्राडा के मैनहट्टन स्टोर में एक इवेंट में कहा, हमारे पास सच में बहुत सारी काबिलियत और जानकारी है। वे नए लिक्विड कूलिंग और वेंटिलेशन गारमेंट पहने एक पुतले के बगल में बैठे थे। एक्सिओम स्पेस के CEO जोनाथन सिर्टेन ने कहा, स्पेस एक्सप्लोरेशन प्रोडक्ट्स को डेवलप करने की एक्सपर्टीज़ कई ऐसी इंडस्ट्रीज़ से आ सकती है जो एक-दूसरे से जुड़ी नहीं लगतीं। 
यह नया प्रोडक्ट 2024 में स्पेस फैशन में प्राडा की शानदार एंट्री के बाद आया है, जिसमें एक स्पेससूट दिखाया गया है। उम्मीद है कि इसका इस्तेमाल NASA के आर्टेमिस 3 अर्थ ऑर्बिट के लिए किया जाएगा, जिसे 2027 में लॉन्च किया जाना है, और 2028 में आर्टेमिस 4 की चांद पर लैंडिंग की उम्मीद है। लग्ज़री ब्रांड्स लंबे समय से स्पेस ट्रैवल से प्रेरणा लेते रहे हैं। लेकिन न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ़ बिज़नेस में लग्ज़री ब्रांड स्ट्रैटेजिस्ट और मार्केटिंग प्रोफेसर थोमई सेरदारी ने कहा कि जैसे-जैसे स्पेस एक्सप्लोरेशन और टूरिज्म इंडस्ट्री डेवलप हो रही हैं, प्राडा प्रेरणा से आगे बढ़कर एक असली पार्टनरशिप बन गई है। सेरदारी ने स्पेस इंडस्ट्री में प्राडा की दिलचस्पी को बढ़ाने वाले दो फैक्टर्स की ओर इशारा किया: उन अमीर कस्टमर्स तक पहुंच बनाना जो स्पेस ट्रैवल के बारे में सोच रहे हैं, और ब्रांड को अवांट-गार्डे सोच के साथ जोड़ना। 
जेफ बेजोस की ब्लू ओरिजिन से लेकर एलन मस्क की स्पेसएक्स तक, कंपनियों ने अमीर लोगों के लिए स्पेस टूरिज्म की ओर रुख किया है। बर्नस्टीन में लग्ज़री गुड्स के ग्लोबल हेड लुका सोलका ने कहा कि स्पेस एक्सप्लोरेशन और चांद पर इंसानों की यात्रा फिर से शुरू होने से बहुत लोगों का ध्यान ज़रूर जाएगा। उन्होंने कहा कि लग्ज़री ब्रांड्स को रेलिवेंट और विज़िबल बने रहने की ज़रूरत है। प्राडा का यह कदम ऐसे समय में आया है जब लग्ज़री गुड्स सेक्टर मुश्किल में है। दो साल की गिरावट के बाद, इंडस्ट्री में स्थिरता के संकेत दिख रहे थे, जब तक कि फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू नहीं हो गया, जिससे यात्रा में रुकावट आई और मिडिल ईस्ट से कहीं आगे लग्ज़री खर्च में कमी आई।

दूसरी फ़ैशन और कपड़ों की कंपनियाँ भी स्पेस की इस दौड़ में शामिल हो गई हैं। अंडर आर्मर ने स्पेस के कपड़े बनाने के लिए स्पेसफ़्लाइट कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक के साथ पार्टनरशिप की है, जबकि कोलंबिया स्पोर्ट्सवियर ने स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी इंट्यूटिव मशीन्स के साथ स्पेस फ़ैब्रिक टेक्नोलॉजी पर काम किया है। लेकिन यह साफ़ नहीं है कि क्या दूसरी लग्ज़री कंपनियाँ प्राडा की तरह आगे बढ़ेंगी। सेरदारी ने कहा, लग्ज़री में, कुछ करने वाला पहला व्यक्ति होना, ट्रेंड-सेटर बनना ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि LVMH की लुई वुइटन, हर्मीस और शनेल सभी स्पेस ट्रैवल में दिलचस्पी रखती हैं, लेकिन वे शायद आगे बढ़ने के नए तरीके ढूंढ लेंगी।
 </description><guid>54014</guid><pubDate>08-Jun-2026 1:44:27 pm</pubDate></item><item><title>NASA ने छह महीने की चुप्पी के बाद अपने मार्स मावेन स्पेसक्राफ्ट को मृत घोषित कर दिया  </title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53955</link><description>फ्लोरिडा (AP)  छह महीने की रेडियो चुप्पी के बाद, मंगल ग्रह के आस-पास NASA के मावेन स्पेसक्राफ्ट को डेड घोषित कर दिया गया है। स्पेस एजेंसी ने बुधवार को कन्फर्म किया कि एक दशक से ज़्यादा समय तक ऑब्ज़र्वेशन के बाद मिशन खत्म हो गया है। NASA के प्रोजेक्ट मैनेजर माइक मोरो ने कहा, टीम ने सच में मिशन के खत्म होने के साथ किसी अपने को खोने का एहसास किया। 2013 में ऑर्बिट से लाल ग्रह के एटमॉस्फियर की स्टडी करने के लिए लॉन्च किया गया मावेन, दिसंबर की शुरुआत में मंगल ग्रह के पीछे से गुज़रने के बाद रहस्यमयी तरीके से चुप हो गया। डेटा से पता चला कि स्पेसक्राफ्ट तेज़ी से घूमने लगा, जिससे उसका ऑर्बिट डिस्टर्ब हो गया और उसमें लगी बैटरी खत्म हो गईं। 
इस साल की शुरुआत में NASA द्वारा बुलाए गए एक रिव्यू बोर्ड ने यह नतीजा निकाला कि स्पेसक्राफ्ट बेकार है और उसे रिकवर नहीं किया जा सकता। उम्मीद है कि यह ग्रह से टकराने से पहले अगले 50 से 100 साल तक ऑर्बिट में रहेगा, जिससे तब तक दूसरे स्पेसक्राफ्ट को कोई दिक्कत नहीं होगी। समस्या किस वजह से हुई, इसकी जांच जारी है। पिछले साल मंगल ग्रह के मौसम की स्टडी करने और एक भटके हुए इंटरस्टेलर कॉमेट को देखने के अलावा, मावेन ने सतह पर NASA के क्यूरियोसिटी और पर्सिवेरेंस रोवर्स से जानकारी भेजने में मदद की। NASA के अधिकारियों ने कहा कि मंगल ग्रह के चारों ओर चार और स्पेसक्राफ्ट  दो U.S. और दो यूरोपियन सैटेलाइट  इस कमी को पूरा करेंगे, जिससे रोवर साइंस का कोई नुकसान नहीं होगा। मावेन के लीड साइंटिस्ट, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर की शैनन करी ने कहा, टीम इस बारे में ज़रूर परेशान है, लेकिन साथ ही हमें पिछले दस सालों में हासिल की गई साइंस पर बहुत गर्व है। करी ने कहा कि स्पेसक्राफ्ट ने साइंटिस्ट्स की मंगल ग्रह के एटमॉस्फियर और इवोल्यूशन की समझ को बढ़ाया।


 </description><guid>53955</guid><pubDate>07-Jun-2026 1:02:59 pm</pubDate></item><item><title>एआई से बढ़ेगी बिजली और पानी की मांग, यूएन ने दी चेतावनी</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53854</link><description>संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का बढ़ता उपयोग वर्ष 2030 तक इसकी बिजली खपत को दोगुना कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, तब एआई वैश्विक बिजली खपत का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा उपयोग करेगा और इससे होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ब्रिटेन के बराबर हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एआई आधारित डेटा केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी, जो दुनिया की पूरी आबादी की वार्षिक पेयजल जरूरतों के बराबर या उससे अधिक हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, एआई के बढ़ते उपयोग से जेवॉन्स पैरेडॉक्स की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसका अर्थ है कि किसी संसाधन के उपयोग में तकनीकी दक्षता बढ़ने के बावजूद उसकी कुल खपत घटने के बजाय बढ़ जाती है।
रिपोर्ट में बताया गया कि अर्थशास्त्री William Stanley Jevons ने 19वीं सदी के इंग्लैंड में कोयले के उपयोग के दौरान इस प्रभाव का अध्ययन किया था। कोयले के उपयोग में दक्षता बढ़ने से लागत कम हुई, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कुल मांग और खपत में वृद्धि हुई।
इसी प्रकार, जैसे-जैसे एआई मॉडल अधिक सस्ते और सुलभ होते जाएंगे, उनके नए उपयोग सामने आएंगे और कुल उपयोग बढ़ेगा, जिससे दक्षता से होने वाली बचत का लाभ समाप्त हो सकता है।
रिपोर्ट में जिम्मेदार एआई उपयोग के लिए एक रोडमैप भी सुझाया गया है, जो पारदर्शिता, डिजाइन स्तर पर दक्षता, समानता, जीवनचक्र जिम्मेदारी, वैश्विक सहयोग और संसाधनों के सतत उपयोग जैसे सिद्धांतों पर आधारित है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया भर के डेटा केंद्रों ने लगभग उतनी ही बिजली की खपत की जितनी सऊदी अरब ने की थी। यदि 2030 तक डेटा केंद्रों की बिजली खपत दोगुनी हो जाती है, तो उससे उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए 10 वर्षों तक 6.7 अरब पेड़ उगाने की आवश्यकता होगी।
इसके अलावा, रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक डेटा केंद्रों को लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की आवश्यकता होगी और उनके विस्तार के लिए Mexico City के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक भूमि की जरूरत पड़ेगी।
रिपोर्ट में डिजिटल और पर्यावरणीय असमानता को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि वर्तमान में केवल 32 देशों में एआई-विशिष्ट क्लाउड अवसंरचना मौजूद है, जबकि इसकी 90 प्रतिशत क्षमता अमेरिका और चीन में केंद्रित है।
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी कि एआई सेवाओं का उपयोग करने वाले देशों को खनिज संसाधनों के दोहन और इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों का भी सामना करना पड़ेगा।
रिपोर्ट में एआई मॉडल और उनके उपयोग से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों की नियमित जानकारी सार्वजनिक करने की सिफारिश की गई है। साथ ही कहा गया है कि जिम्मेदार एआई के लिए खनिजों के स्रोत से लेकर पुनर्चक्रण और सुरक्षित निपटान तक पूरी मूल्य श्रृंखला पर निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। </description><guid>53854</guid><pubDate>06-Jun-2026 11:56:06 am</pubDate></item><item><title>NASA ने MAVEN मिशन को कहा अलविदा, अनियंत्रित स्पिन के बाद मंगल यान से संपर्क टूटा</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53784</link><description>MAVEN को 18 नवंबर 2013 को लॉन्च किया गया था और यह 21 सितंबर 2014 को सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचा था। शुरुआत में इस मिशन को केवल एक वर्ष के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन इसने उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हुए 11 वर्षों से अधिक समय तक काम किया और वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराईं।
NASA के अनुसार, स्पेसक्राफ्ट से अंतिम संपर्क 6 दिसंबर 2025 को हुआ था। मंगल ग्रह के पीछे से गुजरने के बाद उसका सिग्नल अचानक बंद हो गया और फिर दोबारा स्थापित नहीं हो सका। इसके बाद एजेंसी ने स्थिति की समीक्षा और संभावित रिकवरी प्रयासों का आकलन करने के लिए फरवरी 2026 में एक विशेष एनोमली रिव्यू बोर्ड का गठन किया।
समीक्षा के बाद बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि MAVEN को दोबारा संचालित करना संभव नहीं है। शुरुआती जांच में पता चला है कि मंगल के पीछे से गुजरने के बाद स्पेसक्राफ्ट अनियंत्रित रूप से तेज गति से घूमने लगा, जिससे उसकी दिशा प्रभावित हुई और धीरे-धीरे उसकी बैटरी पूरी तरह खत्म हो गई। बैटरी समाप्त होने के कारण संचार प्रणाली ने काम करना बंद कर दिया और पृथ्वी से संपर्क टूट गया।
हालांकि, NASA ने स्पष्ट किया है कि इस तकनीकी गड़बड़ी के वास्तविक कारणों की जांच अभी जारी है और वर्ष के अंत तक एक विस्तृत अंतिम रिपोर्ट जारी की जा सकती है।
मिशन के समापन के साथ NASA अब MAVEN द्वारा एकत्र किए गए वैज्ञानिक आंकड़ों को सुरक्षित रूप से आर्काइव करने की प्रक्रिया पूरी कर रहा है, ताकि भविष्य में शोधकर्ता और वैज्ञानिक इन जानकारियों का उपयोग कर सकें।
NASA के प्लैनेटरी साइंस डिवीजन की निदेशक लुईस प्रॉक्टर के अनुसार, MAVEN मिशन से प्राप्त वैज्ञानिक डेटा भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव मिशनों की योजना बनाने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। विशेष रूप से यह जानकारी अंतरिक्ष यात्रियों को रेडिएशन से सुरक्षित रखने और उनकी सुरक्षा से जुड़े उपायों को बेहतर बनाने में मदद करेगी।
करीब 11 वर्षों तक सक्रिय रहने वाला MAVEN मिशन मंगल ग्रह के वातावरण को समझने और भविष्य के मानव अन्वेषण मिशनों की नींव मजबूत करने में NASA की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक माना जाता है। </description><guid>53784</guid><pubDate>05-Jun-2026 11:47:19 am</pubDate></item><item><title>अंतरिक्ष में बड़ी खोज: एक्सोप्लैनेट्स पर भी मिले पृथ्वी जैसे सुरक्षात्मक मैग्नेटिक फील्ड  </title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53695</link><description>सात बड़े और गर्म गैस वाले एक्सोप्लैनेट पर हवाओं के व्यवहार के आधार पर, एस्ट्रोनॉमर्स को अब तक का सबसे मज़बूत सबूत मिला है कि हमारे सोलर सिस्टम से बाहर के ग्रहों में भी मैग्नेटिक फील्ड होते हैं, जैसे पृथ्वी और हमारे सोलर सिस्टम के पाँच दूसरे ग्रह। चिली और हवाई में टेलिस्कोप से किए गए ऑब्ज़र्वेशन पर आधारित यह खोज, एक्सोप्लैनेट की समझ को और गहरा करती है, यह दिखाते हुए कि सोलर सिस्टम के आठ ग्रहों में से दो को छोड़कर बाकी सभी में कम से कम कुछ में एक ज़रूरी खासियत मौजूद है। मैग्नेटिक फील्ड एक ऐसा इनविज़िबल फोर्स फील्ड है जो किसी ग्रह के अंदर गहरे इलेक्ट्रिकली कंडक्टिंग मटीरियल - एक पिघले हुए मेटल कोर - की मूवमेंट और ग्रह के रोटेशन से बनता है। हालांकि इस स्टडी में शामिल कोई भी गैस वाला एक्सोप्लैनेट जीवन के लिए कैंडिडेट नहीं है, लेकिन मैग्नेटिक फील्ड उन फैक्टर्स में से एक हो सकता है जो पृथ्वी जैसे चट्टानी ग्रह को रहने लायक बनाने में मदद करता है।
 ये सभी एक्सोप्लैनेट एक बड़े और गर्म तारे के बहुत करीब ऑर्बिट करते हैं, जिसका एक हिस्सा हमेशा तारे की तरफ और दूसरा हिस्सा हमेशा दूसरी तरफ रहता है, जैसा कि चांद पृथ्वी की तरफ करता है। इस तरह के ग्रह को हॉट जुपिटर कहा जाता है क्योंकि इसका साइज़ और बनावट हमारे सोलर सिस्टम के सबसे बड़े ग्रह के बराबर है, हालांकि इसका टेम्परेचर बहुत ज़्यादा है। सातों ग्रहों का वज़न लगभग जुपिटर के बराबर से लेकर तीन गुना से भी ज़्यादा था। इन ग्रहों पर तेज़ हवाएँ गर्म दिन से ठंडे रात तक चलती हैं। ग्रहों की अपने होस्ट तारों के ऑर्बिटल पास होने की वजह से दिन के समय उनका एटमोस्फेरिक टेम्परेचर बहुत ज़्यादा होता है। सभी अपने होस्ट तारे के उतने ही करीब हैं जितना सोलर सिस्टम का सबसे अंदर का ग्रह मरकरी सूरज के।
 फ्रांस के नीस में ऑब्ज़र्वेटोएरे डे ला कोटे डी'ज़ूर की लैग्रेंज लेबोरेटरी की एस्ट्रोनॉमर जूलिया सीडेल, जो मंगलवार को नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में पब्लिश हुई स्टडी की लीड ऑथर हैं, ने कहा, आप उम्मीद करेंगे कि ज़्यादा गर्म टेम्परेचर वाले ग्रहों पर हवाएँ तेज़ होंगी। आप सिस्टम में जितनी ज़्यादा एनर्जी डालेंगे, हवाएँ उतनी ही तेज़ होंगी। लेकिन हम इसका उल्टा देखते हैं। सीडेल ने कहा, सबसे गर्म ग्रहों पर एटमॉस्फियर में सबसे कम तेज़ हवाएँ चलती हैं। और एटमॉस्फियर कैसे काम करते हैं, यह हमारी जानकारी के हिसाब से बहुत अजीब है। इसका मतलब है कि तारा ग्रह के एटमॉस्फियर में जो भी एनर्जी डालता है, उसे अलग तरीके से खर्च करना पड़ता है। और एटमॉस्फियर को इतनी तेज़ी से ब्रेक करने का एकमात्र तरीका मैग्नेटिक फील्ड और एटमॉस्फियर के चलते हुए चार्ज्ड पार्टिकल्स के साथ उसका इंटरेक्शन है।

सात एक्सोप्लैनेट पर हवा की स्पीड 15,500 मील प्रति घंटे (25,000 km प्रति घंटे) तक थी, जो जुपिटर से ज़्यादा तेज़ थी। यह देखते हुए कि हमारे सोलर सिस्टम के ज़्यादातर ग्रहों में मैग्नेटिक फील्ड हैं, रिसर्चर्स ने कहा कि यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि एक्सोप्लैनेट में भी होते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि साइंटिस्ट अब तक पक्के सबूत जुटाने में जूझ रहे थे। सीडेल ने कहा, हम किसी एक एक्सोप्लैनेट को नहीं देखते, बल्कि हम उनकी आबादी को देखते हैं और एक ट्रेंड उभरता हुआ देखते हैं। जुपिटर का मैग्नेटिक फील्ड हमारे सोलर सिस्टम में सबसे बड़ा और सबसे पावरफुल है। सात एक्सोप्लैनेट ने जुपिटर से छोटे मैग्नेटिक फील्ड बनाए, लेकिन आम तौर पर सोलर सिस्टम के ग्रहों के बराबर। मरकरी, सैटर्न, यूरेनस और नेपच्यून, पृथ्वी और जुपिटर के साथ सोलर सिस्टम के ऐसे ग्रह हैं जो ग्लोबल मैग्नेटिक फील्ड बनाते हैं। 
वीनस और मार्स दो ऐसे ग्रह हैं जिनमें मैग्नेटिक फील्ड नहीं है, हालांकि जुपिटर का एक बड़ा चांद, गैनीमीड, अपना मैग्नेटिक फील्ड बनाता है। पृथ्वी के चांद ने भी बहुत पहले अपना मैग्नेटिक फील्ड बनाया था। मैग्नेटिक फील्ड उन फैक्टर्स में से एक है जो यह तय करता है कि कोई ग्रह लंबे समय तक अपना एटमॉस्फियर बनाए रख पाता है या नहीं। उदाहरण के लिए, मार्स में कभी मैग्नेटिक फील्ड था, लेकिन अरबों साल पहले इसका अंदरूनी हिस्सा ठंडा होने के बाद यह खत्म हो गया, और अब इसका एटमॉस्फियर बहुत कमज़ोर है और यह रहने लायक नहीं है। जर्मनी में यूरोपियन सदर्न ऑब्ज़र्वेटरी की एस्ट्रोनॉमर और स्टडी की को-ऑथर बिबियाना प्रिनोथ ने कहा, हालांकि यह एक आम गलतफहमी है कि मैग्नेटिक फील्ड सीधे यह तय करते हैं कि कोई ग्रह रहने लायक है या नहीं, लेकिन वे समय के साथ किसी ग्रह के विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं, जीवन एटमॉस्फियर पर निर्भर करता है। एटमॉस्फियर सतह पर प्रेशर बनाए रखने, टेम्परेचर को रेगुलेट करने और पृथ्वी पर, सतह पर लिक्विड पानी को मौजूद रहने में मदद करता है।
 </description><guid>53695</guid><pubDate>04-Jun-2026 11:59:36 am</pubDate></item><item><title>रुद्रम-II मिसाइल का सफल परीक्षण, भारत की रक्षा क्षमता को मिली नई मजबूती</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53648</link><description>रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय वायु सेना (आईएएफ) ने स्वदेशी रूप से विकसित अत्याधुनिक रुद्रम-II वायु-से-सतह मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया है। चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों में किए गए इस परीक्षण ने मिसाइल की सटीकता, विश्वसनीयता और उसकी सभी प्रमुख प्रणालियों की क्षमता को प्रमाणित किया।
सभी लक्ष्यों पर सटीक प्रहार
परीक्षण के दौरान प्रक्षेपित की गई सभी मिसाइलों ने अपने पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों पर अत्यंत सटीकता के साथ प्रहार किया। चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (आईटीआर) द्वारा तैनात उन्नत ट्रैकिंग और रेंज उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों ने पुष्टि की कि परीक्षण के सभी निर्धारित उद्देश्य पूरी तरह सफल रहे।
स्वदेशी तकनीक से विकसित हुई रुद्रम-II
रुद्रम-II मिसाइल का विकास हैदराबाद स्थित डीआरडीओ की नोडल प्रयोगशाला इमारत अनुसंधान केंद्र (आरसीआई) ने किया है। इसके विकास में रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (डीआरडीएल), उच्च ऊर्जा सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला (एचईएमआरएल), शस्त्र अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एआरडीई) तथा एकीकृत परीक्षण रेंज सहित कई प्रयोगशालाओं ने सहयोग किया।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान
इस परियोजना में विकास सह उत्पादन साझेदारों (डीसीपीपी) के अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), क्षेत्रीय सैन्य विमानन योग्यता केंद्र, मिसाइल प्रणाली गुणवत्ता आश्वासन एजेंसी और विभिन्न उद्योगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संस्थानों के सहयोग से मिसाइल के विकास और परीक्षण को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।
राजनाथ सिंह ने दी बधाई
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रुद्रम-II के सफल परीक्षण के लिए डीआरडीओ, भारतीय वायु सेना, रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और उद्योग जगत के सभी सहयोगियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों की बढ़ती परिपक्वता, विश्वसनीयता और क्षमता का प्रमाण है।
आत्मनिर्भर रक्षा क्षेत्र को मिलेगा बल
रक्षा मंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि उन्नत हथियार प्रणालियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को और मजबूत करेगी तथा देश की रक्षा तैयारियों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
वैज्ञानिकों और तकनीकी टीमों की सराहना
रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष ने इस उपलब्धि से जुड़े सभी वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और परिचालन टीमों को बधाई देते हुए इसे देश की रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। </description><guid>53648</guid><pubDate>03-Jun-2026 2:05:25 pm</pubDate></item><item><title>Apple के सस्ते और हल्के Vision Pro का इंतजार लंबा, 2028 तक लॉन्च की संभावना  </title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53583</link><description>Apple अपने Vision Pro हेडसेट के एक सस्ते और हल्के उत्तराधिकारी पर काम जारी रखे हुए है, लेकिन इस अगली पीढ़ी के डिवाइस के 2028 के अंत या 2029 से पहले आने की संभावना नहीं है।Mac Rumours के अनुसार, Apple अभी भी Vision Pro के एक फॉलो-अप पर विचार कर रहा है, जिसे कंपनी के प्रीमियम मिक्स्ड-रियलिटी हेडसेट के तौर पर पेश किया गया था। हालाँकि, यह प्रोजेक्ट एक लंबी समय-सीमा पर चलता हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि Apple दो मुख्य चुनौतियों को हल करने पर काम कर रहा है: डिवाइस का वज़न कम करना और उसकी कीमत घटाना।
Mac Rumours के अनुसार, Apple को Vision Pro के लिए एक ज़्यादा पतला डिज़ाइन विकसित करने की ज़रूरत है - जिसकी मौजूदा कीमत USD 3,499 है - ताकि वह इस श्रेणी में सार्थक वापसी कर सके। Mac Rumours द्वारा प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, जब तक ये लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते, तब तक हेडसेट का कारोबार मूल रूप से ठंडे बस्ते में है। Vision Pro का नियोजित उत्तराधिकारी, लंबे समय से चर्चा में रहे Vision Air से अलग है।
 बताया जाता है कि उस प्रोजेक्ट को पिछले साल रद्द कर दिया गया था। हालाँकि भविष्य के Vision हेडसेट पर काम जारी है, लेकिन Apple का तत्काल ध्यान कथित तौर पर स्मार्ट ग्लास पर चला गया है। Mac Rumours के अनुसार, कंपनी की स्मार्ट ग्लास पहल अब मुख्य फोकस बन गई है, और Vision Products Group के पूर्व सदस्यों को इस प्रयास के लिए फिर से नियुक्त किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, Apple अब अपने पहले स्मार्ट ग्लास को 2027 के अंत तक जारी करने का लक्ष्य बना रहा है। यह नवीनतम अपडेट, अक्टूबर 2025 में Vision Pro लाइनअप को Apple द्वारा ताज़ा किए जाने के बाद आया है, जब कंपनी ने अपने M5 चिप द्वारा संचालित हेडसेट का एक अपडेटेड संस्करण पेश किया था। 
रिपोर्ट की गई समय-सीमा से पता चलता है कि Apple की व्यापक वियरेबल कंप्यूटिंग रणनीति में निकट भविष्य में स्मार्ट ग्लास को प्राथमिकता दी जा सकती है, जबकि अधिक सुलभ Vision Pro उत्तराधिकारी का विकास पर्दे के पीछे जारी रहेगा।
 </description><guid>53583</guid><pubDate>02-Jun-2026 5:27:47 pm</pubDate></item><item><title>एनवीडिया के उन्नत चिप निर्यात पर अमेरिका ने कसा शिकंजा</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53517</link><description>अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने उन खामियों को बंद करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके जरिए एनवीडिया के अत्याधुनिक एआई चिप चीन के बाहर स्थित चीनी कंपनियों की सहायक इकाइयों तक पहुंच रहे थे।
नए दिशा-निर्देशों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद मलेशिया जैसे देशों में मौजूद चीनी एआई कंपनियों की विदेशी इकाइयां उन्नत एआई चिप हासिल कर रही थीं। अमेरिका लंबे समय से चीन की उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमताओं को सीमित करने के लिए अत्याधुनिक सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति पर नियंत्रण लगाने का प्रयास कर रहा है।
मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, वाशिंगटन में इस खामी से संबंधित एक दस्तावेज प्रसारित होने के बाद वाणिज्य विभाग ने अपनी वेबसाइट पर नया मार्गदर्शन जारी किया। रॉयटर्स द्वारा देखे गए दस्तावेज में कहा गया था कि इस व्यवस्था से चुपचाप दरवाजे खुल गए हैं।
यह स्पष्ट नहीं है कि पिछले एक वर्ष में कितने चिप निर्यात किए गए, लेकिन सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़े एक जानकार सूत्र का अनुमान है कि यह संख्या लाखों में नहीं तो कम से कम कई लाख तक पहुंच सकती है।
वाणिज्य विभाग के ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड सिक्योरिटी (बीआईएस) ने स्पष्ट किया है कि चीन में मुख्यालय वाली कंपनियों की विदेश स्थित इकाइयों को उन्नत एआई चिप निर्यात करने के लिए भी लाइसेंस की आवश्यकता होगी।
बीआईएस के एक प्रवक्ता ने कहा, यह मार्गदर्शन 2023 से लागू लाइसेंस संबंधी आवश्यकताओं को स्पष्ट करने के लिए जारी किया गया है। महत्वपूर्ण अमेरिकी प्रौद्योगिकी की सुरक्षा के लिए निर्यात नियंत्रण नियमों को सख्ती से लागू किया जाएगा।
हालांकि, एनवीडिया के एक अधिकारी ने कहा कि इस नए मार्गदर्शन से कंपनी की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि वाणिज्य विभाग पहले ही पत्र के माध्यम से ऐसे चिप निर्यात पर लाइसेंस की अनिवार्यता लागू कर चुका था।
एक अन्य प्रमुख चिप निर्माता एएमडी ने इस विषय पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
यह खामी तब पैदा हुई थी जब मई 2025 में ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की थी कि वह बाइडन प्रशासन के अंतिम दिनों में जारी एआई डिफ्यूजन नियम को लागू नहीं करेगा। इस नियम के तहत एआई चिप्स की वैश्विक पहुंच पर लाइसेंस आधारित नियंत्रण निर्धारित किया गया था।
पूर्व अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस मैकगायर ने कहा कि इस खामी के कारण चीनी कंपनियों की विदेशी सहायक इकाइयां बिना लाइसेंस के एनवीडिया के ब्लैकवेल चिप खरीद सकती थीं।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। चीनी कंपनियां बड़े पैमाने पर इन चिप्स की खरीद कर रही थीं।
मैकगायर के अनुसार नया मार्गदर्शन इस खामी को तो बंद करता है, लेकिन एक अन्य समस्या अभी भी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि ताइवान की टीएसएमसी और अन्य फाउंड्री कंपनियों के लिए उच्च स्तरीय एआई चिप्स के अंतिम उपयोगकर्ताओं की अतिरिक्त जांच की अनिवार्यता अब भी स्पष्ट रूप से लागू नहीं की गई है।
टीएसएमसी के प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
इसके अलावा, नए दिशा-निर्देशों में डेटा सेंटरों को पहले से उपयोग किए जा रहे चिप्स को बंद करने या उनसे जुड़ी सेवाएं रोकने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है। </description><guid>53517</guid><pubDate>01-Jun-2026 4:24:31 pm</pubDate></item><item><title>वैज्ञानिकों ने स्वच्छ और ऊर्जा-कुशल रासायनिक विनिर्माण के लिए प्रकाश-संचालित नैनो-उत्प्रेरक विकसित किए हैं।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53460</link><description>इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के शोधकर्ताओं ने एक नवीन प्रकाश-चालित नैनो-उत्प्रेरक विकसित किया है जो विषाक्त विलायकों और उच्च तापमान प्रक्रियाओं पर निर्भरता को कम करके दवाओं और औद्योगिक रसायनों के निर्माण को स्वच्छ, तेज और अधिक ऊर्जा कुशल बना सकता है।
शोध दल ने सोने और पैलेडियम नैनोकणों को BODIPY नामक प्रकाश-अवशोषित अणु के साथ मिलाकर एक संकर नैनोमिश्रित पदार्थ विकसित किया। यह पदार्थ प्रकाश-संचालित उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है, जो प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके रासायनिक अभिक्रियाओं को पारंपरिक उत्प्रेरक प्रणालियों की तुलना में अधिक कुशलता से गति प्रदान करता है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, यह तकनीक उद्योगों को प्रदूषण, ऊर्जा खपत और विनिर्माण प्रक्रियाओं में हानिकारक रसायनों के उपयोग को कम करने में मदद कर सकती है।
नैनोस्केल नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि सिस्टम में मौजूद सोने के नैनोकण प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और इसे BODIPY अणु में स्थानांतरित करते हैं, जो फिर उस ऊर्जा को पैलेडियम को देता है - जो रासायनिक प्रतिक्रिया को संचालित करने वाला सक्रिय उत्प्रेरक है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि सोने, बीओडीपी और पैलेडियम की संयुक्त परस्पर क्रिया से एक अधिक कुशल उत्प्रेरक प्रक्रिया बनती है, जो इन तीनों घटकों द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त की जा सकने वाली प्रक्रिया से कहीं अधिक प्रभावी है।
नैनो-उत्प्रेरक प्रतिक्रियाओं को हल्के और पर्यावरण के अनुकूल परिस्थितियों में होने की अनुमति देता है, जिसमें जहरीले विलायकों के स्थान पर पानी का उपयोग और ऊर्जा-गहन तापन प्रणालियों के स्थान पर प्रकाश का उपयोग शामिल है।
इस तकनीक को डॉ. प्रकाश पी. नीलकांतन ने विकसित किया है और इससे दवाओं और औद्योगिक रसायनों के स्वच्छ और अधिक लागत प्रभावी उत्पादन में सहायता मिलने की उम्मीद है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि यह विकास दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ औद्योगिक प्रथाओं, कम ऊर्जा उपयोग और सस्ती हरित प्रौद्योगिकियों तक बेहतर पहुंच में योगदान दे सकता है। </description><guid>53460</guid><pubDate>31-May-2026 12:51:58 pm</pubDate></item><item><title>31 मई को फुल-मून : अपने मोबाइल से लीजिए चांद की बेहतरीन फोटो, नासा ने शेयर किए फोटोग्राफी टिप्स</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53399</link><description>आसमान में एक बार फिर खूबसूरत नजारा यानी कि फुल मून 31 मई को देखने को मिलेगा। इस रात चांद की खूबसूरत तस्वीर हर कोई अपने मोबाइल में कैद करना चाहेगा, लेकिन स्मार्टफोन से चांद की अच्छी तस्वीरें लेने में कई चुनौतियां भी हैं। आमतौर पर स्मार्टफोन से ली गई चांद की तस्वीर एक धुंधले सफेद धब्बे या रोशनी के गोले जैसी दिखती है। अगर ऐसा आपके साथ भी होता है, तो निराश बिल्कुल भी न हों। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मोबाइल फोटोग्राफी के कुछ ऐसी टिप्स बताई हैं, जिन्हें अपनाकर हर कोई चांद की खूबसूरत तस्वीर ले सकता है।
नासा के अनुसार, चांद की तस्वीर लेने के लिए आपका फोन बिल्कुल स्थिर रहना चाहिए। यदि आपके पास ट्राइपॉड नहीं है, तो फोन को किसी दीवार या अन्य स्थिर वस्तु के सहारे रख दें। इसके बाद तस्वीर की कंपोजिशन पर ध्यान दें। चांद को फ्रेम करने, उसे कोई संदर्भ देने या तस्वीर को अधिक आकर्षक बनाने के लिए आसपास मौजूद वस्तुओं का उपयोग किया जा सकता है।
चांद की फोटो खींचते समय अपने फोन का फ्लैश हमेशा बंद रखें और कैमरे का फोकस आसमान के बजाय सीधे चांद पर करें। इसके लिए स्क्रीन पर जहां चांद दिखाई दे रहा हो, वहां टैप करें। इसके बाद ब्राइटनेस को थोड़ा कम कर दें। चांद को एकदम सफेद और अत्यधिक चमकीला दिखाने के बजाय उसकी प्राकृतिक बनावट बनाए रखने की कोशिश करें, ताकि उसकी सतह के निशान और डिटेल्स साफ नजर आ सकें। इससे तस्वीर अधिक प्रभावशाली और आकर्षक लगती है।
अगर आपके फोन में फोटो टाइमर की सुविधा है, तो उसका इस्तेमाल करें। इससे तस्वीर खींचते समय फोन को छूने या उसके हिलने-डुलने की संभावना कम हो जाती है।
बेहतरीन तस्वीर लेने के लिए सही समय का चुनाव भी बेहद जरूरी है। चांद की फोटोग्राफी के लिए बिल्कुल घने अंधेरे के बजाए आप अपनी फोटो शाम के धुंधलके या भोर के समय लें। इस समय आसमान और चांद की रोशनी में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता, जिससे आपके फोन का कैमरा फोटो को बेहतर तरीके से कैप्चर कर पाएगा। इसके अलावा, जब चांद क्षितिज से ऊपर उठ रहा होता है, तब वह अपेक्षाकृत बड़ा दिखाई देता है, इसलिए उस समय भी अच्छी तस्वीरें ली जा सकती हैं।
अगर आपके फोन में ऑप्टिकल जूम है, तभी उसका इस्तेमाल करें। डिजिटल जूम वास्तव में तस्वीर को केवल क्रॉप करता है, जिससे उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। ऐसे में आप चाहें तो प्रयोग के तौर पर चांद को फोकस करके जूम कर सकते हैं। एक-दो फोटो क्लिक से यह अंदाजा लग सकता है कि जूम करना आपके लिए बेहतर रहेगा या नहीं।
यदि आपके फोन में प्रो मोड या मैनुअल मोड उपलब्ध है, तो आईएसओ सेटिंग को कम रखें, ताकि तस्वीर में नॉइस न आए। अगर संभव हो, तो शटर स्पीड के साथ भी प्रयोग करें, ताकि चांद की रोशनी सही तरीके से तस्वीर में कैद हो सके। शुरुआत में शटर स्पीड तेज रखें और फिर आवश्यकता के अनुसार उसे समायोजित करें। ध्यान रहे कि जितनी धीमी शटर स्पीड होगी, उतना ही मोबाइल का स्थिर रहना महत्वपूर्ण होता जाएगा।
अगर आपके पास टेलीस्कोप (दूरबीन) उपलब्ध है, तो आप अपने फोन को उसके आई-पीस (आंख से देखने वाली जगह) पर सावधानीपूर्वक टिका सकते हैं। सही तरीके से सेट करने पर आप चांद की बेहद साफ और स्पष्ट तस्वीर खींच सकते हैं। </description><guid>53399</guid><pubDate>30-May-2026 11:01:56 am</pubDate></item><item><title>इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप के प्रीमियम फीचर्स अब होंगे पेड</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53323</link><description>मेटा ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग के तरीके में बड़ा बदलाव करते हुए इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप के लिए नए पेड सब्सक्रिप्शन प्लान लॉन्च करने की तैयारी की है। इन योजनाओं के तहत उपयोगकर्ताओं को विशेष प्रीमियम फीचर्स उपलब्ध कराए जाएंगे, जिनका लाभ सामान्य उपयोगकर्ताओं को नहीं मिलेगा।
कंपनी ने अपने ऐप्स के प्लस संस्करण पेश किए हैं, जिनके जरिए भुगतान करने वाले उपयोगकर्ताओं को उन्नत टूल्स, अतिरिक्त कस्टमाइजेशन विकल्प और अधिक दृश्यता से जुड़े फीचर्स मिलेंगे।
यह कदम विज्ञापन आधारित आय पर निर्भरता कम करते हुए मासिक सदस्यता के जरिए नए राजस्व स्रोत विकसित करने की मेटा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
इंस्टाग्राम प्लस और फेसबुक प्लस की कीमत 3.99 डॉलर प्रति माह (करीब 387 रुपये) रखी गई है, जबकि व्हाट्सऐप प्लस के लिए 2.99 डॉलर प्रति माह (करीब 290 रुपये) शुल्क तय किया गया है। हालांकि, भारत के लिए आधिकारिक कीमतों की अभी घोषणा नहीं की गई है।
टेकक्रंच की रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टाग्राम प्लस उपयोगकर्ताओं को कई विशेष सुविधाएं मिलेंगी। इनमें यह देखने की सुविधा शामिल होगी कि उनकी स्टोरी को कितने लोगों ने दोबारा देखा। साथ ही, मौजूदा क्लोज फ्रेंड्स विकल्प से आगे बढ़कर असीमित स्टोरी ऑडियंस सूची बनाने की सुविधा भी मिलेगी।
प्रीमियम उपयोगकर्ता बिना दर्शक सूची में दिखाई दिए किसी की स्टोरी देख सकेंगे। इसके अलावा स्टोरी को 24 घंटे की मौजूदा समय सीमा से अधिक समय तक रखने और हर सप्ताह एक स्टोरी को अतिरिक्त दृश्यता के लिए प्रमुखता से प्रदर्शित करने की सुविधा भी मिलेगी।
सब्सक्राइबर स्टोरी देखने वालों की सूची में खोज कर सकेंगे और प्रोफाइल तथा हाइलाइट्स पर सीधे पोस्ट साझा कर सकेंगे, बिना उन्हें फॉलोअर्स की मुख्य फीड में दिखाए।
मेटा प्रीमियम उपयोगकर्ताओं के लिए कुछ अतिरिक्त डिजाइन और कस्टमाइजेशन फीचर्स भी ला रहा है। इंस्टाग्राम प्लस उपयोगकर्ताओं को एनिमेटेड सुपर हार्ट रिएक्शन, बायो के लिए विशेष फॉन्ट, कस्टम ऐप आइकन और प्रोफाइल पिन करने के अतिरिक्त विकल्प मिलेंगे।
फेसबुक प्लस में भी इसी तरह के प्रीमियम फीचर्स दिए जाने की उम्मीद है, जबकि व्हाट्सऐप प्लस का फोकस मैसेजिंग अनुभव को बेहतर बनाने पर रहेगा।
व्हाट्सऐप प्लस उपयोगकर्ताओं को कस्टम चैट थीम, विशेष रिंगटोन, प्रीमियम स्टिकर्स, अतिरिक्त पिन की गई चैट और उन्नत सूची कस्टमाइजेशन फीचर्स उपलब्ध होंगे।
इंस्टाग्राम पर साझा की गई जानकारी में मेटा की प्रोडक्ट प्रमुख नाओमी ग्लाइट ने संकेत दिया है कि भविष्य में सब्सक्राइबरों के लिए और भी नए फीचर्स जोड़े जाएंगे।
मेटा ने स्पष्ट किया है कि ये सब्सक्रिप्शन उसकी मौजूदा मेटा वेरिफाइड सेवा से अलग हैं। मेटा वेरिफाइड के तहत पहचान सत्यापन, प्रतिरूपण से सुरक्षा और ग्राहक सहायता जैसी सेवाएं प्रदान की जाती हैं।
कंपनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित सेवाओं के क्षेत्र में भी अपने पेड ऑफर का विस्तार कर रही है। इसके तहत मेटा वन नामक नया सब्सक्रिप्शन इकोसिस्टम विकसित किया जा रहा है, जिसमें एआई, कंटेंट क्रिएटर और व्यवसायों के लिए विशेष टूल्स शामिल होंगे। </description><guid>53323</guid><pubDate>29-May-2026 11:54:30 am</pubDate></item><item><title>चंद्रमा पर दोबारा बसने की होड़ के बीच नासा ने चंद्र शहर के लिए अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53268</link><description>नासा ने चंद्रमा पर मानव की स्थायी उपस्थिति स्थापित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी दीर्घकालिक योजना की रूपरेखा तैयार की है, जो अपोलो युग के अल्पकालिक मिशनों से हटकर एक स्थायी चंद्र बस्ती के विकास की ओर एक बदलाव का संकेत है।
मंगलवार को नासा मुख्यालय में एक प्रस्तुति के दौरान, एजेंसी के अधिकारियों ने एक चंद्रमा बेस की योजनाओं का वर्णन किया, जिसमें अंततः सड़कें, रोबोटिक वाहन, ड्रोन, संचार प्रणाली, बिजली का बुनियादी ढांचा और अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बड़े क्षेत्रों में रहने और काम करने की व्यवस्था शामिल हो सकती है।
चंद्रमा पर बना बेस अमेरिका और मानवता की किसी अन्य खगोलीय दुनिया पर पहली चौकी होगी, नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने कार्यक्रम के दौरान कहा, जहां चंद्र लैंडर और रोबोटिक प्रणालियों के स्केल मॉडल प्रदर्शित किए गए थे।
नासा के अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि यह पहल एक बड़े अड्डे के निर्माण के बजाय कई मिशनों, प्रयोगों और रोबोटिक अभियानों के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होगी।
चंद्रमा पर बना बेस जितना खूबसूरत है, उतना ही प्रतिकूल भी है, आइज़ैकमान ने कहा, यह बताते हुए कि चंद्र सतह पर तापमान सूर्य के प्रकाश में 250 डिग्री से ऊपर से लेकर अंधेरे में माइनस 200 डिग्री से नीचे तक हो सकता है।
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव नासा के लिए एक प्रमुख फोकस क्षेत्र के रूप में उभरा है क्योंकि इस क्षेत्र में स्थायी रूप से छायादार क्रेटर्स में पानी की बर्फ होने का अनुमान है, जो अंतरिक्ष यात्रियों को बनाए रखने और भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए रॉकेट ईंधन का उत्पादन करने के लिए महत्वपूर्ण संसाधन माना जाता है।
हालांकि, अधिकारियों ने स्वीकार किया कि चंद्रमा के वातावरण के कई पहलुओं को अभी भी ठीक से समझा नहीं गया है।
हमें हर दिन इस बात का एहसास होता है कि हम चंद्रमा की सतह के बारे में कितना कम जानते हैं, मून बेस कार्यक्रम के कार्यकारी कार्लोस गार्सिया गोलन ने कहा।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, नासा ने कहा कि वह निजी उद्योगों के साथ साझेदारी पर काफी हद तक निर्भर रहेगा। एजेंसी ने एस्ट्रोलैब और लूनर आउटपोस्ट से जुड़े रोबोटिक चंद्र रोवर्स के लिए नए अनुबंधों की घोषणा की, साथ ही ब्लू ओरिजिन, एस्ट्रोबोटिक और इंट्यूटिव मशीन्स से जुड़े कार्गो लैंडर मिशनों की भी घोषणा की।
नासा ने मूनफॉल नामक एक मिशन की योजना का भी अनावरण किया, जिसमें कठिन भूभागों का पता लगाने और भविष्य के लैंडिंग स्थलों की खोज करने के लिए डिज़ाइन किए गए उछलने वाले ड्रोन शामिल होंगे। अधिकारियों ने कहा कि चंद्रमा की सतह पर छोटी उड़ानें पूरी करने के बाद ये ड्रोन अंततः नेविगेशन बीकन, अवलोकन स्टेशन या संचार नोड के रूप में कार्य कर सकते हैं।
एजेंसी के अधिकारियों ने भविष्य के चंद्र वातावरण का वर्णन किया जिसमें आवास, ऊर्जा प्रणालियाँ, खनन क्षेत्र और वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र सैकड़ों वर्ग मील में फैले हो सकते हैं।
नासा की मुख्य वास्तुकार नुजौद मेरांसी ने कहा, जैसे-जैसे आप इसका निर्माण शुरू करते हैं, यह धीरे-धीरे एक शहर की तरह फैलने लगता है।
अपोलो कार्यक्रम के विपरीत, जो काफी हद तक सरकार द्वारा विकसित प्रणालियों पर निर्भर था, नासा ने कहा कि वाणिज्यिक कंपनियां चंद्रमा बेस के बुनियादी ढांचे के निर्माण और संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाएंगी।
हम 1960 के दशक की नासा की कार्यप्रणाली का लाभ उठा रहे हैं, यह पता लगाने के लिए कि अस्तित्व के इस महाकाव्य विज्ञान में क्या काम करता है और क्या नहीं, आइज़ैकमान ने कहा।
नासा के अधिकारियों ने आगे कहा कि चंद्रमा भविष्य में मंगल ग्रह पर भेजे जाने वाले मानव अभियानों के लिए एक परीक्षण स्थल के रूप में भी काम करेगा।
घर से कई महीनों तक दूर रहने की तुलना में चार दिन दूर रहने पर ऐसा करना बेहतर होगा, आइज़ैकमान ने कहा।
अंतरिक्ष अन्वेषण में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच चंद्र अन्वेषण के लिए नए सिरे से प्रयास किए जा रहे हैं, विशेष रूप से चीन की ओर से, जो इस दशक के अंत में एक अंतर्राष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन की योजना को आगे बढ़ा रहा है।
हालांकि नासा के अधिकारियों ने इस कार्यक्रम को भू-राजनीतिक प्रतियोगिता के रूप में वर्णित करने से परहेज किया, लेकिन उन्होंने चंद्रमा पर दीर्घकालिक अमेरिकी उपस्थिति और नेतृत्व के महत्व पर बार-बार जोर दिया।
इस बार हम यहीं रुकेंगे, हम चांद को फिर कभी नहीं छोड़ेंगे, आइज़ैकमान ने कहा। </description><guid>53268</guid><pubDate>28-May-2026 12:34:00 pm</pubDate></item><item><title>चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ड्रोन और रोबोट तैनात करेगा NASA</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53162</link><description>नासा ने चंद्रमा पर दीर्घकालिक मानव उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) क्षेत्र में स्वायत्त ड्रोन, रोबोटिक वाहन और संचार नेटवर्क तैनात करने की योजना पेश की है।
नासा मुख्यालय में आयोजित Moon Base ब्रीफिंग के दौरान अधिकारियों ने कहा कि एजेंसी अब केवल प्रतीकात्मक चंद्र लैंडिंग से आगे बढ़कर ऐसी दीर्घकालिक संरचना विकसित कर रही है, जो अंतरिक्ष यात्रियों, कार्गो प्रणालियों, वैज्ञानिक मिशनों और भविष्य के मंगल मिशनों का समर्थन करेगी।
इस नई रणनीति का प्रमुख हिस्सा MoonFall मिशन है, जो ड्रोन आधारित अभियान होगा। इसका उद्देश्य कठिन चंद्र सतह का सर्वेक्षण करना, जल बर्फ की खोज करना और भविष्य के Artemis मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए लैंडिंग स्थल तैयार करना है।
कार्लोस गार्सिया गोलान ने कहा कि ये ड्रोन अधिक क्षेत्रों की जांच करने और वास्तविक जानकारी जुटाने में मदद करेंगे।
Jet Propulsion Laboratory इन ड्रोन का विकास कर रही है, जबकि Firefly Aerospace को इन्हें चंद्रमा तक पहुंचाने वाले अंतरिक्ष यान के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है। मिशन को 2028 में लॉन्च किए जाने का लक्ष्य रखा गया है।
ये ड्रोन चंद्र सतह पर छोटी-छोटी छलांग लगाते हुए स्थायी रूप से अंधेरे में रहने वाले क्रेटरों और दक्षिणी ध्रुव के कठिन क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे। ये उच्च-रिजॉल्यूशन तस्वीरें, लैंडिंग साइट की सटीक मैपिंग और अत्यधिक तापमान में काम करने वाली तकनीकों का परीक्षण करेंगे।
नासा ने यह भी कहा कि भविष्य में चंद्र आधार (Moon Base) किसी छोटे स्टेशन की बजाय एक फैले हुए शहर जैसा हो सकता है। इसमें आवास, ऊर्जा प्रणाली, खनन क्षेत्र और वैज्ञानिक केंद्र अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए जा सकते हैं। </description><guid>53162</guid><pubDate>27-May-2026 11:13:46 am</pubDate></item><item><title>भारत सेमीकंडक्टर मिशन ने निवेशकों का विश्वास बढ़ाने के लिए एक सहायता पोर्टल लॉन्च किया: मंत्रालय</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53118</link><description>इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन ने निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और देश में सेमीकंडक्टर निवेश से संबंधित चिंताओं को दूर करने के उद्देश्य से एक ऑनलाइन निवेशक सहायता पोर्टल लॉन्च किया है।
मंत्रालय के अनुसार, केंद्र के सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत अब तक 12 फैब्रिकेशन और पैकेजिंग परियोजनाओं और 24 सेमीकंडक्टर डिजाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।
सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत शुरू किया गया यह नया पोर्टल निवेशकों को भारत में निवेश से संबंधित सरकारी योजनाओं, नीतियों, स्वीकृत सेमीकंडक्टर परियोजनाओं और नियामक आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
यह पोर्टल इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन इन्वेस्टर सपोर्ट पोर्टल के माध्यम से सुलभ है।
मंत्रालय ने कहा कि यह प्लेटफॉर्म संबंधित हितधारकों को एक सुरक्षित, भूमिका-आधारित, एकल-खिड़की डिजिटल इंटरफेस प्रदान करेगा ताकि सुव्यवस्थित समन्वय और निवेशकों की चिंताओं के समयबद्ध समाधान को सुविधाजनक बनाया जा सके।
निवेशक पोर्टल पर अपनी शिकायतें और प्रश्न दर्ज करा सकेंगे, जिनका समाधान संबंधित मंत्रालयों, विभागों, संगठनों, राज्य सरकारों, अनुमोदित परियोजना कंपनियों और उद्योग संघों के नोडल अधिकारियों के सहयोग से इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के अधिकारियों द्वारा किया जाएगा।
बयान के अनुसार, MeitY के अतिरिक्त सचिव और ISM के सीईओ, अमितेश कुमार सिन्हा ने निवेशकों को सुविधा प्रदान करने और उनका मार्गदर्शन करने के महत्व पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से विदेशी निवेशकों के लिए।
सिन्हा ने सभी हितधारकों से भारत के सेमीकंडक्टर विनिर्माण और डिजाइन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए निवेशकों की चिंताओं को दूर करने में अपनी जिम्मेदारियों को सक्रिय रूप से निभाने का आग्रह किया।
लॉन्च इवेंट में पोर्टल के ढांचे, कार्यक्षमताओं, ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया, समन्वय तंत्र और भाग लेने वाले मंत्रालयों, विभागों, संगठनों, राज्य सरकारों और व्यापार निकायों के नोडल अधिकारियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का अवलोकन और विस्तृत विवरण शामिल था।
सरकार ने कहा कि वह रणनीतिक पहलों और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से देश में एक लचीला, विश्वसनीय और टिकाऊ सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। </description><guid>53118</guid><pubDate>26-May-2026 4:09:55 pm</pubDate></item><item><title>चीन ने 2030 तक चंद्रमा पर उतरने के लक्ष्य के तहत एक अंतरिक्ष यात्री को एक साल के अंतरिक्ष मिशन पर भेजा है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=53004</link><description>चीन ने रविवार को अपने अंतरिक्ष स्टेशन पर तीन अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा, जिनमें से एक एक वर्ष तक वहां रहेगा, जो देश के लिए एक रिकॉर्ड अवधि है। इससे अंतरिक्ष में दीर्घकालिक मानव शरीर विज्ञान का अध्ययन संभव हो सकेगा क्योंकि बीजिंग 2030 तक मानवयुक्त चंद्रमा लैंडिंग की अपनी महत्वाकांक्षा की दिशा में काम कर रहा है।
शेनझोउ-23 यान को उत्तर-पश्चिम चीन के जियुकुआन सैटेलाइट लॉन्च सेंटर से लॉन्ग मार्च-2एफ वाई23 वाहक रॉकेट का उपयोग करके रात 11:08 बजे (1508 जीएमटी) लॉन्च किया गया, जिसमें तीन चीनी अंतरिक्ष यात्री सवार थे।
पेलोड विशेषज्ञ ली जियायिंग, जो हांगकांग की पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर हैं, चीनी अंतरिक्ष मिशन में भाग लेने वाली हांगकांग की पहली अंतरिक्ष यात्री हैं। अन्य दल के सदस्य कमांडर झू यांगझू और पायलट झांग युआनझी हैं, दोनों पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के अंतरिक्ष यात्री प्रभाग से हैं।
चीन और अमेरिका ने चांद पर जाने का लक्ष्य साधा
इन तीन अंतरिक्ष यात्रियों में से एक को तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन पर एक वर्ष तक रहना है, जो अब तक के सबसे लंबे अंतरिक्ष अभियानों में से एक है, लेकिन यह 1995 में एक रूसी अंतरिक्ष यात्री द्वारा बनाए गए 14-1/2 महीने के रिकॉर्ड से कम है। चीन मानव अंतरिक्ष एजेंसी ने शनिवार को कहा कि मिशन की प्रगति के आधार पर उस अंतरिक्ष यात्री का चयन बाद में किया जाएगा।
चीन लगभग एक दर्जन बार अंतरिक्ष यात्रियों को अपने अंतरिक्ष स्टेशन पर भेज चुका है, लेकिन यह प्रक्षेपण अमेरिका के साथ चंद्रमा पर पहुंचने की तेज होती होड़ के बीच हुआ है, जिसने बीजिंग की चंद्र क्षेत्र और संसाधनों पर उपनिवेश स्थापित करने और खनन करने की योजनाओं के बारे में चेतावनी दी है।
बीजिंग ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है।
नासा 2028 में मानवयुक्त चंद्रमा पर उतरने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जो चीन से दो साल पहले है। अमेरिका का उद्देश्य मंगल ग्रह के मानव अन्वेषण की दिशा में एक कदम के रूप में चंद्रमा पर दीर्घकालिक उपस्थिति स्थापित करना है।
अप्रैल में, नासा के चार अंतरिक्ष यात्रियों ने आर्टेमिस II मिशन के हिस्से के रूप में चंद्रमा की एक ऐतिहासिक यात्रा की, जो पृथ्वी से इतनी दूर तक उड़ान भरी जितनी पहले किसी ने नहीं की थी। यह दुनिया का पहला मानवयुक्त चंद्र मिशन था जो आधी सदी में हुआ था।
शुक्रवार को एलोन मस्क की स्पेसएक्स ने अपनी अगली पीढ़ी के स्टारशिप रॉकेट की एक सफल, मानवरहित परीक्षण उड़ान भरी, जिसे स्टारलिंक उपग्रहों के अधिक बार प्रक्षेपण को सक्षम करने और भविष्य में नासा के मिशनों को चंद्रमा पर भेजने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
चीन के सामने 2030 की समय सीमा में चार साल से भी कम समय बचा है और उसे अपने चंद्र मिशन के लिए पूरी तरह से नए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर विकसित करने की एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिससे यह साबित हो सके कि वह मिशन के लिए तैयार है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि उसके अंतरिक्ष यात्री, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित तियांगोंग की अपेक्षाकृत सुरक्षित कक्षा में रहने के आदी हैं, चंद्रमा की सतह पर जोखिम भरे संक्रमण को सुरक्षित रूप से पार कर सकें।
चीन के शेनझोउ मिशन 2021 से छह महीने के प्रवास के लिए अंतरिक्ष यात्रियों की तिकड़ी को स्टेशन पर भेज रहे हैं। चीनी अंतरिक्ष एजेंसी दो पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षण दे रही है, जिनमें से एक इस साल अल्पावधि के आधार पर तियांगोंग के संभावित मिशन में शामिल हो सकता है।
2035 तक स्थायी चंद्र बेस का लक्ष्य
पिछला मिशन, शेनझोउ-22, नवंबर में निर्धारित समय से पहले लॉन्च किया गया था ताकि तीन चीनी अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर वापस लाया जा सके क्योंकि उनका शेनझोउ-20 यान कक्षा में अंतरिक्ष मलबे से क्षतिग्रस्त हो गया था।
चीन ने अब तक केवल रोबोटों को ही चंद्रमा पर भेजा है, लेकिन उसके लगातार शेनझोउ मिशन देश की तेजी से विकसित हो रही अंतरिक्ष क्षमताओं को उजागर करते हैं। जून 2024 में, चीन रोबोटों का उपयोग करके चंद्रमा के सुदूर भाग से चंद्र नमूने प्राप्त करने वाला पहला देश बन गया।
2030 से पहले सफल मानवयुक्त लैंडिंग से रूस के साथ मिलकर 2035 तक चंद्रमा पर एक स्थायी बेस स्थापित करने की चीन की योजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।
चीनी चंद्र कार्यक्रम के मुख्य वैज्ञानिक वू वेइरेन ने कहा है कि बीजिंग की सार्वजनिक समयसीमा जानबूझकर रूढ़िवादी है।
पिछले एक वर्ष में, बीजिंग ने 2030 मिशन के लिए विकसित हार्डवेयर के सुरक्षा परीक्षण किए हैं, जिनमें भारी-भरकम लॉन्ग मार्च-10 रॉकेट, मेंगझोऊ अंतरिक्ष यान और लान्यू चंद्र लैंडर शामिल हैं।
शेनझोउ-23 उड़ान 2030 मिशन की तैयारी में तियांगोंग के कोर मॉड्यूल के साथ पहली स्वायत्त तीव्र मिलन और डॉकिंग प्रक्रिया को अंजाम देगी, जो मेंगझोउ कैप्सूल और लान्यू लैंडर के बीच एक स्वचालित चंद्र-कक्षा मिलन पर निर्भर करती है।
वैज्ञानिक शेनझोउ-23 मिशन की विस्तारित अवधि के दौरान अंतरिक्ष में विकिरण के संपर्क में आने, अस्थि घनत्व में कमी और मनोवैज्ञानिक तनाव के शारीरिक प्रभावों का भी अध्ययन करेंगे।
सरकारी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बीजिंग अंतरिक्ष में दुनिया का पहला मानव कृत्रिम भ्रूण प्रयोग कर रहा है। इस महीने बीजिंग ने तियांगोंग अंतरिक्ष यान के शेनझोउ-22 दल को मानव स्टेम कोशिकाओं के नमूने भेजे हैं। इस प्रयोग का उद्देश्य अंतरिक्ष में मनुष्यों के दीर्घकालिक निवास, जीवन रक्षा और प्रजनन का अध्ययन करना है। </description><guid>53004</guid><pubDate>25-May-2026 11:15:21 am</pubDate></item><item><title>नासा ने बताया कि अंतरिक्ष की इस अद्भुत तस्वीर में पृथ्वी नारंगी रंग की क्यों चमक रही है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52985</link><description>नासा ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से ली गई एक खूबसूरत तस्वीर साझा की है, जिसमें क्षितिज पर पृथ्वी नारंगी रंग की हल्की धुंध से ढकी हुई दिखाई दे रही है। इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई इस तस्वीर के कैप्शन में अंतरिक्ष एजेंसी ने लिखा, ISS से ली गई पृथ्वी की इस तस्वीर में पृथ्वी नारंगी रोशनी में नहाई हुई प्रतीत हो रही है। यह न तो सूर्यास्त का दृश्य है और न ही कैमरे की कोई गड़बड़ी; इसे एयरग्लो कहा जाता है, जो सतह से 80 से 100 किलोमीटर ऊपर होने वाला एक प्राकृतिक प्रकाश चमत्कार है।
एयरग्लो क्या है?
वायुदीप्ति तब होती है जब ऊपरी वायुमंडल में अणु और परमाणु दिन के दौरान सौर विकिरण से ऊर्जा अवशोषित करते हैं। रात में, ये उत्तेजित कण उस ऊर्जा को मंद प्रकाश के रूप में छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया नियॉन साइन बोर्ड के काम करने के तरीके के समान है, बस यह ग्रह स्तर पर होती है।
अरोरा के विपरीत, एयरग्लो हर रात पूरी दुनिया में दिखाई देता है। यह आमतौर पर इतना धुंधला होता है कि कक्षा से अंधेरे और अबाधित दृश्य के बिना इसे देखना मुश्किल होता है। आईएसएस हमें आकाश में चल रहे इस सूक्ष्म, निरंतर रासायनिक प्रयोग को करीब से देखने का अवसर प्रदान करता है।
हवा में चमकने वाली वस्तु का रंग किस चीज पर निर्भर करता है?
नासा ने लिखा, यह चमक कई रंगों की हो सकती है, जिनमें लाल, हरा, बैंगनी और पीला शामिल हैं। रंग इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी गैसें शामिल हैं और वे कितनी ऊंचाई पर हैं। हरा रंग अक्सर लगभग 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद ऑक्सीजन से आता है; वहीं, लाल रंग तब दिखाई देता है जब ऑक्सीजन लगभग 200 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद होती है। नारंगी, पीला या बैंगनी रंग तब दिखाई दे सकता है जब सोडियम, हाइड्रॉक्सिल रेडिकल्स या अन्य अणु मिश्रण में शामिल होते हैं।
इस तस्वीर का वर्णन करते हुए नासा ने कहा कि इस तस्वीर में तारों से भरे अंतरिक्ष के नीचे पृथ्वी के क्षितिज की रूपरेखा को दर्शाती हुई एक चमकदार नारंगी रंग की वायु-चमक दिखाई दे रही है।
इसमें आगे कहा गया है, तस्वीर के दाहिनी ओर अंतरिक्ष स्टेशन का एक अंधेरा, छायादार हिस्सा दिखाई दे रहा है।

 </description><guid>52985</guid><pubDate>24-May-2026 1:53:36 pm</pubDate></item><item><title>मेटा ने WhatsApp AI चैट के लिए लॉन्च किया नया प्राइवेसी फीचर</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52890</link><description>मेटा प्लेटफॉर्म ने अपने एआई चैटबॉट Meta AI के लिए WhatsApp पर नया इन्कॉग्निटो मोड पेश किया है, जिसका उद्देश्य एआई चैट के दौरान उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता को और मजबूत करना है।







टेक वेबसाइट TechCrunch की रिपोर्ट के अनुसार, इस फीचर के जरिए यूजर्स व्हाट्सऐप पर Meta AI के साथ निजी और सुरक्षित बातचीत कर सकेंगे।
कंपनी ने बताया कि यूजर्स को जल्द ही Meta AI के साथ वन-टू-वन चैट में एक नया आइकन दिखाई देगा, जिसके माध्यम से निजी एआई बातचीत शुरू की जा सकेगी। आने वाले महीनों में यह सुविधा Meta AI ऐप में भी उपलब्ध कराई जाएगी।
Meta के अनुसार, इन्कॉग्निटो चैट एक सुरक्षित वातावरण में संचालित होगी और बातचीत किसी अन्य व्यक्ति को दिखाई नहीं देगी।
कंपनी ने कहा कि इन चैट्स को सेव नहीं किया जाएगा और चैट विंडो बंद करते ही संदेश स्वतः गायब हो जाएंगे।
व्हाट्सऐप में प्रोडक्ट की वाइस प्रेसिडेंट Alice Newton-Rex ने कहा कि लोग अब एआई का उपयोग निजी और संवेदनशील सवालों के लिए भी करने लगे हैं।
उन्होंने कहा कि कई लोग वित्त, स्वास्थ्य या व्यक्तिगत संबंधों से जुड़े सवालों पर एआई से सलाह लेते हैं, इसलिए अधिकतम गोपनीयता उपलब्ध कराना जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह नया फीचर Meta के नए AI मॉडल Muse Spark पर आधारित है, जिसे पिछले महीने लॉन्च किया गया था।
Meta एक अन्य फीचर Side Chat पर भी काम कर रही है, जिससे यूजर्स किसी ग्रुप या चैट के भीतर निजी तौर पर Meta AI से सवाल पूछ सकेंगे, बिना अन्य सदस्यों को दिखाई दिए।
फिलहाल यूजर्स को एआई से सवाल पूछने के लिए मैसेज टैग करना पड़ता है, जिससे जवाब सभी लोगों को दिखाई देता है।
नया इन्कॉग्निटो मोड आने वाले महीनों में चरणबद्ध तरीके से रोलआउट किया जाएगा।






 </description><guid>52890</guid><pubDate>23-May-2026 11:13:44 am</pubDate></item><item><title>चंद्रयान-3 ने रचा नया इतिहास</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52831</link><description>चंद्रयान-3 को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि हासिल हुई है। भारत के इस ऐतिहासिक चंद्र मिशन को अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉटिक्स (AIAA) द्वारा प्रतिष्ठित 2026 गोडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान 21 मई को वॉशिंगटन डीसी में आयोजित एआईएए एएसईएनडी 2026 सम्मेलन के दौरान प्रदान किया गया। यह पुरस्कार अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियों के लिए दिया जाता है और इसे इस क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है।






23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 ने इतिहास रचते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी। भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस क्षेत्र की सतह पर पहले कभी कोई सफल खोज नहीं की गई थी। इस मिशन ने चंद्रमा की सतह, मिट्टी और वहां मौजूद रासायनिक तत्वों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान कीं। वैज्ञानिकों ने चंद्र दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र की मिट्टी में कई महत्वपूर्ण रासायनिक तत्वों की मौजूदगी की पुष्टि की, जो भविष्य में मानव अभियानों और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की संभावनाओं को मजबूत करते हैं।
यह मिशन भविष्य में चंद्रमा पर मानव बस्तियाँ बसाने और निर्माण कार्यों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। चंद्रयान-3 से प्राप्त आंकड़े अंतरिक्ष अनुसंधान और गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इस सफलता ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है।
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की ओर से यह पुरस्कार स्वीकार किया। अपने संबोधन में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्पेस विजन 2047 का उल्लेख करते हुए भारत की भविष्य की अंतरिक्ष योजनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण, मानव अंतरिक्ष उड़ान और वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की तेज़ी से बढ़ती क्षमताओं को रेखांकित किया।
राजदूत विनय क्वात्रा ने भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने दोनों देशों की सरकारों, उद्योगों और अनुसंधान संस्थानों के बीच बढ़ती साझेदारी को अंतरिक्ष विज्ञान के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।
गोडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स अवार्ड अंतरिक्ष विज्ञान अकादमी द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार किसी व्यक्ति या टीम को उनके असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार की स्थापना रॉकेट विज्ञान के महान वैज्ञानिक रॉबर्ट एच. गोडार्ड की स्मृति में की गई थी। रॉबर्ट गोडार्ड को आधुनिक रॉकेट तकनीक का अग्रदूत माना जाता है। उनके शुरुआती तरल रॉकेट इंजन प्रयोगों ने अंतरिक्ष विज्ञान की नींव रखी थी। 1975 में इस पुरस्कार को वर्तमान स्वरूप दिया गया और इसके चयन मानदंडों का विस्तार किया गया।
चंद्रयान-3 को मिला यह सम्मान भारत की वैज्ञानिक क्षमता, तकनीकी प्रगति और अंतरिक्ष अनुसंधान में बढ़ती शक्ति का प्रतीक है। यह उपलब्धि न केवल भारत के लिए गर्व का विषय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगी।






 </description><guid>52831</guid><pubDate>22-May-2026 12:39:37 pm</pubDate></item><item><title>नासा का परसेवरेंस रोवर मंगल ग्रह पर मैराथन पूरा करने के लिए तैयार है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52715</link><description>नासा के परसेवरेंस रोवर के लिए मंगल ग्रह पर जीवन एक मैराथन की तरह रहा है, न कि स्प्रिंट की तरह। पांच वर्षों से अधिक समय से, छह पहियों वाला यह रोबोटिक अन्वेषक मंगल की सतह पर प्राचीन जीवन के संकेतों की खोज, भूविज्ञान और जलवायु का अध्ययन और पृथ्वी पर वापस लाने के लिए चट्टानों के नमूने एकत्र करने में निरंतर लगा हुआ है।


रोवर अब तक 26.09 मील (41.99 किमी) की दूरी तय कर चुका है, जो आधिकारिक मैराथन दूरी 26.22 मील (42.2 किमी) से थोड़ा ही कम है, और परसेवरेंस मिशन के प्रबंधक रॉबर्ट हॉग के अनुसार, यह अगले महीने उस दूरी को पार कर लेगा।


कार के आकार का यह रोवर 18 फरवरी, 2021 को मंगल ग्रह पर उतरा, और शुरू में इस मिशन की अवधि एक मंगल वर्ष, यानी लगभग 687 पृथ्वी दिनों तक चलने की योजना बनाई गई थी।


रोवर की स्थिति अच्छी बनी हुई है और इसके ऊर्जा स्रोत में कम से कम एक दशक का शेष समय बचा है। मिशन की अवधि नासा द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगी, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (कैलिफोर्निया) में परसेवरेंस के उप परियोजना वैज्ञानिक केन फार्ले ने रॉयटर्स को नासा द्वारा प्रदान की गई टिप्पणियों में कहा।


वैज्ञानिक उपकरणों से लैस परसेवरेंस ने मंगल ग्रह के उत्तरी गोलार्ध में स्थित जेज़ेरो क्रेटर के आसपास के क्षेत्र में परिचालन किया है। माना जाता है कि यह क्षेत्र कभी जलमग्न था और यहाँ एक प्राचीन झील बेसिन मौजूद है। जल से संबंधित विभिन्न विशेषताओं के अलावा, इसमें एक प्राचीन पंखे के आकार का अवसादी निक्षेप भी दिखाई देता है, जहाँ तीन अरब वर्ष से भी अधिक समय पहले एक नदी झील में गिरती थी।


मंगल ग्रह, जो अब ठंडा और निर्जन है, बहुत समय पहले एक घने वायुमंडल और गर्म जलवायु से युक्त था, जिसके कारण इसकी सतह पर तरल जल मौजूद था। वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए उत्सुक हैं कि क्या मंगल ग्रह पर कभी जीवन था। जल को जीवन के लिए एक मूलभूत तत्व माना जाता है, इसलिए अपने आर्द्र अतीत के साथ जेज़ेरो क्रेटर रोवर के अध्ययन के लिए एक आदर्श स्थान है।


परसेवरेंस की सबसे महत्वपूर्ण खोज की घोषणा नासा ने पिछले साल की थी  झील के तल पर जमा तलछट से अरबों साल पहले बने लाल रंग की चट्टान के गड्ढे के अंदर से लिए गए एक नमूने में प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के संभावित संकेत मिले थे। शोधकर्ताओं ने कहा कि रोवर द्वारा खोजे गए खनिज प्राचीन सूक्ष्मजीवी गतिविधि को दर्शा सकते हैं, लेकिन ये गैर-जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से भी बन सकते हैं।


यह मूल्यांकन करने के लिए कि क्या ये वास्तव में मंगल ग्रह पर जीवन के प्रमाण हैं, आगे के काम के लिए स्थलीय प्रयोगशालाओं में विश्लेषण की आवश्यकता है जिनमें इस निर्धारण को करने के लिए आवश्यक उपकरण मौजूद हों, फार्ले ने कहा।


परसेवरेंस भविष्य में रोबोटिक या मानवयुक्त मिशन द्वारा पृथ्वी पर वापस लाए जाने की उम्मीद के साथ चट्टानों के नमूने एकत्र करना जारी रखेगा, फार्ले ने कहा।


इसने मंगल ग्रह पर कार्बनिक अणुओं के बारे में भी साक्ष्य जुटाए हैं। कुछ अन्य खोजों में, परसेवरेंस ने यह दस्तावेजीकरण किया कि मंगल का वायुमंडल विद्युत रूप से सक्रिय है, इसने धूल भरी आंधी के साथ अक्सर जुड़े विद्युत निर्वहन का पता लगाया, और पहली बार दृश्य प्रकाश में मंगल पर अरोरा का अवलोकन किया, जिसमें आकाश हल्के हरे रंग में चमक रहा था।


अपने शुरुआती वर्षों में, परसेवरेंस ने उस झील के जीवन चक्र का दस्तावेजीकरण किया जिसने लगभग 3.7 अरब साल पहले जेज़ेरो क्रेटर को भर दिया था। फ़ार्ले ने बताया कि झील शुरू में उथली थी, जिससे क्रेटर के तल पर नमक से भरपूर तलछट जमा होती थी, फिर यह कम से कम 30 फीट (9 मीटर) तक गहरी हो गई, और रेतीली तलछट झील में जमा होकर एक डेल्टा का निर्माण किया।


'जीवन की उत्पत्ति'


रोवर इस समय जेज़ेरो क्रेटर के ठीक बाहर काम कर रहा है और बहुत प्राचीन चट्टानों का अध्ययन कर रहा है - जो संभवतः चार अरब वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं। मंगल ग्रह, पृथ्वी की तरह, लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले बना था, इसलिए ये चट्टानें इसके इतिहास के प्रारंभिक काल की होंगी।


महत्वपूर्ण बात यह है कि यह समय अवधि और यह सतही वातावरण पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के समय के वातावरण से काफी मिलता-जुलता है। चूंकि इस युग की चट्टानें पृथ्वी पर पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं, इसलिए मंगल ग्रह पूर्व-जैविक रसायन विज्ञान और संभवतः जीवन की उत्पत्ति की जांच के लिए एक महत्वपूर्ण अनुरूप वातावरण प्रदान करता है, फार्ले ने कहा।


नासा का दूसरा रोवर, क्यूरियोसिटी, मंगल ग्रह पर कार्यरत है। यह रोवर 2012 में मंगल की भूमध्य रेखा के ठीक दक्षिण में स्थित गेल क्रेटर नामक स्थान पर उतरा था और अब तक 22.93 मील (36.91 किमी) की दूरी तय कर चुका है। मंगल की सतह पर सबसे अधिक दूरी तय करने वाला रोवर नासा का अपॉर्चुनिटी था, जिसने 2004 से 2019 तक चले अपने मिशन के दौरान 28.06 मील (45.16 किमी) की दूरी तय की थी।


दृढ़ता नामक यह जहाज अपने साथ इंजीन्यूटी नामक एक छोटा हेलीकॉप्टर लेकर आया था, जो किसी अन्य ग्रह पर संचालित और नियंत्रित उड़ान भरने वाला पहला विमान बन गया। इसने मंगल ग्रह के अत्यंत पतले वायुमंडल में 72 बार सफलतापूर्वक उड़ान भरी, 10.5 मील (17 किमी) की दूरी तय की और लगभग 79 फीट (24 मीटर) तक की ऊंचाई तक पहुंचा।


जेज़ेरो क्रेटर के अंदर और बाहर के अलग-अलग वातावरणों ने इस क्षेत्र को मंगल ग्रह के अतीत के बारे में विशेष रूप से जानकारीपूर्ण बना दिया है।


यह तथ्य कि परसेवरेंस एक झील-नदी प्रणाली और मंगल ग्रह की प्रारंभिक परत, जो शायद आधा अरब वर्षों के अंतराल पर अलग हैं, दोनों का पता लगा सका, इसका मतलब है कि जेज़ेरो साइट सतह पर पांच साल बिताने के बाद भी वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती रहती है, फ़ार्ले ने कहा। </description><guid>52715</guid><pubDate>21-May-2026 12:03:57 pm</pubDate></item><item><title>भारतीय शोधकर्ताओं ने एक दुर्लभ भूरे बौने तारे के साथ एक अति-संकुचित तारकीय द्विआधारी प्रणाली की खोज की है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52665</link><description>भारतीय और अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने अब तक ज्ञात सबसे कम अवधि वाले तारकीय द्विआधारी तंत्रों में से एक की खोज की है, जिसमें एक नीले रंग का तारा एक दुर्लभ भूरे रंग के बौने तारे के साथ एक अति-संकुचित कक्षा में जुड़ा हुआ है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा मंगलवार को घोषित की गई इस खोज को तारकीय विकास और विलक्षण द्विआधारी प्रणालियों के निर्माण को समझने में एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
जर्नल मंथली नोटिस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी: लेटर्स में प्रकाशित इस अध्ययन में एक कॉम्पैक्ट बाइनरी सिस्टम में एक सबस्टेलर ब्राउन ड्वार्फ साथी की मेजबानी करने वाले ब्लू स्ट्रैगलर तारे के पहले ज्ञात मामले की पुष्टि की गई है।
नीले रंग के बिखरे हुए तारे लंबे समय से खगोलविदों को हैरान करते रहे हैं क्योंकि वे तारा समूहों में समान आयु के अन्य तारों की तुलना में अधिक चमकीले और नीले दिखाई देते हैं, जो तारकीय विकास के मानक मॉडलों को चुनौती देते प्रतीत होते हैं।
यह शोध गौहाटी विश्वविद्यालय, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान और आईएनएएफ-कैटानिया खगोल भौतिकी वेधशाला के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया था।
टीम ने पाया कि इस बाइनरी सिस्टम का कक्षीय काल असाधारण रूप से छोटा है, लगभग 5.6 घंटे या 0.234 दिन, जो इसे अब तक खोजे गए अपनी तरह के सबसे सघन सिस्टमों में से एक बनाता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि इस सहोदर पिंड का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 0.056 गुना है, जो इसे हाइड्रोजन-जलने की सीमा से नीचे रखता है और इसे भूरे बौनों की श्रेणी में मजबूती से रखता है - ऐसे खगोलीय पिंड जो ग्रह होने के लिए बहुत विशाल हैं लेकिन तारों की तरह परमाणु संलयन को बनाए रखने के लिए बहुत छोटे हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रणाली तथाकथित ब्राउन ड्वार्फ रेगिस्तान में स्थित है, एक ऐसा क्षेत्र जहाँ इस प्रकार के साथी तारे अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं। अध्ययन में इसे इस श्रेणी में खोजा गया सबसे कम अवधि वाला द्विआधारी तारा तंत्र बताया गया है।
इस टीम में गौहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अली हसन शेख और प्रोफेसर बिमान जे. मेधी, ​​आईएनएएफ-कैटानिया खगोल भौतिकी वेधशाला के डॉ. सर्जियो मेसिना, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम और प्रोफेसर राम सागर और नैनीताल के एआरआईएस की डॉ. नीलम पंवार शामिल थे।
वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यह प्रणाली एक पदानुक्रमित त्रि-तारा प्रणाली के विकास के माध्यम से बनी होगी, जिसमें द्रव्यमान स्थानांतरण, कक्षीय अंतःक्रियाएं और अंततः विलय की प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान सघन द्विआधारी संरचना बनी।
शोधकर्ताओं ने कहा कि ये निष्कर्ष तारकीय विकास, द्विआधारी तारा अंतःक्रिया और उपतारकीय वस्तुओं से संबंधित सैद्धांतिक मॉडलों को परिष्कृत करने में मदद कर सकते हैं, साथ ही जमीन पर आधारित और अंतरिक्ष दूरबीनों से प्राप्त प्रेक्षणों की व्याख्या में भी सुधार कर सकते हैं।
यह अध्ययन इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि कैसे अभिलेखीय खगोलीय डेटा, नवीन विश्लेषण के साथ मिलकर, महंगे नए अवलोकन संबंधी बुनियादी ढांचे की आवश्यकता के बिना महत्वपूर्ण खोजों को जन्म दे सकता है। </description><guid>52665</guid><pubDate>20-May-2026 1:46:06 pm</pubDate></item><item><title>भारत में AI शिक्षा को बढ़ावा देने की लिए गूगल की राज्यों और यूनिसेफ से साझेदारी</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52614</link><description>गूगल ने भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकारों और यूनिसेफ के साथ नई साझेदारियों की घोषणा की है।
लंदन में आयोजित Education World Forum 2026 के दौरान कंपनी ने देशभर में AI साक्षरता, प्रशिक्षण और शैक्षणिक उपकरणों के विस्तार के लिए बड़े अभियान का ऐलान किया।
कंपनी ने कहा कि यह पहल National Education Policy 2020 के अनुरूप तैयार की गई है और इसका उद्देश्य स्कूलों तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में AI के उपयोग को मजबूत करना है।
इस कार्यक्रम के तहत Google भारत में Google AI Educator Series यानी GES शुरू करेगा।
यह पहल महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और असम सरकारों, केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख तथा Punjab School Education Board के सहयोग से लागू की जाएगी।
कंपनी के अनुसार यह मोबाइल-फर्स्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम भारतीय शिक्षकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
प्रारंभिक चरण में इसे असमिया, हिंदी, मराठी, तेलुगु, ओड़िया और पंजाबी समेत छह भाषाओं में उपलब्ध कराया जाएगा, जबकि आगे और भाषाओं में विस्तार की योजना है।
इसका उद्देश्य शिक्षकों और फैकल्टी सदस्यों को गूगल के AI टूल्स, खासकर Gemini, का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग सिखाना है ताकि कक्षा में पढ़ाई का अनुभव बेहतर बनाया जा सके।
इसके अलावा Google ने UNICEF के साथ तीन वर्षीय वैश्विक साझेदारी की भी घोषणा की है।
यह साझेदारी भारत के अलावा ब्राजील, पाकिस्तान और केन्या में शिक्षा क्षेत्र में नवाचार और सीखने के परिणाम बेहतर बनाने पर केंद्रित होगी।
इस सहयोग के तहत गूगल की तकनीक और यूनिसेफ की शैक्षणिक विशेषज्ञता को मिलाकर शिक्षण व्यवस्था मजबूत की जाएगी, शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा और सीखने के उपकरणों तक पहुंच बढ़ाई जाएगी।
कंपनी ने बताया कि Gemini और ReadAlong जैसे AI आधारित टूल्स का उपयोग व्यक्तिगत सीखने, पढ़ने की क्षमता और समझ विकसित करने के लिए किया जाएगा, जबकि NotebookLM जैसे प्लेटफॉर्म के कक्षा उपयोग की संभावनाएं भी तलाश की जाएंगी।
इस पहल का एक प्रमुख लक्ष्य डिजिटल अंतर को कम करना भी है, जिसके तहत छात्रों और शिक्षकों के लिए तकनीक और प्रशिक्षण संसाधनों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।
UNICEF हर वर्ष इस कार्यक्रम के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए रिपोर्ट भी जारी करेगा, ताकि सफल मॉडलों को बड़े स्तर पर लागू किया जा सके।
कंपनी ने कहा कि यह पहल भारत में पहले से चल रही AI आधारित शिक्षा परियोजनाओं और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसके AI Opportunity Fund के विस्तार का हिस्सा है। </description><guid>52614</guid><pubDate>19-May-2026 6:13:44 pm</pubDate></item><item><title>नैनो-सोने से युक्त अतिपतली फिल्में भविष्य के पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और स्व-संचालित सेंसरों को शक्ति प्रदान कर सकती हैं।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52528</link><description>नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी संस्थान के वैज्ञानिकों ने नैनो-गोल्ड कणों से युक्त एक अतिपतली लचीली फिल्म विकसित की है जो तापमान में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को विद्युत संकेतों में परिवर्तित कर सकती है, जिससे स्व-संचालित सेंसर और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए संभावनाएं खुलती हैं।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा समर्थित यह शोध, अगली पीढ़ी के स्मार्ट उपकरणों के लिए ऊष्मीय ऊर्जा का संचयन करने में सक्षम हल्के, लचीले और कम बिजली खपत वाले पदार्थों को विकसित करने पर केंद्रित है।
प्रोफेसर दीपांकर मंडल के नेतृत्व में शोधकर्ता सुदीप नास्कर और उनके सहयोगियों की टीम ने पॉलीविनाइलिडीन फ्लोराइड (पीवीडीएफ) का उपयोग करके अति पतली फिल्मों का निर्माण किया, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और सेंसिंग प्रौद्योगिकियों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला एक लचीला बहुलक है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि मौजूदा प्लास्मोनिक-पायरोइलेक्ट्रिक और पीवीडीएफ मिश्रित प्रणालियां अक्सर मोटे उपकरणों या खराब तरीके से नियंत्रित हाइब्रिड इंटरफेस पर निर्भर करती हैं, जो पतले, पहनने योग्य और कम बिजली खपत वाले इलेक्ट्रॉनिक्स में उनके उपयोग को सीमित करती हैं।
इन चुनौतियों से पार पाने के लिए, वैज्ञानिकों ने 100 नैनोमीटर से भी पतली फिल्मों में छोटे षट्कोणीय नैनोगोल्ड कणों को समाहित किया। इस प्रक्रिया से सामग्री के पायरोइलेक्ट्रिक प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ - यानी तापमान में उतार-चढ़ाव से बिजली उत्पन्न करने की इसकी क्षमता में।
शोधकर्ताओं के अनुसार, नैनोगोल्ड के समावेश से पीवीडीएफ फिल्म में एक उच्च स्तरीय ध्रुवीय अवस्था का निर्माण हुआ, जो कुशल पायरोइलेक्ट्रिक व्यवहार के लिए आवश्यक है। सोने के नैनोकणों और पॉलिमर द्विध्रुवों के बीच परस्पर क्रिया ने प्रकाशीय अवशोषण और ऊष्मीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्षमता को भी बढ़ाया।
एडवांस्ड फंक्शनल मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन ने 294 से 301 केल्विन की एक छोटी परिवेश तापमान सीमा के भीतर कुशल पायरोइलेक्ट्रिक ऊर्जा रूपांतरण का प्रदर्शन किया, जिससे यह सामग्री पहनने योग्य ऊर्जा संचयन और थर्मल सेंसिंग अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त हो जाती है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि यह नवाचार स्वास्थ्य सेवा, पर्यावरण निगरानी और ऊर्जा-कुशल उपकरणों के लिए स्मार्ट फोटोडिटेक्टर, कम-ग्रेड हीट हार्वेस्टर और लचीली इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के विकास में सहायक हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने आगे कहा कि प्लास्मोनिक नैनोमटेरियल्स को पायरोइलेक्ट्रिक पॉलिमर के साथ मिलाने से तेज, कम बिजली खपत करने वाले और स्व-संचालित इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है जो थर्मल और ऑप्टिकल दोनों संकेतों पर प्रतिक्रिया करने में सक्षम हों। </description><guid>52528</guid><pubDate>18-May-2026 5:50:18 pm</pubDate></item><item><title>Nagaland में वैज्ञानिकों ने दो नई मकड़ी प्रजातियों का पता लगाया </title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52455</link><description>नागालैंड की जंगली पहाड़ियों की खोज कर रहे साइंटिस्ट्स ने लेस-शीट-वीवर मकड़ियों की दो नई स्पीशीज़ खोजी हैं, जिससे नॉर्थईस्ट इंडिया की रिच लेकिन अभी भी कम खोजी गई बायोडायवर्सिटी पर नई रोशनी पड़ी है। ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ZSI) के रिसर्चर्स ने नागालैंड के पेरेन और सेमिन्यू ज़िलों में प्री-मॉनसून फ़ॉनल एक्सपीडिशन के दौरान नई स्पीशीज़  सेक्रस एनटीयू और सेक्रस फेनशुन्यू  की पहचान की। ये नतीजे इंटरनेशनल जर्नल ज़ूटाक्सा में पब्लिश हुए हैं। यह खोज नॉर्थईस्ट इंडिया में सेक्रस हिमालयनस की पहली रिकॉर्डेड मौजूदगी को भी दिखाती है, जिससे इस स्पीशीज़ का पता चला दायरा इसके पहले से डॉक्युमेंटेड हिमालयी डिस्ट्रिब्यूशन से काफी आगे बढ़ गया है।
 एनटीयू और फेनशुन्यू गांवों के नाम पर, जहां उन्हें खोजा गया था, नई बताई गई ये मकड़ियां सेक्रस जीनस से संबंधित हैं, जो नमी वाले जंगल के हैबिटैट में बड़े हॉरिजॉन्टल शीट जैसे जाले बनाने के लिए जानी जाती हैं। रिसर्चर्स ने कहा कि इन नतीजों से इंडो-बर्मा बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट की इकोलॉजिकल अहमियत और पक्की हो गई है, जिसका नॉर्थईस्ट इंडिया एक अहम हिस्सा है। यह स्टडी एराक्नोलॉजिस्ट पुथूर पट्टामल सुधीन, शौविक माली और सौविक सेन ने की थी। सर्वे के दौरान सबसे दिलचस्प बातों में से एक थी एक अजीब बिहेवियरल इंटरेक्शन। एक मेल सेक्रस हिमालयनस एक फीमेल सेक्रस फेनशुन्यू के साथ एक ही जाला शेयर करते हुए पाया गया  यह हेट्रोस्पेसिफिक साथ रहने का एक रेयर मामला है, जिसके बारे में रिसर्चर्स का कहना है कि इससे टैक्सोनॉमिक स्टडीज़ के दौरान स्पीशीज़ की पहचान मुश्किल हो सकती है और यह इन मकड़ियों के बीच पहले से बिना डॉक्यूमेंटेड बिहेवियरल इंटरेक्शन की ओर इशारा कर सकता है।

ये मकड़ियाँ ज़्यादातर छायादार जंगल वाले इलाकों, चट्टानी दरारों और सड़क किनारे की कटाई में पाई जाती थीं, जहाँ वे चट्टानों और पेड़ की जड़ों के नीचे पतली जगहों तक फैले हुए चादर के जाले बनाती थीं। साइंटिस्ट्स ने देखा कि उनके कैमोफ्लाज और पीछे हटने के बिहेवियर की वजह से फील्ड सर्वे के दौरान उन्हें पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है। रिसर्चर्स का मानना ​​है कि भारत में सेक्रस मकड़ियों का बिखरा हुआ फैलाव असल में दुर्लभ होने के बजाय सीमित साइंटिफिक खोज को दिखा सकता है। हाल तक, देश में इस जीनस की कुछ ही स्पीशीज़ को डॉक्यूमेंट किया गया था, जिससे पता चलता है कि नॉर्थईस्ट के दूर-दराज के इलाकों में कई और स्पीशीज़ अभी तक खोजी नहीं गई होंगी। 
एक साथ हुए डेवलपमेंट में, ZSI के साइंटिस्ट्स ने एक सदी से भी ज़्यादा समय में इंडियन व्हिप स्कॉर्पियन, या थेलिफोनिड्स का पहला पूरा टैक्सोनॉमिक रिविज़न भी पूरा किया है। आमतौर पर विनेगरून्स के नाम से जाने जाने वाले ये पुराने अरचिन्ड्स ज़हर के बजाय डिफेंस मैकेनिज्म के तौर पर सिरके जैसा एसिड स्प्रे करते हैं। व्हिप स्कॉर्पियन स्टडी ने भारत की पाँच जानी-मानी स्पीशीज़ में से चार को फिर से बताया और उनके डिस्ट्रीब्यूशन को मैप किया, जिससे दुनिया भर में सिर्फ़ 138 जानी-मानी स्पीशीज़ वाले एक दुर्लभ अरचिन्ड ग्रुप की ग्लोबल समझ में मदद मिली। दोनों स्टडीज़ के को-ऑथर सौविक सेन ने कहा, ये काम हिस्टोरिकल टैक्सोनॉमी और मॉडर्न कंज़र्वेशन ज़रूरतों के बीच एक पुल का काम करते हैं, जो उन ग्रुप्स के लिए एक बेसलाइन देते हैं जिन्हें दशकों से नज़रअंदाज़ किया गया है। धृति बनर्जी ने कहा कि संस्था अब अनजान जीव-जंतुओं के ग्रुप्स को डॉक्यूमेंट करने और भारतीय बायोडायवर्सिटी के उन व्हाइट होल्स को सामने लाने पर ज़्यादा ध्यान दे रही है, जिन्हें साइंटिफिक तौर पर खोजा नहीं गया है।
 </description><guid>52455</guid><pubDate>17-May-2026 1:32:19 pm</pubDate></item><item><title>अब AirDrop से Android पर भी भेज सकेंगे फाइलें, Google का बड़ा ऐलान</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52389</link><description>Google ने Android और iPhone यूजर्स के लिए फाइल शेयरिंग को पहले से ज्यादा आसान बनाने का ऐलान किया है। कंपनी ने पुष्टि की है कि उसका Quick Share फीचर अब AirDrop कम्पैटिबिलिटी के साथ कई नए Android स्मार्टफोन्स में उपलब्ध कराया जा रहा है। पहले यह सुविधा केवल Pixel 10 सीरीज तक सीमित थी, लेकिन अब इसे Samsung, OnePlus, Oppo, Vivo, Xiaomi और HONOR जैसे ब्रांड्स के कई डिवाइसेज तक बढ़ाया जा रहा है।









इन स्मार्टफोन्स में मिला नया फीचर
Google ने Android Show 2026 इवेंट में उन डिवाइसेज की लिस्ट जारी की है जिनमें फिलहाल AirDrop सपोर्ट वाला Quick Share फीचर उपलब्ध है। इनमें Samsung Galaxy S26 Series, Google Pixel 10 Series, Google Pixel 9 Series, Pixel 8a, Oppo Find X9 Series, Oppo Find N6 और Vivo X300 Ultra शामिल हैं। हालांकि Pixel 9a और Pixel 8 सीरीज को अभी इस सूची में जगह नहीं मिली है।
जल्द इन डिवाइसेज में भी आएगा सपोर्ट
कंपनी ने बताया कि आने वाले समय में कई पुराने फ्लैगशिप स्मार्टफोन्स को भी यह फीचर मिलने वाला है। इनमें Samsung Galaxy S25 और S24 Series, Galaxy Z Flip 7, Galaxy Z Fold 7, Galaxy Z Flip 6, Galaxy Z Fold 6, Galaxy Z TriFold, Oppo Find X8 Series, OnePlus 15, HONOR Magic V6 और HONOR Magic8 Pro शामिल हैं।
जिन फोन्स में सपोर्ट नहीं, उनके लिए भी समाधान
Google ने उन यूजर्स के लिए QR Code आधारित शेयरिंग सिस्टम भी पेश किया है जिनके डिवाइसेज में अभी यह फीचर उपलब्ध नहीं है। Android यूजर Quick Share के जरिए QR Code जनरेट कर सकेगा, जिसे iPhone या Mac यूजर स्कैन करके ब्राउजर में सीधे फाइल डाउनलोड कर पाएगा। कंपनी के मुताबिक यह प्रक्रिया End-to-End Encryption के साथ पूरी तरह सुरक्षित होगी और फाइलें 24 घंटे तक उपलब्ध रहेंगी।
WhatsApp जैसे ऐप्स में भी मिलेगा सपोर्ट
Google ने संकेत दिया है कि भविष्य में Quick Share को थर्ड-पार्टी ऐप्स के साथ भी इंटीग्रेट किया जाएगा। WhatsApp जैसे लोकप्रिय ऐप्स में यह फीचर आने से Android और Apple डिवाइसेज के बीच फाइल शेयरिंग और ज्यादा आसान हो सकती है।
कैसे काम करेगा नया फीचर?
यह सिस्टम Android और Apple डिवाइसेज के बीच सीधे वायरलेस फाइल ट्रांसफर की सुविधा देता है। इसमें Peer-to-Peer टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे फाइलें किसी बाहरी सर्वर पर नहीं जातीं। iPhone या Mac यूजर को AirDrop सेटिंग्स में Everyone for 10 Minutes विकल्प ऑन करना होगा। इसके बाद Android यूजर Quick Share के जरिए पास मौजूद Apple डिवाइस पर फाइल भेज सकेगा।
Android और iPhone के बीच कम होगी दूरी
अब तक Android और iPhone के बीच फाइल शेयरिंग यूजर्स के लिए बड़ी परेशानी रही है। लेकिन Quick Share और AirDrop के इस नए इंटीग्रेशन से दोनों प्लेटफॉर्म्स के बीच फाइल ट्रांसफर पहले से कहीं ज्यादा आसान और तेज हो सकता है। खासतौर पर उन लोगों के लिए यह फीचर बेहद उपयोगी साबित होगा जो एक साथ Android और Apple डिवाइसेज इस्तेमाल करते हैं।













 </description><guid>52389</guid><pubDate>16-May-2026 5:29:13 pm</pubDate></item><item><title>OpenAI ने iOS और Android के लिए ChatGPT मोबाइल ऐप में Codex लॉन्च किया</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52287</link><description>OpenAI ने अपने AI कोडिंग सहायक Codex को iOS और Android उपयोगकर्ताओं के लिए ChatGPT मोबाइल ऐप में एकीकृत कर दिया है, जिससे डेवलपर्स अपने स्मार्टफोन के माध्यम से दूर से ही कोडिंग कार्यों की निगरानी, ​​प्रबंधन और अनुमोदन कर सकते हैं।
यह फीचर समर्थित क्षेत्रों में फ्री और गो सहित सभी चैटजीपीटी प्लान में पूर्वावलोकन मोड में शुरू किया जा रहा है।
इस नए एकीकरण के साथ, उपयोगकर्ता ChatGPT मोबाइल ऐप को Codex चलाने वाली मशीनों से कनेक्ट कर सकते हैं, जिनमें लैपटॉप, मैक मिनी, डेवबॉक्स और प्रबंधित रिमोट वातावरण शामिल हैं, और चलते-फिरते लाइव प्रोजेक्ट अपडेट तक पहुंच सकते हैं।
ओपनएआई के अनुसार, मोबाइल इंटरफेस उपयोगकर्ताओं को अपने डेस्कटॉप सिस्टम पर वापस जाने की आवश्यकता के बिना आउटपुट की समीक्षा करने, कमांड को अनुमोदित करने, एआई मॉडल को स्विच करने, नए कोडिंग कार्यों को शुरू करने और चल रहे थ्रेड्स की निगरानी करने की अनुमति देता है।
कंपनी ने कहा, स्क्रीनशॉट, टर्मिनल आउटपुट, अंतर, परीक्षण परिणाम और अनुमोदन जैसे रीयल-टाइम अपडेट मोबाइल ऐप से सिंक हो जाते हैं, जबकि फाइलें, क्रेडेंशियल और अनुमतियां कनेक्टेड मशीन पर ही रहती हैं।
ओपनएआई ने यह भी कहा कि अब हर हफ्ते 40 लाख से अधिक उपयोगकर्ता कोडेक्स का उपयोग कर रहे हैं।
कंपनी ने आगे कहा कि रिमोट एसएसएच सपोर्ट और हुक्स अब सभी प्लान में सामान्य रूप से उपलब्ध हैं, जबकि एंटरप्राइज और बिजनेस यूजर्स के लिए प्रोग्रामेटिक एक्सेस टोकन पेश किए गए हैं।
इसके अलावा, OpenAI ने कहा कि योग्य ChatGPT Enterprise वर्कस्पेस के लिए स्थानीय वातावरण में Codex के HIPAA-अनुरूप उपयोग का समर्थन किया जाएगा, जो स्वास्थ्य सेवा और उद्यम अनुप्रयोगों को लक्षित करता है।
कंपनी ने आगे घोषणा की कि जल्द ही विंडोज सिस्टम पर चलने वाले कोडक्स से चैटजीपीटी मोबाइल ऐप को जोड़ने के लिए समर्थन शुरू किया जाएगा। </description><guid>52287</guid><pubDate>15-May-2026 1:56:11 pm</pubDate></item><item><title>मेटा ने एआई चैट के लिए गोपनीयता संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए व्हाट्सएप का इनकॉग्निटो मोड शुरू किया है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52226</link><description>टेकक्रंच की एक रिपोर्ट के अनुसार, मेटा ने व्हाट्सएप पर अपने मेटा एआई चैटबॉट के साथ चैट के लिए एक नया गुप्त मोड पेश किया है, क्योंकि कंपनी एआई-आधारित बातचीत के आसपास बढ़ती गोपनीयता संबंधी चिंताओं को दूर करने की दिशा में कदम उठा रही है।
कंपनी ने बुधवार को घोषणा की कि उपयोगकर्ता जल्द ही व्हाट्सएप पर वन-ऑन-वन ​​चैट में एक नए आइकन के माध्यम से मेटा एआई के साथ निजी बातचीत शुरू कर सकेंगे। उम्मीद है कि यह सुविधा आने वाले महीनों में मेटा एआई के स्टैंडअलोन ऐप में भी जोड़ दी जाएगी।
मेटा के अनुसार, गुप्त चैट एक सुरक्षित वातावरण में संचालित होंगी जहां उपयोगकर्ता द्वारा चैट बंद करने के बाद बातचीत दूसरों को दिखाई नहीं देगी, न ही संग्रहीत होगी और न ही बनी रहेगी। इस मोड में भेजे गए संदेश सत्र बंद होने पर स्वचालित रूप से गायब हो जाएंगे।
व्हाट्सएप की प्रोडक्ट वाइस प्रेसिडेंट एलिस न्यूटन-रेक्स ने कहा कि उपयोगकर्ता वित्तीय, स्वास्थ्य और रिश्तों से संबंधित प्रश्नों सहित संवेदनशील और व्यक्तिगत बातचीत के लिए एआई पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं।
लोग एआई का इस्तेमाल हर चीज के लिए करने लगे हैं, यहां तक ​​कि अपने कुछ सबसे निजी विचारों के लिए भी, चाहे वह वित्तीय या स्वास्थ्य संबंधी प्रश्न हों, या किसी मित्र या सहकर्मी के मुश्किल संदेश का जवाब देने के बारे में सलाह हो। हमारा मानना ​​है कि लोगों को इन सवालों को यथासंभव निजी तौर पर पूछने की सुविधा देना बहुत महत्वपूर्ण है, न्यूटन-रेक्स ने टेकक्रंच को बताया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मेटा ने पहले भी इसी मूल प्रणाली का उपयोग करके एआई-संचालित संदेश सारांश पेश किए थे। नया गुप्त मोड कंपनी के नवीनतम एआई मॉडल, म्यूज़ स्पार्क द्वारा संचालित है, जिसे पिछले महीने लॉन्च किया गया था।
मेटा एक और फीचर विकसित कर रहा है जिसे साइड चैट कहा जाता है, जो उपयोगकर्ताओं को चल रही चैट के दौरान अन्य प्रतिभागियों को बातचीत दिखाई दिए बिना निजी तौर पर मेटा एआई से प्रश्न पूछने की अनुमति देगा।
वर्तमान में, उपयोगकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से संदेशों को टैग करना होगा और समूह या चैट के भीतर एआई सहायक के साथ बातचीत करनी होगी, जिससे प्रतिक्रियाएं सभी को दिखाई देंगी। गोपनीयता चाहने वालों को इसके बजाय संदेशों को एक अलग चैट विंडो में कॉपी करना होगा।
अगले कुछ महीनों में गुप्त मोड उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध होने की उम्मीद है। </description><guid>52226</guid><pubDate>14-May-2026 4:34:27 pm</pubDate></item><item><title>iPhone की पैकेजिंग सिर्फ बॉक्स नहीं, एक प्रीमियम एक्सपीरियंस है</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52133</link><description>नया आईफोन खरीदने के बाद हर कोई उसे तुरंत देखने के लिए उत्साहित रहता है, लेकिन उसकी पैकेजिंग ऐसा होने नहीं देती। जिन लोगों ने नया आईफोन खरीदा है, उनका अनुभव लगभग एक जैसा रहा हैबॉक्स खोलना थोड़ा मुश्किल होता है। यह अचानक या आसानी से नहीं खुलता, बल्कि इसमें कुछ समय लगता है, और यही ऐप्पल की खास रणनीति का हिस्सा है। स्टीव जॉब्स समेत कंपनी के कई बड़े अधिकारियों ने भी इस बारे में खुलकर बात की है।






दरअसल, आईफोन का बॉक्स इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसे खोलते समय यूजर के भीतर उत्सुकता बनी रहे। सील हटाने के बाद भी बॉक्स की लिड इतनी परफेक्ट तरीके से फिट होती है कि उसे धीरे-धीरे ही खोला जा सकता है। सवाल यह उठता है कि इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी वाली कंपनी अनबॉक्सिंग को आसान क्यों नहीं बनाती? इसका जवाब ऐप्पल की मार्केटिंग और डिजाइन फिलॉसफी में छिपा है।
ऐप्पल ने जानबूझकर इस तरह की पैकेजिंग तैयार की है और इसके लिए कंपनी के पास पेटेंट भी मौजूद है। स्टीव जॉब्स का मानना था कि जब कोई व्यक्ति आईफोन या आईपैड का बॉक्स खोले, तो उसे शुरुआत से ही एक प्रीमियम और खास अनुभव महसूस होना चाहिए। उन्होंने एक बार कहा था कि बॉक्स खोलने का टेक्टाइल एक्सपीरियंस ही यह संकेत देता है कि अंदर मौजूद प्रोडक्ट कितना खास है। जॉब्स ने यह सोच ऐप्पल के शुरुआती निवेशक और चेयरमैन Mike Markkula से सीखी थी।
ऐप्पल के पूर्व डिजाइनर Jony Ive, जिन्होंने वर्षों तक स्टीव जॉब्स के साथ पैकेजिंग डिजाइन पर काम किया, उनका भी मानना था कि पैकेजिंग सिर्फ एक बॉक्स नहीं बल्कि पूरा अनुभव है। उनके मुताबिक, अनबॉक्सिंग एक तरह का थिएटर है, जो प्रोडक्ट के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और एक्साइटमेंट पैदा करता है।
डिजाइन एक्सपर्ट्स का कहना है कि आईफोन को धीरे-धीरे अनबॉक्स करने की प्रक्रिया यूजर में सस्पेंस और उत्साह बढ़ाती है। यह अनुभव लोगों को कुछ पल रुककर उस प्रीमियम प्रोडक्ट को महसूस करने का मौका देता है, जिसे उन्होंने खरीदा है।






 </description><guid>52133</guid><pubDate>13-May-2026 12:36:57 pm</pubDate></item><item><title>द इंफॉर्मेशन की रिपोर्ट के अनुसार, ओपनएआई और माइक्रोसॉफ्ट ने राजस्व-साझाकरण को 38 अरब डॉलर तक सीमित करने पर सहमति जताई है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=52025</link><description>अमेरिकी डिजिटल समाचार आउटलेट द इंफॉर्मेशन ने सोमवार को इस समझौते की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति के हवाले से बताया कि ओपनएआई और माइक्रोसॉफ्ट ने कुल राजस्व-साझाकरण भुगतान को 38 अरब डॉलर तक सीमित करने पर सहमति जताई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ओपनएआई और माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले महीने एक अनुबंध पर पुनर्विचार किया, जिससे ओपनएआई को अमेज़ॅन और गूगल जैसी कंपनियों के साथ नई साझेदारी करने का अवसर मिला।
रिपोर्ट के अनुसार, भुगतान सीमा ओपनएआई को निवेशकों के सामने एक मजबूत दीर्घकालिक प्रस्ताव पेश करने में मदद कर सकती है क्योंकि यह सार्वजनिक पेशकश की दिशा में काम कर रही है, जिसके बारे में कुछ अधिकारियों का कहना है कि यह इस साल के अंत तक हो सकती है।
रॉयटर्स इस रिपोर्ट की तुरंत पुष्टि नहीं कर सका। ओपनएआई और माइक्रोसॉफ्ट ने सामान्य व्यावसायिक घंटों के बाद रॉयटर्स के टिप्पणी के अनुरोधों का तुरंत जवाब नहीं दिया।
माइक्रोसॉफ्ट ने अप्रैल में कहा था कि ओपनएआई से राजस्व-साझाकरण भुगतान 2030 तक जारी रहेगा, और भुगतान पहले से सहमत प्रतिशत पर किया जाएगा, जो एक समग्र सीमा के अधीन होगा।
माइक्रोसॉफ्ट के शुरुआती निवेश, जो 2019 से अब तक कुल मिलाकर 13 बिलियन डॉलर है, ने ओपनएआई को एआई के अग्रणी के रूप में उभरने में मदद की और विंडोज निर्माता के एज्योर क्लाउड-कंप्यूटिंग व्यवसाय में वृद्धि को गति प्रदान की। </description><guid>52025</guid><pubDate>12-May-2026 12:49:44 pm</pubDate></item><item><title>Google I/O 2026: AI, Android 17 और स्मार्ट ग्लासेस के साथ भविष्य की टेक्नोलॉजी दिखाएगा Google</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51983</link><description>दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Google अपने सालाना डेवलपर इवेंट Google I/O 2026 की तैयारी में जुट चुकी है। यह बड़ा टेक इवेंट 19 मई 2026 से शुरू होगा और इस बार भी कंपनी का पूरा फोकस Artificial Intelligence यानी AI पर रहने की उम्मीद है। पिछले साल की तरह इस बार भी AI से जुड़े कई बड़े ऐलान देखने को मिल सकते हैं। इसके अलावा Android, Smart Glasses और नए ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकों पर भी खास नजर रहने वाली है।






Android 17 में मिल सकते हैं दमदार AI फीचर्स
Google इस साल अपने नए मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम Android 17 को लेकर कई अहम जानकारियां साझा कर सकता है। कंपनी इसके कई Beta Versions पहले ही जारी कर चुकी है। हालांकि डिजाइन में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है, लेकिन AI आधारित फीचर्स यूजर्स के अनुभव को पूरी तरह बदल सकते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक Android 17 में नया App Bubbles फीचर देखने को मिल सकता है। इसकी मदद से यूजर्स Apps को Floating Window में इस्तेमाल कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर उन्हें छोटे Bubble की तरह स्क्रीन पर मिनिमाइज भी कर पाएंगे। इससे Multitasking पहले से ज्यादा आसान और तेज हो सकती है।
Gemini 4.0 बन सकता है सबसे बड़ा आकर्षण
इस बार भी AI, Google I/O का सबसे बड़ा विषय रहने वाला है। माना जा रहा है कि Google अपने AI मॉडल Gemini 4.0 का नया और ज्यादा एडवांस्ड वर्जन पेश कर सकता है। यह मॉडल पहले से ज्यादा तेज, स्मार्ट और बेहतर Reasoning क्षमता वाला हो सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार नया Gemini Google की कई सेवाओं के साथ गहराई से इंटीग्रेट होगा। यूजर्स बातचीत के दौरान Visual Concepts को सीधे Chat में देख सकेंगे। इसके अलावा कंपनी Agentic AI पर भी काम कर रही है, जहां AI बिना ज्यादा निर्देशों के कई काम खुद करने में सक्षम होगा।
Android XR Glasses पर भी रहेगी नजर
Google अपने Smart Wearable प्रोजेक्ट Android XR Glasses को लेकर भी बड़े अपडेट दे सकता है। माना जा रहा है कि कंपनी ऐसे XR Glasses पेश कर सकती है जो सामान्य चश्मे जैसे दिखेंगे लेकिन उनमें कई स्मार्ट फीचर्स मौजूद होंगे।
इन Glasses में Live Translation, Real-Time Notifications और Gemini आधारित Voice Assistant जैसे फीचर्स मिल सकते हैं। इससे यूजर्स बिना फोन निकाले कई जरूरी काम आसानी से कर पाएंगे।
क्या Android और ChromeOS होंगे एक?
टेक इंडस्ट्री में यह चर्चा भी तेज है कि Google एक नए प्लेटफॉर्म पर काम कर रहा है, जिसे फिलहाल Aluminium OS कहा जा रहा है। माना जा रहा है कि यह सिस्टम ChromeOS और Android को एक साथ जोड़ सकता है।
अगर ऐसा होता है तो Laptop और Tablet यूजर्स को Android Apps और Desktop Browsing का शानदार कॉम्बिनेशन मिल सकता है। इससे अलग-अलग डिवाइस के बीच काम करना पहले से ज्यादा आसान और स्मूद हो जाएगा।
AI के भविष्य की झलक दिखाएगा Google
Google I/O 2026 सिर्फ नए फीचर्स लॉन्च करने का इवेंट नहीं होगा, बल्कि AI आधारित भविष्य की झलक भी पेश कर सकता है। कंपनी यह दिखाने की कोशिश करेगी कि आने वाले समय में Smartphone, Computer और Wearable Devices किस तरह AI के जरिए आपस में जुड़े होंगे।
टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि Google I/O 2026 आने वाले वर्षों की टेक्नोलॉजी दिशा तय करने वाला बड़ा मंच साबित हो सकता है।






 </description><guid>51983</guid><pubDate>11-May-2026 6:16:46 pm</pubDate></item><item><title>मेटा ने इंस्टाग्राम के लिए एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन बंद कर दिया है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51896</link><description>अमेरिकी तकनीक दिग्गज मेटा ने आधिकारिक तौर पर इंस्टाग्राम पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड डायरेक्ट मैसेजिंग को बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर उपयोगकर्ताओं के लिए गोपनीयता पर केंद्रित यह सुविधा समाप्त हो गई है।
तकनीकी कंपनी ने कहा कि जिन उपयोगकर्ताओं के पास पहले से एन्क्रिप्टेड चैट हैं, उन्हें ऐप के अंदर सूचित किया जा रहा है और उनसे आग्रह किया जा रहा है कि वे इस सुविधा के पूरी तरह बंद होने से पहले किसी भी महत्वपूर्ण मीडिया या संदेशों को डाउनलोड कर लें जिन्हें वे रखना चाहते हैं।
यह कदम मेटा की उन पूर्व योजनाओं से उलट है जिनमें एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग को अपने सभी ऐप्स में एक मानक सुविधा बनाने की बात कही गई थी।
एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, जिसे अक्सर E2EE के रूप में संक्षिप्त किया जाता है, यह सुनिश्चित करता है कि केवल प्रेषक और प्राप्तकर्ता ही संदेशों को पढ़ सकें, और जब इस सुविधा को हटा दिया जाता है, तो मेटा आवश्यकता पड़ने पर फ़ोटो, वीडियो और वॉयस नोट्स सहित संदेश सामग्री तक पहुंच प्राप्त कर सकेगा।
इंस्टाग्राम मानक एन्क्रिप्शन का उपयोग करना जारी रखेगा, जिसका उपयोग आमतौर पर जीमेल और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसी सेवाओं द्वारा किया जाता है।
मानक एन्क्रिप्शन उपकरणों और सर्वरों के बीच संचार के दौरान चैट की सुरक्षा करता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर प्लेटफ़ॉर्म को सामग्री तक पहुँचने की अनुमति देता है।
मेटा ने पहले गोपनीयता-केंद्रित मैसेजिंग को संचार का भविष्य बताया था और कथित तौर पर फेसबुक मैसेंजर और इंस्टाग्राम में एन्क्रिप्शन का विस्तार करने में कई साल बिताए थे।
फेसबुक मैसेंजर को अंततः डिफ़ॉल्ट रूप से E2EE सुविधा मिल गई, जबकि इंस्टाग्राम में इसका रोलआउट सीमित ही रहा।
कई रिपोर्टों के अनुसार, मेटा ने इंस्टाग्राम की इस सुविधा को बंद करने का फैसला इसलिए किया क्योंकि बहुत कम संख्या में उपयोगकर्ता ही सक्रिय रूप से एन्क्रिप्टेड चैट को सक्षम कर रहे थे।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि जब गोपनीयता उपकरणों को वैकल्पिक रखा जाता है तो उनका उपयोग अक्सर कम होता है, क्योंकि उपयोगकर्ताओं को उन्हें मैन्युअल रूप से चालू करना पड़ता है।
नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन (एनएसपीसीसी) जैसे बाल संरक्षण समूहों ने ई2ईई को वापस लेने का स्वागत करते हुए कहा कि एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग से ऑनलाइन हानिकारक गतिविधियों और बाल शोषण का पता लगाना मुश्किल हो जाएगा।
एक अध्ययन के अनुसार, जो बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 30 मिनट से अधिक समय बिताते हैं, उनकी एकाग्रता की क्षमता में धीरे-धीरे गिरावट आने की संभावना होती है। यह अध्ययन लगभग 10 से 14 वर्ष की आयु के 8,000 से अधिक बच्चों पर किया गया था।
यह अध्ययन उन बच्चों पर किया गया था जो औसतन सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं, वीडियो देखते हैं और वीडियो गेम खेलते हैं - 9 साल के बच्चों के लिए प्रतिदिन लगभग 30 मिनट से लेकर 13 साल के बच्चों के लिए 2.5 घंटे तक। </description><guid>51896</guid><pubDate>10-May-2026 12:56:01 pm</pubDate></item><item><title>एक अध्ययन में पाया गया है कि विशाल तारे नए तारों के जन्म को प्रेरित कर सकते हैं।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51801</link><description>आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, विशाल तारे आस-पास के आणविक बादलों में नए तारों के निर्माण को प्रेरित कर सकते हैं।
इस अध्ययन में ब्राइट रिम्ड क्लाउड 44 (बीआरसी 44) नामक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो सेफियस ओबी2 तारा-निर्माण परिसर में लगभग 900 पारसेक दूर स्थित है। शोधकर्ताओं ने पाया कि विशाल तारों द्वारा उत्सर्जित पराबैंगनी (यूवी) विकिरण आसपास के गैस बादलों को संकुचित करता है, जिससे नए तारों के जन्म के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं।
अंतरिक्ष में गैस और धूल के विशाल भंडार, जिन्हें आणविक बादल कहते हैं, के भीतर तारों का निर्माण होता है। अधिकतर तारे आकार में सूर्य के समान होते हैं, लेकिन कुछ तारों का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से आठ गुना से भी अधिक होता है। हालांकि ऐसे विशाल तारे दुर्लभ हैं, फिर भी वे तीव्र विकिरण और तारकीय हवाओं के माध्यम से अपने ब्रह्मांडीय वातावरण को अत्यधिक प्रभावित करते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, पास के एक विशाल तारे से निकलने वाली पराबैंगनी विकिरण बीआरसी 44 की बाहरी सतह को आयनित करती है, जिससे बादल के भीतर गैस गर्म और संकुचित हो जाती है। परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली तरंगें बादल के भीतर गहराई तक जाती हैं, जिससे गैस का घनत्व बढ़ता है और तारा निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
इस अध्ययन का नेतृत्व डॉक्टरेट के छात्र श्री ऋषि सी. ने डॉ. नीलम पनवार और भारत, यूनाइटेड किंगडम, चीन और थाईलैंड के सहयोगियों के साथ मिलकर किया।
भारत में स्थित 3.6 मीटर लंबे देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीओटी) और देवस्थल फास्ट ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीएफओटी) से प्राप्त प्रेक्षणों के साथ-साथ स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप के अभिलेखीय डेटा और चीन की पर्पल माउंटेन वेधशाला से प्राप्त रेडियो प्रेक्षणों का उपयोग करते हुए, टीम ने बादल और उसकी तारकीय आबादी का अध्ययन करने के लिए बहु-तरंगदैर्ध्य दृष्टिकोण अपनाया।
शोधकर्ताओं ने बीआरसी 44 के भीतर 22 नए युवा तारकीय पिंडों की पहचान की, जिनमें कई भूरे बौने तारे शामिल हैं - ऐसे खगोलीय पिंड जो सामान्य तारों की तरह अपने कोर में हाइड्रोजन संलयन को बनाए रखने के लिए बहुत छोटे होते हैं।
इस अध्ययन में युवा तारों के दो अलग-अलग समूहों की पहचान की गई। एक समूह आणविक बादल और पास के विशाल तारे से निकलने वाले विकिरण के बीच परस्पर क्रिया के कारण बना प्रतीत होता है, जबकि दूसरा समूह संभवतः उसी कालखंड के आसपास बना होगा जिस कालखंड का निर्माण स्वयं उस विशाल तारे के समय हुआ था।
द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चलता है कि विशाल तारे न केवल अपने आसपास के वातावरण को बाधित करते हैं बल्कि तारों की एक नई पीढ़ी के निर्माण में भी योगदान दे सकते हैं। </description><guid>51801</guid><pubDate>09-May-2026 10:45:42 am</pubDate></item><item><title>AI आधारित बदलाव के बीच क्लाउडफ्लेयर में बड़ी छंटनी</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51780</link><description>क्लाउडफ़्लेयर (Cloudflare)ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पुनर्गठन के तहत वैश्विक स्तर पर 1,100 से अधिक कर्मचारियों की छंटनी करने की घोषणा की है।
कंपनी द्वारा कर्मचारियों को भेजे गए आंतरिक संदेश के अनुसार, पिछले तीन महीनों में कंपनी के भीतर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग में 600 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है।
इंजीनियरिंग, वित्त, मानव संसाधन और विपणन जैसे विभागों में कर्मचारी अब दैनिक कार्यों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों का तेजी से उपयोग कर रहे हैं।
कंपनी ने कहा कि यह कदम केवल लागत घटाने या प्रदर्शन आधारित छंटनी नहीं है, बल्कि एजेंटिक एआई युग के अनुरूप संगठनात्मक बदलाव का हिस्सा है।
संदेश में कहा गया कि कंपनी अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं, टीमों और भूमिकाओं की नई तरह से संरचना तैयार कर रही है, ताकि भविष्य की तकनीकी जरूरतों के अनुरूप खुद को ढाला जा सके।
क्लाउडफ्लेयर ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय कर्मचारियों की क्षमता या कामकाज का प्रतिबिंब नहीं है।
कंपनी के अनुसार, प्रभावित कर्मचारियों को आधिकारिक और व्यक्तिगत ईमेल के माध्यम से सीधे जानकारी दी जाएगी।
छंटनी से प्रभावित कर्मचारियों को 2026 के अंत तक मूल वेतन, अमेरिका में स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ और अतिरिक्त हिस्सेदारी लाभ दिए जाएंगे।
कंपनी ने यह भी कहा कि जिन कर्मचारियों ने अभी तक अपनी एक वर्ष की हिस्सेदारी अवधि पूरी नहीं की है, उन्हें भी अनुपातिक लाभ दिया जाएगा।
क्लाउडफ्लेयर ने बताया कि वह पूरी पुनर्गठन प्रक्रिया को एक ही चरण में पूरा करना चाहती है, ताकि कर्मचारियों के बीच लंबे समय तक अनिश्चितता की स्थिति न बनी रहे।
कंपनी का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेजी से कारोबारी कार्यप्रणालियों को बदल रही है और प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए संगठन को अधिक तेज और नवाचार आधारित बनाना जरूरी है। </description><guid>51780</guid><pubDate>08-May-2026 2:51:05 pm</pubDate></item><item><title>भारत-यूरोपीय संघ ने शुरू किया 169 करोड़ का ईवी बैटरी रीसाइक्लिंग मिशन</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51668</link><description>भारत और यूरोपीय संघ ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरियों की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वाकांक्षी संयुक्त पहल शुरू की है। इस मिशन के तहत169 करोड़ रुपयेका फंड आवंटित किया गया है।यह कार्यक्रमभारत-ईयू ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (TTC)के अंतर्गत ग्रीन और क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी वर्किंग ग्रुप-2 का हिस्सा है। प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि15 सितंबर 2026रखी गई है।
मिशन का उद्देश्य
इस कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य ईवी बैटरियों की सुरक्षित रीसाइक्लिंग, कीमती खनिजों की रिकवरी और सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करना है। विशेष रूप सेलिथियम, ग्रेफाइट, कोबाल्टजैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल को अधिकतम दर से रिकवर करने पर जोर दिया जाएगा।
कार्यक्रम में इन पर रहेगा खास फोकस:
 आधुनिक रीसाइक्लिंग तकनीकों में नवाचार
 बैटरियों का कलेक्शन और लॉजिस्टिक्स
 पायलट प्रोजेक्ट्स के माध्यम से नई तकनीकों का परीक्षण
 बैटरियों का Second Life उपयोग
 सुरक्षा मानकों को मजबूत करना
इसके तहत भारत मेंभारत-ईयू संयुक्त पायलट प्रोजेक्टभी स्थापित किया जाएगा, जहां नई तकनीकों को वास्तविक परिस्थितियों में आजमाया और परिष्कृत किया जाएगा।फंडिंग और सहयोगफंडिंग का एक हिस्सा यूरोपीय संघ के Horizon Europe कार्यक्रम से आएगा, जबकि भारत की ओर सेभारी उद्योग मंत्रालयसहयोग प्रदान करेगा।
प्रमुख बयान
अजय कुमार सूद, भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार: तेजी से बढ़ते ईवी बाजार के साथ मजबूत रीसाइक्लिंग सिस्टम बनाना अत्यंत जरूरी है। यह भारत-ईयू रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देगा।ह
र्वे डेल्फिन, भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत: बैटरियां हरित परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह पहल नई तकनीकों को व्यवहारिक रूप देने में मदद करेगी।
डॉ. परविंदर मैनी, वैज्ञानिक सचिव: यह सहयोग भारत को सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाएगा।यह पहल भारत को ईवी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और दुर्लभ खनिजों के आयात पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभाएगी। </description><guid>51668</guid><pubDate>07-May-2026 10:35:33 am</pubDate></item><item><title>स्पेस-टेक फर्म पिक्सेल और AI स्टार्टअप सर्वम ने की साझेदारी, AI ऑर्बिटल डेटा सेंटर सैटेलाइट करेंगी विकसित</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51585</link><description>भारत में एआई ऑर्बिटल डेटा सेंटर सैटेलाइट विकसित करने के लिए स्पेस-टेक फर्म पिक्सेल और एआई स्टार्टअप सर्वम ने साझेदारी की है। यह जानकारी दोनों कंपनियों की ओर से सोमवार को दी गई। इस साझेदारी के तहत पिक्सेल पाथफाइंडर सैटेलाइट को डिजाइन, निर्माण, प्रक्षेपण और संचालित करेगी, जबकि सर्वम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का आधार प्रदान करेगी, जिससे ऑनबोर्ड चलने वाले फुल-स्टैक लैंग्वेज मॉडल के माध्यम से सीधे कक्षा में प्रशिक्षण और अनुमान दोनों संभव हो सकेंगे।
200 किलोग्राम श्रेणी की सैटेलाइट पाथफाइंडर, जिसके 2026 की चौथी तिमाही तक कक्षा में पहुंचने की उम्मीद है, अंतरिक्ष-आधारित कंप्यूटिंग क्षमताओं को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए कंपनियों के प्रयासों को दिखाता है। कम शक्ति वाले प्रोसेसर पर निर्भर पारंपरिक सैटेलाइट सिस्टम के विपरीत, पाथफाइंडर में स्थलीय एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर में उपयोग किए जाने वाले डेटा सेंटर-स्तरीय जीपीयू होंगे, जो अंतरिक्ष में सीधे उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग को सक्षम बनाएंगे।
इस सैटेलाइट में पिक्सल का प्रमुख हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग कैमरा भी लगा होगा, जिससे यह दुनिया के उन पहले सैटेलाइट्स में से एक बन जाएगा जो उच्च-रिजॉल्यूशन हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा कैप्चर करने और उन्नत एआई मॉडल का उपयोग करके कक्षा में ही उसका विश्लेषण करने में सक्षम है। इससे पृथ्वी पर बड़ी मात्रा में कच्चा डेटा भेजने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी, जिससे रियल टाइम में जानकारी प्राप्त करना, तेज निर्णय लेना और पर्यावरण निगरानी, ​​संसाधन प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की निगरानी जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग संभव हो सकेगा।
पिक्सेल के सीईओ अवैस अहमद ने कहा कि ऊर्जा, भूमि और विस्तार क्षमता से संबंधित बाधाओं के कारण जमीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए ऑर्बिटल डेटा सेंटर एक नया आयाम प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि सौर ऊर्जा से संचालित और डेटा स्रोतों के निकट स्थित अंतरिक्ष-आधारित कंप्यूटिंग कई सीमाओं को दूर कर सकती है। सर्वम के सीईओ प्रत्युष कुमार ने कहा कि यह साझेदारी कंपनी के स्वतंत्र एआई प्लेटफॉर्म को स्थलीय प्रणालियों से आगे अंतरिक्ष तक विस्तारित करती है, जिससे भारत में निर्मित एआई मॉडल विदेशी क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर से स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऑर्बिट में स्वदेशी इंटेलिजेंस का निर्माण तकनीकी संप्रभुता की कुंजी है।
यह मिशन कठोर अंतरिक्ष वातावरण में वास्तविक समय एआई अनुमान, विद्युत प्रबंधन, तापीय प्रदर्शन और डेटा वर्कफ्लो का भी परीक्षण करेगा, जिससे भविष्य के एआई ऑर्बिटल डेटा सेंटर सिस्टम्स की नींव रखी जाएगी। सैटेलाइट का विकास पिक्सेल की आगामी गीगापिक्सल सुविधा में किया जाएगा, जिसे 100 सैटेलाइट्स तक उत्पादन बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। </description><guid>51585</guid><pubDate>06-May-2026 10:44:26 am</pubDate></item><item><title>सौर मंडल के सुदूर क्षेत्रों में स्थित खगोलीय पिंड पर वायुमंडल का पता चला है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51538</link><description>हमारे सौर मंडल के सुदूर क्षेत्रों में  सबसे बाहरी ग्रह नेपच्यून से परे  कई बर्फीले और निर्जन खगोलीय पिंड मौजूद हैं। इनमें से केवल बौने ग्रह प्लूटो के पास ही वायुमंडल होने की जानकारी थी  अब तक।
खगोलविदों ने इस क्षेत्र से एक और पिंड की पहचान की है, जिसका व्यास लगभग 310 मील (500 किमी) है और जिसमें वायुमंडल है  हालांकि यह पतला है  यह खोज संकेत देती है कि इनमें से कुछ एकाकी पिंड पहले की तुलना में अधिक गतिशील हो सकते हैं। शोधकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इसमें वायुमंडल किस कारण से विकसित हुआ है।
इन पिंडों को ट्रांस-नेप्च्यूनियन ऑब्जेक्ट कहा जाता है, और इसका नाम (612533) 2002 XV93 है। यह सूर्य की परिक्रमा लगभग प्लूटो के समान दूरी पर करता है।
यह नेप्च्यून के पार स्थित दो सबसे बड़े पिंडों - प्लूटो (व्यास 1,473 मील (2,370 किमी)) और एरिस (व्यास 1,445 मील (2,326 किमी)) से काफी छोटा है। प्लूटो और एरिस को बौने ग्रह के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
इस पिंड का वायुमंडल पृथ्वी के मजबूत वायुमंडल की तुलना में लगभग 50 लाख से 100 लाख गुना पतला और प्लूटो के विरल वायुमंडल की तुलना में लगभग 50 से 100 गुना पतला प्रतीत होता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इस पिंड के वायुमंडल में मीथेन, नाइट्रोजन या कार्बन मोनोऑक्साइड की प्रधानता हो सकती है।
इस खोज से पता चलता है कि सौर मंडल के बाहरी हिस्से में मौजूद कुछ छोटे बर्फीले पिंड पूरी तरह से निष्क्रिय या अपरिवर्तनीय नहीं हो सकते हैं, जैसा कि पहले माना जाता था, यह बात खगोलशास्त्री को अरिमात्सु ने कही, जो इशिगाकिजिमा खगोलीय वेधशाला के प्रमुख, जापान की राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाला में व्याख्याता और सोमवार को नेचर एस्ट्रोनॉमी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं।
क्योटो संग्यो विश्वविद्यालय के कोयामा अंतरिक्ष विज्ञान संस्थान के निदेशक और जापान के राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाला में प्रोफेसर, खगोलविद और अध्ययन के सह-लेखक जुनिची वातानाबे ने कहा, आम तौर पर यह माना जाता था कि इतनी छोटी वस्तु पर वायुमंडल मौजूद नहीं होगा। इससे पता चलता है कि एक दूरस्थ, ठंडी दुनिया में भी ऐसी गतियां मौजूद हैं जिनकी हमने कल्पना भी नहीं की है।
शोधकर्ताओं ने इस पिंड के वायुमंडल के लिए दो संभावित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि यह एक स्थायी वायुमंडल हो सकता है, जो संभवतः क्रायोवोलकैनिज्म द्वारा कायम है, जिसमें गैसें इसकी सतह पर मौजूद दरारों के माध्यम से इसके आंतरिक भाग से रिसती या बाहर निकलती हैं।
यह पृथ्वी पर मौजूद पिघली हुई चट्टान वाले ज्वालामुखी जैसा नहीं होगा, बल्कि यह एक ठंडी बर्फीली दुनिया का ज्वालामुखी होगा जिसमें वाष्पशील गैसें और बर्फ शामिल होंगी, अरिमात्सु ने कहा।
या फिर, यह वातावरण अस्थायी हो सकता है, जो किसी अन्य छोटी वस्तु के हाल ही में इससे टकराने पर निकली गैसों के कारण उत्पन्न हुआ हो।
यदि वातावरण उल्कापिंडों के प्रभाव से उत्पन्न हुआ है, तो यह अगले कुछ वर्षों या दशकों में कम हो सकता है। यदि यह बना रहता है या मौसमी रूप से बदलता है, तो यह निरंतर आंतरिक आपूर्ति के पक्ष में होगा, अरिमात्सु ने कहा।
शोधकर्ताओं ने जापान के क्योटो, नागानो और फुकुशिमा में स्थित ज़मीनी दूरबीनों का उपयोग करके एक तारकीय ग्रहण के दौरान इसका अध्ययन किया। यह वह स्थिति है जब पृथ्वी से देखने पर कोई खगोलीय पिंड किसी दूर के तारे के सामने से गुजरता है, जिससे तारे का प्रकाश अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो जाता है। वैज्ञानिक पृष्ठभूमि तारे से आने वाले प्रकाश में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर किसी वस्तु की भौतिक विशेषताओं का निर्धारण कर सकते हैं।
नेप्च्यून के परे कुइपर बेल्ट नामक विशाल क्षेत्र में स्थित यह वस्तु संभवतः सौर मंडल की शुरुआत के समय की है, जो लगभग 45 लाख वर्ष पहले की बात है। यह सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार पथ पर परिक्रमा करती है और एक परिक्रमा पूरी करने में 247 वर्ष का समय लेती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इसकी संरचना में संभवतः बर्फीले पानी, चट्टान और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर सामग्री शामिल है।
अवलोकन के समय, यह सूर्य से लगभग 3.42 अरब मील (5.5 अरब किलोमीटर) दूर स्थित था। यह पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी का लगभग 37 गुना है, जिसे खगोलीय इकाई (AU) कहा जाता है। सूर्य से इसकी औसत दूरी लगभग 39.6 AU है - निकटतम बिंदु पर 34.6 AU और सबसे दूर बिंदु पर 44.6 AU।
शोधकर्ताओं को पता है कि इसका वर्तमान नाम (612533) 2002 XV93 यादगार नहीं है।
हमारी टीम में हम इसे आमतौर पर XV93 कहते थे, जो सुविधाजनक तो है, लेकिन उतना रोमांचक नहीं। व्यक्तिगत रूप से, चूंकि मैं ओकिनावा में इशिगाकिजिमा खगोलीय वेधशाला में काम करता हूं, इसलिए मुझे बहुत खुशी होगी अगर इसे कभी ओकिनावा की पौराणिक कथाओं से जुड़ा कोई नाम मिल जाए, जैसे कि ओकिनावा की परंपरा में सृष्टिकर्ता देवता अमामिक्यू। हालांकि, औपचारिक नामकरण अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ की प्रक्रियाओं के अनुसार होता है, अरिमात्सु ने कहा। </description><guid>51538</guid><pubDate>05-May-2026 2:36:55 pm</pubDate></item><item><title>गैलेक्सीआई उपग्रह के प्रक्षेपण के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मिशन दृष्टि युवाओं के नेतृत्व में किए गए नवाचार का प्रदर्शन करता है।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51461</link><description>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मिशन दृष्टि को भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह का सफल प्रक्षेपण नवाचार और राष्ट्र निर्माण के प्रति देश के युवाओं के जुनून को दर्शाता है।
X पर एक पोस्ट में, प्रधानमंत्री ने परियोजना के पीछे की टीम को बधाई दी और कहा कि यह उपलब्धि भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को रेखांकित करती है।
गैलेक्सआई द्वारा शुरू किया गया मिशन दृष्टि अंतरिक्ष यात्रा में एक बड़ी उपलब्धि है। दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह और भारत में निर्मित सबसे बड़े निजी उपग्रह का सफल प्रक्षेपण, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के प्रति हमारे युवाओं के जुनून का प्रमाण है, उन्होंने कहा।
प्रधानमंत्री मोदी ने गैलेक्सीआई के संस्थापकों और पूरी टीम को इस सफल मिशन के लिए शुभकामनाएं दीं।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, गैलेक्सआई के संस्थापकों और पूरी टीम को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप ने रविवार को फाल्कन 9 रॉकेट के जरिए अपना पहला वाणिज्यिक उपग्रह, दृष्टि, कक्षा में प्रक्षेपित किया।
कंपनी द्वारा दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह के रूप में वर्णित यह मिशन पृथ्वी अवलोकन प्रौद्योगिकी में एक महत्वपूर्ण कदम है और वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती उपस्थिति को उजागर करता है।
लगभग 190 किलोग्राम वजनी मिशन दृष्टि भारत में निजी तौर पर विकसित किया गया सबसे बड़ा पृथ्वी अवलोकन उपग्रह भी है।
यह विश्व का पहला उपग्रह है जो इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल (ईओ) और सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) सेंसर को एक ही परिचालन मंच में एकीकृत करता है, जिससे दिन और रात दोनों समय सभी मौसम स्थितियों में इमेजिंग संभव हो पाती है।
इस उपग्रह में गैलेक्सीआई द्वारा सिंकफ्यूज्ड ऑप्टोसार पेलोड लगाया गया है, जो ऑप्टिकल इमेजिंग को रडार तकनीक के साथ जोड़ता है।
जहां ऑप्टिकल उपग्रह उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली छवियां प्रदान करते हैं, लेकिन वे बादल और अंधेरे से सीमित होते हैं, वहीं रडार प्रणाली बादलों, धुएं और बारिश को भेद सकती है और चौबीसों घंटे काम कर सकती है। </description><guid>51461</guid><pubDate>04-May-2026 11:44:21 am</pubDate></item><item><title>पृथ्वी के अस्तित्व के लिए जरूरी है सूर्य, जानें सूरज की रोशनी से कैसे बनती है बिजली? कैसे काम करता है सोलर पावर</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51428</link><description>पृथ्वी पर जीवन का सबसे बड़ा स्रोत है सूर्य। अनाज से लेकर जलवायु, मौसम नियंत्रण तक में इसकी भागीदारी है। पूरी मानव जाति एक साल में जितनी ऊर्जा इस्तेमाल करती है, उतनी ऊर्जा सूर्य सिर्फ एक घंटे में पृथ्वी को दे देता है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब दुनिया ऊर्जा संकट और प्रदूषण से जूझ रही है, तब सूर्य की रोशनी से बिजली बनाने वाली सौर ऊर्जा सबसे सस्ता, साफ और अनलिमिटेड विकल्प बनकर उभरी है। 3 मई को हर साल अंतरराष्ट्रीय सूर्य दिवस मनाया जा रहा है, जो सौर ऊर्जा के महत्व को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है।

सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने की प्रक्रिया को सोलर पावर कहते हैं। यह तकनीक लगभग 200 साल पुरानी है, लेकिन आज यह घरों से लेकर अंतरिक्ष तक पहुंच चुकी है। सोलर पावर न सिर्फ बिजली पैदा करती है बल्कि पर्यावरण को भी बचाती है क्योंकि इसमें कोई धुआं, प्रदूषण या आवाज नहीं होती। सिर्फ सूरज की रोशनी काफी है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, सोलर पावर का मतलब है सूरज की रोशनी को बिजली में बदलना। यह प्रक्रिया फोटोवोल्टिक इफेक्ट पर आधारित है। सन 1839 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर एडमंड बेकरेल (उस समय सिर्फ 19 साल के थे) ने सबसे पहले इस प्रभाव की खोज की। वे अपने पिता की लैब में प्रयोग कर रहे थे। जब उन्होंने रोशनी पर काम किया तो बिजली का करंट पैदा हुआ। यही घटना सोलर पावर की नींव बनी।

वैज्ञानिक बताते हैं कि सोलर पैनल मुख्य रूप से सिलिकॉन नामक सामग्री से बनाए जाते हैं। सिलिकॉन एक सेमीकंडक्टर है, यानी यह बिजली को आसानी से कंट्रोल कर सकता है। एक सामान्य सोलर सेल में सिलिकॉन की तीन पतली परतें होती हैं। बीच वाली परत प्योर सिलिकॉन की होती है। ऊपरी और निचली परतों में थोड़े अलग तत्व मिलाए जाते हैं जैसे एक तरफ फास्फोरस और दूसरी तरफ बोरॉन। जब सूरज की रोशनी इन परतों पर पड़ती है तो सिलिकॉन के अंदर मौजूद इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाते हैं और घूमने लगते हैं। ये इलेक्ट्रॉन एक परत से दूसरी परत की ओर खिंचते हैं। इससे एक तरफ नेगेटिव चार्ज और दूसरी तरफ पॉजिटिव चार्ज जमा होता है। दोनों तरफ तार लगाकर सर्किट बनाया जाता है। इलेक्ट्रॉन इस सर्किट से बहते हुए बिजली पैदा करते हैं जो हम इस्तेमाल कर सकते हैं।

खास बात है कि इस पूरी प्रक्रिया में कोई धुआं, प्रदूषण या आवाज नहीं होती। सिर्फ सूरज की रोशनी चाहिए होती है और बीजली पैदा हो जाती है। सोलर पैनल इतने उपयोगी हैं कि स्पेस एजेंसी इन्हें अंतरिक्ष यानों में भी इस्तेमाल करते हैं। नासा के अनुसार, जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप भी सोलर पैनल से ही बिजली प्राप्त करता है। नासा लगातार सोलर टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने का काम कर रहा है। अंतरिक्ष में सोलर पावर की शुरुआत की बात करें तो सोलर सेल का पहला सफल इस्तेमाल 1958 में हुआ था। अमेरिका ने मार्च 1958 में वैंगार्ड-1 नाम का पहला सोलर पावर से चलने वाला सैटेलाइट लॉन्च किया। इससे पहले स्पुतनिक और एक्सप्लोरर-1 जैसे सैटेलाइट सिर्फ बैटरी पर चलते थे और कुछ हफ्तों में बंद हो जाते थे, लेकिन वैंगार्ड-1 ने छह साल तक डाटा भेजा। आज सोलर पावर घरेलू बिजली, स्ट्रीट लाइट, पानी के पंप और बड़े-बड़े सोलर पार्क में इस्तेमाल हो रहा है।
 </description><guid>51428</guid><pubDate>03-May-2026 1:01:06 pm</pubDate></item><item><title>सरकार ने वास्तविक समय में आपदा संबंधी चेतावनी देने के लिए सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट सिस्टम का शुभारंभ किया।</title><link>https://thevoicetv.in/science.php?articleid=51387</link><description>केंद्रीय संचार एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शनिवार को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सहयोग से और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में विकसित 'सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट सिस्टम' का शुभारंभ किया।
सरकार के अनुसार, यह उन्नत प्रणाली आपदाओं, आपात स्थितियों और सार्वजनिक सुरक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी को नागरिकों के मोबाइल फोन पर वास्तविक समय में सीधे पहुंचाने के लिए डिज़ाइन की गई है।
इस प्रक्रिया के तहत, आज सुबह ही देशव्यापी स्तर पर इस प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।
इसमें कहा गया है कि परीक्षण के दौरान, देश भर के मोबाइल उपयोगकर्ताओं को उनके उपकरणों पर बीप ध्वनि के साथ 'आपातकालीन चेतावनी संदेश' प्राप्त हुए।
अधिकारियों ने आगे कहा कि इस पहल को प्राकृतिक आपदाओं, भीषण मौसम की घटनाओं और अन्य आपातकालीन स्थितियों के दौरान सूचना के त्वरित और प्रभावी प्रसार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
इससे पहले दिन में, सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान तैयारियों को मजबूत करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए देश भर में स्वदेशी मोबाइल आपातकालीन चेतावनी प्रणाली का परीक्षण किया।
यह प्रणाली वर्तमान में एनडीएमए द्वारा जारी किए गए फ्लैश एसएमएस संदेशों के रूप में अखिल भारतीय परीक्षण से गुजर रही है।
एनडीएमए 2 मई, 2026 को आपके क्षेत्र में सेल ब्रॉडकास्ट अलर्ट का परीक्षण करेगा। आपके मोबाइल फोन पर संदेश प्राप्त होने पर, किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। कृपया घबराएं नहीं, सरकार ने एक नमूना संदेश में कहा।
अधिकारियों ने बताया कि मोबाइल फोन पर तेज अलार्म की ध्वनि और चमकते संदेश के साथ अलर्ट भेजे गए थे।
ये अलर्ट स्वदेशी एकीकृत अलर्ट सिस्टम 'सैचेत' के माध्यम से प्रसारित किए जाते हैं, जिसे टेलीमैटिक्स विकास केंद्र (सी-डीओटी) द्वारा विकसित किया गया है, और यह अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ द्वारा अनुशंसित सामान्य अलर्टिंग प्रोटोकॉल पर आधारित है।
इस प्रणाली का उद्देश्य लक्षित क्षेत्रों में मोबाइल उपयोगकर्ताओं को आपदा और आपातकालीन स्थितियों से संबंधित अलर्ट प्रदान करना है, जिनमें सुनामी, भूकंप, बिजली गिरने और गैस रिसाव या रासायनिक दुर्घटना जैसी मानव निर्मित आपदाएं शामिल हैं।
सरकार ने राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने से पहले सिस्टम के प्रदर्शन और विश्वसनीयता का आकलन करने के लिए अतीत में इस तरह के कई परीक्षण किए हैं।
एनडीएमए भारत में आपदा प्रबंधन के लिए सर्वोच्च निकाय है।
परीक्षण चरण के बाद, इस प्रणाली को राष्ट्रव्यापी स्तर पर चालू किए जाने की उम्मीद है, जिससे सभी मोबाइल हैंडसेटों पर कई भारतीय भाषाओं में आपातकालीन अलर्ट का प्रसार संभव हो सकेगा। </description><guid>51387</guid><pubDate>02-May-2026 6:50:11 pm</pubDate></item></channel></rss>