<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>The Voice TV Feed</title><link>https://thevoicetv.in</link><description>The Voice TV Feed Description</description><item><title> मां रक्षा काली की पूजा 16 अप्रैल को</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49887</link><description>मेसरा बस्ती में इस वर्ष भी 16 अप्रैल को मां रक्षा काली पूजा धूमधाम से मनाई जाएगी। शेखर परिवार की कुलदेवी के रूप में शुरू हुई यह परंपरा पिछले 163 वर्षों से निरंतर जारी है।

शनिवार को मिली जानकारी के अनुसार पूजा का शुभारंभ रात 12 बजे विधि-विधान के साथ होगा, जबकि 17 अप्रैल को शाम 7 बजे प्रतिमा विसर्जन किया जाएगा। 
इस पूजा की ख्याति इतनी है कि अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। अध्यक्ष भगवान शेखर और रघुनंदन शेखर सहित पूरा परिवार इस आयोजन को सफल बनाने में जुटा है।
 साधकों के अनुसार, पूर्वजों की ओर से शुरू की गई इस आध्यात्मिक विरासत को आने वाली पीढ़ियां भी पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं। </description><guid>49887</guid><pubDate>04-Apr-2026 4:01:25 pm</pubDate></item><item><title>भो्रामदेव मंदिर: छत्तीसगढ़ का खजुराहो</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49637</link><description>भो्रामदेव मंदिर छत्तीसगढ़ के कावर्धा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। यह मंदिर अपने अद्भुत वास्तुशिल्प और शिल्पकला के कारण छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। इसकी नक्काशी, मूर्तियाँ और स्थापत्य कला मध्यकालीन भारतीय मंदिरों की उत्कृष्ट मिसाल हैं। यहाँ का वातावरण शांत और आध्यात्मिक है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को जागृत करता है बल्कि इतिहास और कला प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
इतिहास और निर्माण
भो्रामदेव मंदिर का निर्माण लगभग 11वीं12वीं शताब्दी में कालचुरी राजवंश के शासनकाल में हुआ था। कालचुरी वंश छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में शासन करने वाला एक प्रमुख राजवंश था। इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण उनके धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित करने के लिए किया गया था। भो्रामदेव मंदिर का नाम शायद स्थानीय देवी-देवताओं या क्षेत्रीय राजा भोरा के नाम पर रखा गया हो, हालांकि इसका सटीक कारण ऐतिहासिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
वास्तुकला और संरचना
भोरामदेव मंदिर नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर का मुख्य संरचना पत्थरों से निर्मित है, जिसमें अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी और मूर्तिकला की गई है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ शिवलिंग स्थापित है। इसके अलावा मंदिर परिसर में कई छोटी-छोटी मूर्तियाँ और शिल्पकारी दीवारों और स्तंभों पर बनाई गई हैं।
मंदिर का प्रवेश द्वार भव्य और सजावटी है। यहाँ के स्तंभ और दरवाजे intricately carved हैं, जिनमें देवी-देवताओं, अप्सराओं, और पौराणिक कथाओं की झलक दिखाई देती है। मंदिर की छत और प्रांगण की संरचना वास्तुकला के उन सिद्धांतों का पालन करती है, जिनमें मंदिर की ऊँचाई, स्तंभों की संख्या और मूर्तियों का स्थान धार्मिक और वास्तुशिल्पीय दृष्टि से संतुलित होता है।
मूर्तिकला और शिल्पकला
भोरामदेव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मूर्तिकला है। मंदिर की दीवारों पर न केवल धार्मिक दृश्य बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं को चित्रित किया गया है। यहाँ की मूर्तियाँ भगवान शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु और अन्य हिंदू देवी-देवताओं की अद्भुत चित्रकारी करती हैं।
विशेष रूप से मंदिर की erotic कला इसे खजुराहो के समान बनाती है। यह कला प्राचीन भारतीय समाज में जीवन, प्रेम और आध्यात्मिकता के एकीकृत दृष्टिकोण को दर्शाती है। अप्सराएँ, नर्तकियाँ, और अन्य मानव आकृतियाँ बहुत ही जीवंत और विस्तृत रूप में निर्मित हैं। शिल्पकारों ने पत्थर को इतनी सूक्ष्मता से तराशा है कि मूर्तियाँ जीवन जैसी प्रतीत होती हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
भोरामदेव मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है। शिवलिंग का पूजन यहाँ प्रतिदिन होता है और प्रमुख त्योहारों जैसे महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर धार्मिक आस्था का केंद्र है। इसके अलावा, मंदिर की शांत और निर्मल वातावरण भक्तों और साधकों को ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करता है।
भूगोल और पर्यावरण
भोरामदेव मंदिर छत्तीसगढ़ के कावर्धा जिले के घने हरित जंगलों के बीच स्थित है। आसपास का प्राकृतिक वातावरण मंदिर की शांति और सौंदर्य को और बढ़ाता है। यहाँ का क्षेत्रफल और आसपास की झीलें तथा हरियाली पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। पर्यटक और इतिहास प्रेमी इस स्थल पर आने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं, क्योंकि यह न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध है।
सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व
भोरामदेव मंदिर का सांस्कृतिक महत्व अत्यंत उच्च है। यह मंदिर मध्यकालीन भारतीय शिल्पकला और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। स्थानीय त्योहारों और उत्सवों में मंदिर का विशेष स्थान होता है। इसके अलावा, यह स्थल पर्यटन के लिए भी आकर्षक है। खजुराहो के समान यहाँ की मूर्तियाँ और शिल्पकारी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
पर्यटन के दृष्टिकोण से, भोरामदेव मंदिर को देखने का सबसे अच्छा समय शीतकालीन महीनों में होता है। इस दौरान यहाँ का मौसम सुहावना और यात्रा के लिए अनुकूल होता है। मंदिर के आसपास के गाइड और स्थानीय जानकारी पर्यटकों को मंदिर के इतिहास और वास्तुकला के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।
संरक्षण और वर्तमान स्थिति
भोरामदेव मंदिर एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जिसे राज्य और केंद्र सरकार द्वारा संरक्षण के दायरे में रखा गया है। मंदिर की संरचना और मूर्तियों को समय-समय पर संरक्षण और मरम्मत के लिए विशेषज्ञों द्वारा निरीक्षण किया जाता है। स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग मिलकर इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने में प्रयासरत हैं।
हालांकि, पर्यटकों की संख्या बढ़ने और प्राकृतिक तत्वों के कारण कुछ हिस्सों में क्षरण देखा गया है। इसके लिए मंदिर परिसर में सुरक्षा और देखभाल का विशेष ध्यान रखा जाता है। </description><guid>49637</guid><pubDate>01-Apr-2026 6:48:35 pm</pubDate></item><item><title>दंतेश्वरी माता मंदिर  छत्तीसगढ़ का प्रमुख शक्तिपीठ</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49603</link><description>दंतेश्वरी माता मंदिर छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में स्थित एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर है, जिसे राज्य की राजकीय देवी भी माना जाता है। यह मंदिर धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दंतेश्वरी माता को शक्ति या दुर्गा के अवतार के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के प्रति श्रद्धा और भक्ति की परंपरा सदियों पुरानी है, और यह स्थान छत्तीसगढ़ के लोगों के जीवन में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का एक प्रमुख केंद्र है।
माना जाता है कि दंतेश्वरी माता ने अपने भक्तों के लिए अद्भुत शक्तियाँ प्रकट की हैं और उन्हें संकट के समय सहायता प्रदान की है। मंदिर के गर्भगृह में माता की प्रतिष्ठित मूर्ति स्थापित है, जो विशेष रूप से भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है और इसके दर्शन के लिए राज्य भर से ही नहीं, बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।


इतिहास और पौराणिक कथाएँ

दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं और पुराणों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यह स्थान सप्त महाशक्ति पीठों में शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब सती माता ने अपने पिता के अत्याचार से दुखी होकर आत्मदाह किया, तब भगवान शिव ने उन्हें अपने कंधे पर उठाया और विभिन्न स्थानों पर उनके शरीर के अंग गिर गए। जहां-जहाँ अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। दंतेश्वरी माता का मंदिर उन्हीं स्थानों में से एक माना जाता है।
कहा जाता है कि माता दंतेश्वरी ने इस क्षेत्र में रहकर अपने भक्तों की रक्षा और मार्गदर्शन किया। इस कारण, यहाँ आने वाले भक्तों को विशेष लाभ और आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई पुराणों में वर्णित है कि माता अत्यंत सामर्थ्यशाली हैं और उनकी कृपा से भक्तों के कठिन समय में भी सुख और शांति प्राप्त होती है।


धार्मिक महत्व

दंतेश्वरी माता मंदिर का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है, बल्कि यह भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत भी है। यहाँ आने वाले भक्त अपने मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। माता दंतेश्वरी को शक्ति, साहस, और समृद्धि की देवी माना जाता है।
भक्त मानते हैं कि इस मंदिर में माता की शक्ति न केवल उनके जीवन में संकट से सुरक्षा देती है, बल्कि उनके मन और आत्मा को भी सशक्त बनाती है। मंदिर में नियमित रूप से पूजा, हवन, और भजन-कीर्तन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं। नवरात्रि के समय तो यहां श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच जाती है।


वास्तुकला और संरचना

दंतेश्वरी मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक हिंदू शैली में बनी है। मंदिर की संरचना में शिल्प कला और धार्मिक प्रतीकों का अद्भुत मिश्रण देखा जा सकता है। गर्भगृह में माता की मूर्ति स्थापित है, जो विशेष प्रकार की पूजा और विधियों के माध्यम से पूजनीय है।
मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जैसे कि भोजनालय, विश्राम गृह और सुरक्षा व्यवस्था। इसके अलावा, मंदिर के चारों ओर छोटे-छोटे शिवालय और अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित हैं। यह परिसर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।


त्योहार और आयोजन

दंतेश्वरी माता मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में नवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण है। इस समय भक्त माता की विशेष पूजा करते हैं और कई धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर में विशेष हवन, भजन, और कथा वाचन का आयोजन किया जाता है।
इसके अलावा, अन्य हिंदू त्योहार जैसे दशहरा, दीपावली, और करम पूजा भी यहाँ बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। मंदिर में भक्तों की भीड़ इस समय इतनी अधिक होती है कि प्रशासन विशेष व्यवस्थाएँ करता है। यह धार्मिक उत्सव न केवल श्रद्धालुओं के लिए बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं।


यात्रा और पहुँच

दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचने के लिए दुर्ग जिले में सड़क और रेल मार्ग दोनों उपलब्ध हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन दुर्ग शहर है, और वहाँ से टैक्सी या बस के माध्यम से मंदिर पहुँचा जा सकता है। यात्री सड़क मार्ग से भी आसानी से मंदिर तक पहुँच सकते हैं। मंदिर परिसर में पार्किंग, ढाबे और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जिससे यात्रा सरल और सुविधाजनक होती है।
मंदिर के आसपास प्राकृतिक सौंदर्य भी मन को बहुत भाता है। हरे-भरे जंगल, शांतिपूर्ण वातावरण, और पर्वतीय स्थल इस स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण बनाते हैं। यात्रियों के लिए यह अनुभव केवल धार्मिक नहीं बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अद्भुत होता है।


भक्ति और आस्था

भक्तों के लिए दंतेश्वरी माता मंदिर एक अत्यंत पवित्र स्थल है। यहाँ आने वाले लोग अपने मनोकामना और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए आते हैं। भक्तों का विश्वास है कि माता दंतेश्वरी की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
मंदिर में नियमित पूजा, भजन, कीर्तन और कथा वाचन का आयोजन होता है। इन धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भक्त अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिक शांति अनुभव करते हैं। कई भक्त तो साल भर इस मंदिर के दर्शन और पूजा के लिए आते रहते हैं।


सांस्कृतिक महत्व

दंतेश्वरी माता मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहाँ आयोजित त्योहार, मेले, और धार्मिक कार्यक्रम स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखते हैं। मंदिर का परिसर स्थानीय कला, संगीत और नृत्य का भी केंद्र है।
मंदिर में आने वाले पर्यटक और भक्त न केवल धार्मिक अनुभव लेते हैं बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित होते हैं। यह मंदिर राज्य और देश दोनों में धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बन गया है। </description><guid>49603</guid><pubDate>31-Mar-2026 6:56:04 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़  के मंदिर में स्त्री रूप में पूजे जाते हैं हनुमान जी</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49555</link><description>भारत में हनुमान जी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, लेकिन आज हम आपको एक अनोखे मंदिर के बारे में जानकारी दे रहे हैं। सभी जानते हैं कि हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के इस मंदिर में हनुमान जी की पूजा एक स्त्री के रूप में होती है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर रतनपुर में स्थित है। इस मंदिर में हनुमान जी को पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के रूप में पूजा जाता है। 
इस अनोखे मंदिर की स्थापना के पीछे की पौराणिक कथा भी काफी दिलचस्प है। भारत में हनुमान जी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, लेकिन आज हम आपको एक अनोखे मंदिर के बारे में जानकारी दे रहे हैं। सभी जानते हैं कि हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के इस मंदिर में हनुमान जी की पूजा एक स्त्री के रूप में होती है।
 यह मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर रतनपुर में स्थित है। इस मंदिर में हनुमान जी को पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के रूप में पूजा जाता है। इस अनोखे मंदिर की स्थापना के पीछे की पौराणिक कथा भी काफी दिलचस्प है। जी हां, आपने सही पढ़ा। और शायद, यह पूरी दुनिया में मौजूद इकलौता मंदिर भी है जहां भगवान हनुमान की पूजा एक महिला के रूप में की जाती है। रतनपुर के गिरजाबांध में मौजूद इस मंदिर में देवी हनुमान की मूर्ति है। इस मंदिर के प्रति लोगों में काफी आस्था है। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी यहां पूजा अर्चना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।
गिरजाबांध स्थित हनुमान मंदिर सदियों से इस क्षेत्र में अस्तित्व में है। माना जाता है कि हनुमान जी की यह प्रतिमा दस हजार साल पुरानी है। किंवदंती है कि मंदिर का निर्माण पृथ्वी देवजू नाम के राजा ने कराया था। राजा पृथ्वी देवजू हनुमान जी के बहुत बड़े भक्त थे औऱ उन्होंने कई सालों तक रतनपुर पर शासन किया था। माना जाता है कि वह कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। कहा जाता है कि एक रात राजा के सपने में हनुमान जी आए और उन्हें मंदिर बनाने का निर्देश दिया। राजा ने मंदिर का निर्माण शुरू करवाया। जब मंदिर काम पूरा होने वाले था, तब राजा के सपने में फिर हनुमान जी आए और उन्हें महामाया कुंड से मूर्ति निकाल कर मंदिर में स्थापित करने के लिए कहा। राजा ने हनुमान जी के निर्देशों का पालन किया और कुंड से मूर्ति निकाली गई। लेकिन हनुमान जी की मूर्ति को स्त्री रूप में देखकर हैरान रह गए। फिर महामाया कुंड से निकली मूर्ति को पूरे विधि विधान से मंदिर में स्थापित किया गया। मूर्ति स्थापना के बाद राजा की बीमारी पूरी तरह से ठीक हो गई। रतनपुर में काफी ज्यादा गर्मी पड़ती है, इसलिए सर्दियों के दौरान आप यहां की यात्रा आना अच्छा रहेगा। 

इस जगह की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर और मार्च के बीच है। अगर आप ऐसे कई और विचित्र जगहों के बारे में देखना चाहते हैं, तो आपको एक बार छत्तीसगढ़ जरूर आना चाहिए। आप रतनपुर बेहद आसानी से पहुंच सकते हैं। यहां से सबसे निकटतम हवाई अड्डा रायपुर का स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट है, जो कि यहां से लगभग 140 किमी दूर है। यहां से बिलासपुर के लिए सीधी टैक्सी और बस सेवा उपलब्ध है। वहां से आप रतनपुर के लिए कैब ले सकते हैं। रतनपुर पहुँचने के लिए हवाई अड्डे से लगभग पाँच घंटे लगेंगे। बिलासपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है, जो रतनपुर (25 किमी दूर) की सेवा करता है। स्टेशन के बाहर से कैब और बसें आपके गंतव्य के लिए उपलब्ध हैं। </description><guid>49555</guid><pubDate>30-Mar-2026 7:10:52 pm</pubDate></item><item><title>राम जन्मभूमि के हनुमान मंदिर में 2 अप्रैल को होगा ध्वजारोहण</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49501</link><description>अयोध्या, हनुमान जयन्ती पर श्री रामजन्मभूमि मंदिर परिसर में बनाये गए हनुमान मंदिर पर ध्वजारोहण आयोजन करेगा। जिसमें बजरंग दल के अखिल भारतीय पूर्व अध्यक्ष मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री (दर्जा प्राप्त) वित्त चेयरमैन जयभानु सिंह पवैया तथा भाजपा नेता बजरंग दल के पूर्व अध्यक्ष विनय कटियार सहित पूर्व संयोजक डाक्टर सुरेंद्र जैन प्रकाश शर्मा सहित अन्य पूर्व वा वर्तमान बजरंग दल पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है ।

दो अप्रैल हनुमान जयंती पर आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम की कमान तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय ने अपने हाथों में ले रखी है। श्रीराय के अनुसार बजरंग दल के पूर्व पदाधिकारियों के साथ ही बजरंग दल के

पुराने सभी कार्यकर्ताओं को निमन्त्रित किया है। इसके अतिरिक्त अयोध्या के पचास से ऊपर सन्त महात्मा और पचास सम्मानित नागरिकों को भी आमंत्रित किया है। कार्यक्रम दिन में ग्यारह बजे प्रारम्भ होगा जो लगभग दो घंटे तक चलेगा ।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र पूर्व में आयोजित हो चुके कार्यक्रमों की भाँति इस हनुमान मंदिर के ध्वजारोहण के कार्यक्रम की तैयारी उसी प्रकार कर रही है जिस प्रकार उसने पूर्व में लोगों से पत्र और दूरभाष से संपर्क साधा और उन्हें सम्मान पूर्वक आमंत्रित किया था।

जन्मभूमि परकोटे के अंतर्गत हनुमान मंदिर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम को स्मरणीय बनाने के लिए ही बजरंग दल के पूर्व अध्यक्ष और संयोजकों को आमंत्रित कर ट्रस्ट की इतिहास रचने की तैयारी है।

ज्ञातव्य हो विनय कटियार और जयभानु सिंह पवैया मंदिर आंदोलन के फायर ब्रांड नेता रहे हैं। दोनों ने इसे व्यापक धार देकर युवाओं को जोड़ा और अपनी पहचान बनाई। पवैया ने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान जम्मू कश्मीर की अमरनाथ यात्रा पर आंतकी हमले की धमकी को स्वीकार करते हुए पचास हज़ार से ऊपर पंजीकृत बजरंगियों को साथ लेकर रुकी यात्रा को पुनः प्रारम्भ कराकर युवाओं में अपनी पहचान बना कर इतिहास रच दिया था। </description><guid>49501</guid><pubDate>28-Mar-2026 4:13:08 pm</pubDate></item><item><title>जन्मभूमि मंदिर में प्रभु श्रीराम का मनाया जन्मोत्सव, सूर्य की किरण ने किया मस्तकाभिषेक</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49444</link><description>अयोध्या, पूरे भारत सहित उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भी रामनवमी का पर्व बड़े उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।शुक्रवार को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर ठीक दोपहर 12 बजे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्रभु श्रीराम का प्रतीकात्मक जन्म मनायागया। श्रीराम के जन्म होने के बाद आरती उतारी गई।
 सूर्य की किरण ने श्रीरामलला का मस्तकाभिषेक किया और उसके बाद प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक किया गया। श्रीजन्मभूमि मंदिर में श्रीराम का जन्म होते ही पूरी अयोध्या में जमकर पटाखे छूटे।
 राम जन्मोत्सव पर पूरी अयोध्या में अभूतपूर्व उत्साह दिखा है। भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव में शामिल होने के अयोध्या पहुंचे बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं। मंदिर के मुख्य मार्ग पर संतों ने श्रद्धालुओं पर फूल बरसाए। </description><guid>49444</guid><pubDate>27-Mar-2026 3:10:29 pm</pubDate></item><item><title>चांपा के मां समलेश्वरी मंदिर में मध्यरात्रि विशेष पूजा, मां कालरात्रि को अर्पित हुई नींबू की माला</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49387</link><description>चांपा, चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर सप्तमी तिथि की मध्यरात्रि में चांपा स्थित प्रसिद्ध मां समलेश्वरी मंदिर में आस्था और भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिला। श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति के बीच मां जगदंबा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि की विधिवत विशेष पूजा-अर्चना की गई।

पूजन के दौरान विश्व कल्याण और लोक-हित की मंगल कामना के साथ विशेष अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस अवसर पर मां कालरात्रि को स्वेत बलि स्वरूप नींबू की माला अर्पित की गई, जिसे धार्मिक मान्यता के अनुसार अत्यंत शुभ और संकट निवारक माना जाता है।

मंदिर परिसर में देर रात तक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने मां के चरणों में अपनी मनोकामनाएं अर्पित कर सुख-समृद्धि और सुरक्षा का आशीर्वाद मांगा।

धार्मिक मान्यता के अनुसार मां कालरात्रि अपने भक्तों के सभी कष्टों का नाश कर उन्हें निर्भय बनाती हैं और जीवन में विजय का मार्ग प्रशस्त करती हैं। नवरात्रि के इस विशेष अवसर पर मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। </description><guid>49387</guid><pubDate>26-Mar-2026 2:13:17 pm</pubDate></item><item><title>नवरात्रि के बीच माता वैष्णो देवी मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ी, 2.4 लाख श्रद्धालुओं ने किये दर्शन</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49340</link><description>कटरा, श्री माता वैष्णो देवी के पवित्र मंदिर में बुधवार को भक्तों की भारी भीड़ देखी जा रही है, क्योंकि चल रहे चैत्र नवरात्रि उत्सव में देश भर से भक्तों की लगातार भीड़ उमड़ रही है। नवरात्रि के शुरुआती दिनों में 2.4 लाख श्रद्धालु पहले ही दर्शन कर चुके हैं और कटरा से भवन तक मार्ग पर तीर्थयात्रियों की आवाजाही लगातार बनी हुई है।

अधिकारियों ने बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और सुचारू आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए एहतियात के तौर पर पंजीकरण प्रक्रिया को निलंबित कर दिया था। स्थिति में सुधार और बेहतर भीड़ प्रबंधन के साथ पंजीकरण अब बहाल कर दिया गया है। श्री माता वैष्णो देवी की सुरक्षित और परेशानी मुक्त तीर्थयात्रा की सुविधा के लिए सुरक्षा कर्मियों, चिकित्सा टीमों और सहायक कर्मचारियों की पर्याप्त तैनाती सुनिश्चित की गई है। श्रद्धालुओं को उचित पंजीकरण के बाद ही यात्रा करने और प्रशासन के सभी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने की सलाह दी गई है।

श्री माता वैष्णो देवी जी के पवित्र मंदिर की तीर्थयात्रा के लिए पंजीकरण 21 मार्च की पूर्व संध्या पर भक्तों की भारी आमद के कारण अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया था, लेकिन 22 मार्च को सुबह 4 बजे फिर से शुरू हो गया। चूंकि नवरात्रि तीर्थयात्रा के लिए एक शुभ अवधि है, इसलिए आने वाले दिनों में तीर्थयात्रियों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। यात्रा पूरे जोरों पर है और त्रिकुटा पहाड़ियां 'जय माता दी' के जयकारों से गूंजती रहती हैं। नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति भक्तों के बीच मजबूत आस्था को दर्शाती है। चल रहे चैत्र नवरात्रि उत्सव के मद्देनजर श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि हुई है, इसलिए देश भर से हजारों भक्त माता वैष्णो देवी जी का आशीर्वाद लेने के लिए आ रहे हैं। </description><guid>49340</guid><pubDate>25-Mar-2026 3:22:40 pm</pubDate></item><item><title>नवरात्रि में मां समलेश्वरी के दरबार में उमड़ी आस्था, तिथि अनुसार विशेष भोग</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49274</link><description>जांजगीर-चांपा, चांपा शहर स्थित मां समलेश्वरी मंदिर नवरात्रि के पावन अवसर पर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। जमींदार परिवार द्वारा स्थापित इस मंदिर की महिमा अत्यंत निराली मानी जाती है। मान्यता है कि नवदाम्पत्य जीवन की शुरुआत से पहले हर जोड़ा यहां आकर माता के चरणों में शीश नवाता है और मां समलेश्वरी का आशीर्वाद लेकर ही अपने नए जीवन की शुरुआत करता है।

नवरात्रि के नौ दिनों तक मंदिर में तिथि अनुसार माता को विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं, जिनका धार्मिक महत्व भी अलग-अलग माना गया है। प्रतिपदा को घी का भोग लगाने से रोगों से मुक्ति मिलती है, द्वितीया को शक्कर का भोग दीर्घायु प्रदान करता है, तृतीया को दूध का भोग दुखों का नाश करता है और चतुर्थी को मालपुआ अर्पित करने से विघ्न और क्लेश दूर रहते हैं। पंचमी को केले का भोग बुद्धि और कौशल में वृद्धि करता है, षष्ठी को मधु से शांति मिलती है, सप्तमी को गुड़ का भोग शोक दूर करता है, अष्टमी को नारियल अर्पित करने से मानसिक ताप शांत होता है और नवमी को लाई का भोग लोक-परलोक में सुख-समृद्धि प्रदान करता है। महाअष्टमी की रात्रि में माता को नींबू की माला अर्पित करने की विशेष परंपरा भी यहां निभाई जाती है।

इसी कड़ी में चैत्र नवरात्र के अवसर पर 25 मार्च 2026, बुधवार को मां कालरात्रि पूजन का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह पूजन रात्रि 11:00 बजे से मां समलेश्वरी मंदिर परिसर में संपन्न होगा। आयोजन के दौरान महानिशा पूजन किया जाएगा तथा माता को विशेष रूप से नींबू की माला अर्पित की जाएगी। आयोजकों के अनुसार इस पूजन से श्रद्धालुओं को मनोवांछित फल, शत्रु बाधाओं से मुक्ति और स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।

मंदिर के इतिहास की जानकारी पंडित अतुल द्विवेदी ने देते हुए बताया कि वर्ष 1760 में तत्कालीन जमींदार विश्वनाथ सिंह द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उस समय हसदेव नदी का पूर्वी भाग ओडिशा के संबलपुर रियासत के अधीन था, जबकि पश्चिमी भाग रतनपुर रियासत में आता था। दोनों रियासतों के बीच हुए युद्ध में चांपा जमींदार परिवार के पूर्वजों ने रतनपुर का साथ दिया, जिसके बाद विजय के पश्चात यह क्षेत्र उन्हें प्रदान किया गया और चांपा जमींदारी की स्थापना हुई। इसके बाद धार्मिक आस्था को बनाए रखने के उद्देश्य से संबलपुर की प्रसिद्ध समलेश्वरी देवी का मंदिर चांपा में बनवाया गया और उन्हें कुलदेवी के रूप में स्थापित किया गया।

आज भी चैत्र और क्वांर नवरात्रि में यहां मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित किए जाते हैं और जवारा विसर्जन की अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां समलेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

मंदिर समिति ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे सपरिवार उपस्थित होकर मां कालरात्रि पूजन में शामिल हों और माता का आशीर्वाद प्राप्त करें। आयोजन को लेकर मंदिर परिसर में व्यापक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। </description><guid>49274</guid><pubDate>24-Mar-2026 1:48:55 pm</pubDate></item><item><title>पंचमी पर शीतला धाम में आस्था का ज्वार, तड़के खुले कपाट</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49239</link><description>मीरजापुर, चैत्र नवरात्र की पंचमी तिथि पर चुनार के अदलपुरा स्थित बड़ी शीतला माता धाम में सोमवार को आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट गए। मां स्कंदमाता के स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालु रात से ही कतारों में डटे रहे।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर के कपाट भोर तीन बजे मंगला आरती के बाद ही खोल दिए गए। इसके बावजूद दर्शन के लिए लंबी कतारें ऑटो स्टैंड, वाहन पार्किंग, रामलीला मैदान से लेकर शीतला धाम की गलियों, चौक और गंगा घाट तक फैली रहीं। हालात ऐसे रहे कि कई रास्तों पर जाम की स्थिति बन गई।

हाथों में नारियल, चुनरी, हलुआ-पूड़ी, पुआ और फूल-मालाएं लिए भक्त मां के जयकारे लगाते हुए एक झलक पाने को आतुर दिखे। गर्भगृह में इतनी भीड़ रही कि कई श्रद्धालु प्रसाद भी अर्पित नहीं कर सके, फिर भी मां के दर्शन मात्र से खुद को धन्य मानते रहे।

भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी। कोतवाल विजय शंकर सिंह, मेला प्रभारी उप निरीक्षक कुमार संतोष समेत पुलिस व पीएसी बल गर्भगृह से लेकर पूरे मेला क्षेत्र में मुस्तैद रहे।

चारों ओर गूंजते जयकारों और उमड़ी भीड़ ने शीतला धाम को आस्था के महाकुंभ में बदल दिया। </description><guid>49239</guid><pubDate>23-Mar-2026 4:20:36 pm</pubDate></item><item><title>नवरात्र चतुर्थी पर विंध्यधाम में आस्था का सैलाब, 09 लाख भक्तों ने किए दर्शन</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49238</link><description>मीरजापुर, चैत्र नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर रविवार को मां विंध्यवासिनी धाम में आस्था का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा। जगत कल्याणी मां के दरबार में शीश नवाने के लिए सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। अनुमानित करीब नौ लाख भक्तों ने दर्शन-पूजन कर मंगलकामना की।

भोर में मंगला आरती और श्रृंगार पूजन के बाद जैसे ही कपाट खुले, भक्तों की लंबी कतारें मंदिर तक पहुंच गईं। गंगा स्नान कर घंटों कतार में खड़े रहने के बाद श्रद्धालुओं ने मां के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया और भावविभोर हो उठे। पूरे दिन मंदिर परिसर घंटा-घड़ियाल, शंख और नगाड़ों की गूंज के साथ जय मां विंध्यवासिनी के जयकारों से गुंजायमान रहा।

त्रिकोण परिक्रमा पथ पर स्थित महाकाली और मां अष्टभुजी के दरबार में भी भारी भीड़ उमड़ी रही। अष्टभुजा पहाड़ और काली खोह पर दूर-दराज से आए संत-महात्मा और साधक पूजन-अनुष्ठान में तल्लीन दिखे। गुड़हल, कमल और गुलाब के पुष्पों से सजे देवी स्वरूप के दर्शन कर श्रद्धालु निहाल हो उठे।

गंगा घाटों पर भी स्नान-ध्यान के लिए श्रद्धालुओं का रेला लगा रहा। दर्शन के बाद श्रद्धालुओं ने विंध्य की गलियों में घूमकर प्रसाद व अन्य सामग्री की खरीदारी की। भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए।

श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त भोजन व ठहरने की व्यवस्था

जिला प्रशासन व आपूर्ति विभाग की ओर से विन्ध्य विद्यापीठ इंटर कॉलेज परिसर में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क बसेरा, टेंट, शौचालय, बिजली-पानी की व्यवस्था की गई है। साथ ही खाद्य एवं रसद विभाग की ओर से पूड़ी-सब्जी के स्टॉल लगाए गए हैं। कोटेदार संघ अध्यक्ष राजेंद्र जायसवाल ने बताया कि यह सेवा सुबह से रात तक निरंतर जारी है।

महाकाली दरबार में उमड़ी भीड़

चतुर्थी तिथि पर काली खोह पहाड़ स्थित महाकाली के दरबार में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। भव्य श्रृंगार के दर्शन कर भक्त भावविभोर हो उठे और मन्नतें मांगते नजर आए। कई श्रद्धालुओं ने परंपरा अनुसार लगूरों को चना-गुड़ खिलाकर पुण्य अर्जित किया।

अष्टभुजा पहाड़ पर लगी लंबी कतारें

अष्टभुजा पहाड़ पर स्थित मां अष्टभुजी के दर्शन के लिए भी लंबी कतारें लगी रहीं। श्रद्धालु नारियल, चुनरी और प्रसाद लेकर जयकारे लगाते हुए ऊपर चढ़ते नजर आए। कुछ श्रद्धालु रोपवे तो कुछ सीढ़ियों के माध्यम से मंदिर पहुंचे।

चाक-चौबंद सुरक्षा, एटीएस की निगरानी

नवरात्र मेले की सुरक्षा के मद्देनजर पूरे विंध्याचल धाम को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। सीसीटीवी कैमरों से 24 घंटे निगरानी की जा रही है। एंट्रेंस प्लाजा, परिक्रमा पथ, वीआईपी रोड और गंगा घाटों पर पुलिस व एटीएस के जवान मुस्तैद हैं। आनंद कुमार के नेतृत्व में 61 जवानों की टीम लगातार निगरानी में जुटी है, जबकि सादे वर्दी में भी पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। </description><guid>49238</guid><pubDate>22-Mar-2026 4:26:12 pm</pubDate></item><item><title>चंद्रघंटा स्वरूप के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब, विंध्य धाम में आस्था का सागर</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49237</link><description>मीरजापुर,चैत्र नवरात्र मेला के तीसरे दिन शनिवार को विंध्यधाम में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। मां विंध्यवासिनी के चंद्रघंटा स्वरूप के दर्शन के लिए भोर से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर खुलने से पहले ही विंध्य की गलियां भक्तों से पट गईं और हर ओर जय माता दी के जयकारे गूंजने लगे।

देश के कोने-कोने से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पहले गंगा घाटों पर स्नान-ध्यान किया, इसके बाद प्रसाद की दुकानों से नारियल, चुनरी, लाचीदाना आदि लेकर लंबी कतारों में लग गए। घंटों इंतजार के बाद गर्भगृह में पहुंचकर भक्तों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की।

मंदिर परिसर और परिक्रमा पथ पर भक्तों की भारी भीड़ रही। श्रद्धालुओं ने हवन कुंड और मंदिर के गुंबद की परिक्रमा कर पुण्य अर्जित किया। बड़ी संख्या में भक्त अष्टभुजा पहाड़ पर स्थित महाकाली और मां अष्टभुजी के दरबार में भी शीश नवाने पहुंचे। रंग-बिरंगे फूलों से सजे मंदिर और मां का दिव्य श्रृंगार भक्तों को भावविभोर कर रहा था।

वहीं, छतों पर साधक जोगिया वस्त्र धारण कर मंत्रोच्चार के बीच अनुष्ठान में लीन दिखे। सुरक्षा के लिए सीसीटीवी, मेटल डिटेक्टर और पुलिस-पीएसी के जवान मुस्तैद रहे। मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं ने खरीदारी कर उत्सव का आनंद भी लिया।

डीएम पवन कुमार गंगवार व एसपी अपर्णा रजत कौशिक ने भीड़ अधिक होने पर विशिष्ट दर्शन पास पर रोक लगाई, जिससे व्यवस्था नियंत्रण में लाई जा सके। हल्की बारिश के बाद देर रात करीब दो घंटे बिजली आपूर्ति बाधित रही, जिससे श्रद्धालुओं को परेशानी झेलनी पड़ी। गर्मी से परेशान श्रद्धालुओं को बदले मौसम ने राहत दी, बासंतिक नवरात्र में शारदीय जैसा सुहावना एहसास मिला। बारिश के बाद जलजमाव, अंधेरा और उभरी गिट्टी के चलते श्रद्धालुओं को आवागमन में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। </description><guid>49237</guid><pubDate>21-Mar-2026 4:23:07 pm</pubDate></item><item><title>मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन को देवीपाटन शक्तिपीठ पर उमड़ा आस्था का सैलाब</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49126</link><description>चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन भोर से ही मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन-पूजन के लिए प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। खराब मौसम और रुक-रुक कर हो रही बारिश व तेज हवा के बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। दूर-दराज क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु भारी संख्या में मां पाटेश्वरी देवी के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचे। मंदिर परिसर और आसपास के सभी मार्गों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। श्रद्धालुओं के वाहनों की अधिकता के कारण तुलसीपुर नगर में लगभग दो घंटे तक जाम की स्थिति बनी रही। ट्रैफिक को लेकर तैनात पुलिसकर्मियों को कड़ी में मशक्कत करनी पड़ी। सुरक्षा कर्मी लगातार व्यवस्था संभालने में जुटे रहे, वहीं श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन कराने के लिए विशेष इंतजाम किए गए। भारी भीड़ के बीच कतारबद्ध होकर श्रद्धालुओं ने मां के दरबार में अपनी आस्था प्रकट की।

श्रद्धालुओं ने पवित्र सरोवर सूर्यकुंड में स्नान कर जय मां पाटेश्वरी के जयघोष के साथ मंदिर में प्रवेश किया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। भक्तों की आस्था का आलम यह रहा कि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां भी उनके कदम नहीं रोक सकीं। भीड़ को देखते हुए मंदिर पीठाधीश्वर महराज मिथलेश नाथ योगी स्वयं व्यवस्थाओं पर नजर बनाए रहें, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसका विशेष ध्यान रखा गया। उल्लेखनीय है कि देवीपाटन में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर एक माह तक चलने वाला राजकीय मेला चल रहा है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यह शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में शामिल है। मान्यता है कि यहां मां सती का वाम स्कंध पट सहित ( वांया कंधा) गिरा था, जिसके कारण यहां विराजमान देवी को मां पाटेश्वरी के रूप में पूजा जाता है।

पंचमी को देवीपाटन पहुंचेंगी पात्र देवता रतननाथ योगी महाराज की प्रसिद्ध यात्रा

शक्तिपीठ देवीपाटन में हर वर्ष की भांति चैत्र नवरात्रि की पंचमी को नेपाल के दांग चौखड़ा से आने वाली प्रसिद्ध रतन नाथ योगी महाराज ( पात्र देवता) की शोभायात्रा नवरात्रि की पंचमी को पहुंचेगी। पात्र देवता की यात्रा नेपाल से चलकर शनिवार को जनपद के नेपाल सीमा के पास स्थित जनकपुर में मुक्तेश्वर नाथ महादेव मंदिर में पहुंचेगी । यहां दो दिन विश्राम के उपरांत यात्रा देवीपाटन मंदिर नवरात्रि की पंचमी को पहुंचेगी। रतन नाथ योगी महाराज पात्र देवता के दर्शन पूजन के लिए श्रद्धालु पूरा वर्ष इंतजार करते है। </description><guid>49126</guid><pubDate>20-Mar-2026 6:09:56 pm</pubDate></item><item><title>सनातन परंपरा के पुनर्जागरण का ऐतिहासिक क्षण, अयोध्या में रामनवमी पर होगा 1251 कुण्डीय महायज्ञ</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49078</link><description>अयोध्या, भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या एक बार फिर इतिहास के स्वर्णिम पलों की साक्षी बनने जा रही है। यहां 20 से 28 मार्च तक यहां 1251 कुण्डीय श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ सह हनुमत्-श्रीराम महायज्ञ हाेगा। यह एक यज्ञ न केवल एक धार्मिक आयोजन होगा, बल्कि वैदिक परंपरा और सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक भी बनेगा।

आयोजन के संयोजक महायज्ञ समिति के अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने बताया कि यह महायज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के वैश्विक संदेश को पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। उन्होंने कहा कि अयोध्या की पावन भूमि से उठने वाली यह आस्था की ध्वनि पूरे विश्व में सनातन के मूल्यों को पहुंचाएगी। रामनवमी के दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव को वैदिक विधि-विधान से मनाया जाएगा। इस दौरान भजन-कीर्तन, संतों के प्रवचन और धार्मिक कथाएं पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देंगी। सनातन परंपरा के बल पर आध्यात्मिक महाशक्ति भारत फिर विश्वगुरु बनेगा।

दरअसल, अयोध्या में होने वाला यह महायज्ञ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उस सनातन परंपरा का पुनर्स्मरण है, जिसने भारत को युगों तक आध्यात्मिक विश्वगुरु बनाए रखा। अब एक बार फिर रामनगरी से वही ज्योति प्रज्वलित होने जा रही है, जो आस्था, संस्कृति और मानवता का मार्ग आलोकित करेगी।

उल्लेखनीय है क रामनवमी के पावन पर्व के साथ होने वाला यह आयोजन उस गौरवशाली परंपरा को जीवंत करेगा, जब यज्ञ, तप और भक्ति भारत की आत्मा हुआ करते थे। 1251 कुण्डों में एक साथ दी जाने वाली आहुतियां पूरे वातावरण को वैदिक मंत्रों से गुंजायमान करेंगी, मानो त्रेता युग की स्मृतियां पुनः साकार हो उठें। इस महाआयोजन के साथ श्रीरामानुजाचार्य सहस्त्राब्दी जयंती महोत्सव भी मनाया जाएगा, जिनकी शिक्षाओं ने भारतीय भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी और समाज को भक्ति, समर्पण और समरसता का संदेश दिया। महायज्ञ में प्रमुख रूप से लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी की पावन उपस्थिति रहेगी। उनके सान्निध्य में वैदिक अनुष्ठान, कथा-प्रवचन और गुरु परंपरा का वंदन श्रद्धालुओं को सनातन धर्म की गहराई से जोड़ने का कार्य करेगा। </description><guid>49078</guid><pubDate>19-Mar-2026 2:46:53 pm</pubDate></item><item><title>चैत्र नवरात्रा गुरूवार से, पालकी में सवार होकर आएगी देवी मां</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=49038</link><description>मंदिरों व घरों में घट स्थापना के साथ ही चैत्र नवरात्रा गुरुवार से शुरू हो जाएंगे। नवरात्रा में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का विशेष महत्व है। इस बार मां अपने भक्तों से मिलने पालकी (डोली) पर सवार होकर आ रही है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, गुरुवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता पालकी में आती हैं, जो शुभता के साथ थोड़ा धैर्य और सावधानी बरतने का संकेत भी है। वही माता की विदाई हाथी पर होगी, जो भारी वर्षा और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का भी आरंभ होगा।

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष के राजा बृहस्पति और मंत्री मंगल साहस और उग्रता के प्रतीक हैं। गुरु के राजा होने से इस साल की शुरुआत में सोने-चांदी के भावों में उतार देखने को मिलेगा। पूरे साल उतार-चढ़ाव की स्थितियां बनी रहेंगी। ज्योतिषों के अनुसार अमावस्या के बाद प्रतिपदा को गुरुवार होना भारत के लिए अनुकूल रहेगा। राजा बृहस्पति होने से प्रभावों की तीव्रता सीमित रहेगी और सामाजिक संतुलन बना रहेगा। मंत्री मंगल होने से अपराध और रोगों में वृद्धि की संभावना देखी जा रही है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में रहेगी।

घट स्थापना का मुहूर्त

चैत्र नवरात्रि 2026 में घटस्थापना के समय प्रतिपदा तिथि 18 मार्च को रात 09.34 बजे से 19 मार्च रात 10.15 बजे तक रहेगी। इस दौरान 19 मार्च 6 को घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6.52 से 10.10 बजे तक रहेगा। इस समय घटस्थापना न हो पाए तो अभिजीत मुहूर्त में भी किया जा सकता है, जो दोपहर 11.47 से 12.36 बजे तक उपलब्ध रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। पूरे नौ दिन सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

मेहरानगढ़ में इस तरह रहेगी दर्शनों की व्यवस्था

मेहरानगढ़ दुर्ग प्रशासन के निर्देशानुसार चामुंडा मंदिर में सुबह 7 बजे से सायं 5 बजे तक दर्शनों की व्यवस्था रहेगी। मंदिर में दर्शनार्थियों के शराब पीकर आने व साथ लाने पर पूर्णतया प्रतिबंध होगा व पॉलिथीन बैग लेकर आना मना होगा। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के प्रशासनिक अधिकारी कर्नल अजय सिंह शेखावत ने बताया कि 19 मार्च को सप्तवर्ती पाठ का संकल्प व स्थापना के मुहूर्त के दौरान सुबह 11.21 बजे पूर्व नरेश गज सिंह व हेमलता राज्ये महरानगढ़ दुर्ग के चामुंडा माता के दर्शन व पूजा अर्चना करेंगे। मंदिर के पास उपासनालय कक्ष में नौ वेद पाठी ब्राह्मण 19 मार्च को नवरात्रा स्थापना से अष्टमी तक दुर्गा पाठ का वाचन करेंगे।

अष्टमी पर 26 मार्च की रात हवन प्रारंभ होगा, जिसकी पूर्णाहुति नवमी पर 27 मार्च को सुबह 11.15 बजे से 12.25 के मध्य गज सिंह व हेमलता राज्ये द्वारा की जाएगी। नवमी पर 27 मार्च को दोपहर 12.25 से 12.35 बजे तक तिलक आरती व उसके पश्चात थापनाजी के उत्थापना का मुहूर्त है।

प्रशासन के निर्देशानुसार प्रतिवर्ष की तरह नवरात्रा की सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया गया है। जय पोल के बाहर से ही एक पंक्ति में दर्शन के लिए लाइन व्यवस्था की गई है जो चामुंडा माताजी मंदिर तक रहेगी। डीएफएमडी गेट से ही जय पोल व फतेह पोल से दर्शनार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा। पट्टे पर महिलाओं, बच्चों वृद्धजनों के लिए आने-जाने की व्यवस्था की गई है व वहीं से जाएंगे व वापिस आएंगे। पुरुष एवं युवाओं के लिए सलीम कोट से होते हुए बसंत सागर से आने-जाने की व्यवस्था की गई है। </description><guid>49038</guid><pubDate>18-Mar-2026 6:31:14 pm</pubDate></item><item><title>गणगौर का पर्व: दांपत्य सुख और सौभाग्य का रहस्य</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48983</link><description>चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर पूजा की जाती है। वर्ष 2026 में यह पर्व 21 मार्च को मनाया जाएगा। गणगौर में गण का अर्थ भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती होता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने पर अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है और विवाहित महिलाओं के पति की आयु व स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।
मुहूर्त:
तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को सुबह 2:30 बजे शुरू होकर रात 11:55 बजे समाप्त होगी।
पूजा का शुभ समय सुबह 7:55 से 9:26 बजे तक रहेगा।
महत्व, इतिहास और पूजा विधि
धार्मिक मान्यता के अनुसार गणगौर पूजा से दांपत्य जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि आती है। यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में धूमधाम से मनाया जाता है। राजस्थान में यह 18 दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जो होली के बाद शुरू होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी पर आए, तब गांव की स्त्रियों ने उनकी श्रद्धा से पूजा की। प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उन्हें सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया, तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
पूजा विधि:
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और घर में शिव-पार्वती (ईसर-गौरा) की प्रतिमा स्थापित करें। माता गौरी को सिंदूर, हल्दी, मेहंदी, फूल और श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। गुड़ और मीठे पकवान का भोग लगाकर कथा सुनें और आरती करें। इस दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और कई जगहों पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है।
यह पर्व महिलाओं के लिए प्रेम, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। </description><guid>48983</guid><pubDate>17-Mar-2026 4:03:55 pm</pubDate></item><item><title>ज्ञान से निर्वाण तक भारत के 8 प्रसिद्ध बौद्ध मठों</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48943</link><description>महाबोधि मंदिर बिहार के गया जिले में स्थित बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भव्य तीर्थ स्थल है। यही वह पवित्र स्थान है जहां लगभग 2500 वर्ष पहले सिद्धार्थ गौतम ने कठोर तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए। बोधगया में स्थित यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और दुनिया भर के बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में स्थित महापरिनिर्वाण मंदिर भी बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। माना जाता है कि यहीं पर गौतम बुद्ध ने 482 ईसा पूर्व में महापरिनिर्वाण यानी अंतिम मुक्ति प्राप्त की थी। इस मंदिर की सबसे विशेष आकर्षण लगभग 20 फुट लंबी बुद्ध की लेटी हुई विशाल प्रतिमा है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से उनकी मुक्ति का प्रतीक मानी जाती है। मंदिर परिसर में कई स्तूप और मठ मौजूद हैं, जिनमें रामभर स्तूप भी शामिल है, जिसे बुद्ध का अंतिम संस्कार स्थल माना जाता है।
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पास मैक्लोडगंज में स्थित नामग्याल मठ 14वें दलाई लामा का निजी मठ है और तिब्बत के बाहर तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। इसकी स्थापना मूल रूप से 1575 में तीसरे दलाई लामा द्वारा की गई थी, जबकि 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद इसे भारत में पुनः स्थापित किया गया।
अरुणाचल प्रदेश में लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित तवांग मठ भारत का सबसे बड़ा और पोटाला पैलेस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मठ माना जाता है। इसकी स्थापना 168081 में मेराक लामा लोद्रे ग्यात्सो ने की थी। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय से जुड़ा हुआ है और यहां 300 से अधिक भिक्षु रहते हैं। यह मठ एक महत्वपूर्ण धार्मिक और शिक्षण केंद्र के रूप में भी कार्य करता है।
हिमाचल प्रदेश की दूरस्थ स्पीति घाटी में स्थित ताबो मठ भारत के सबसे प्राचीन जीवित बौद्ध स्थलों में से एक है। इसकी स्थापना 996 ईस्वी में पश्चिमी हिमालय के गुगे साम्राज्य के राजा येशे-ओ ने करवाई थी। अपने अद्भुत भित्ति चित्रों और प्राचीन कलाकृतियों के कारण इसे अक्सर हिमालय का अजन्ता भी कहा जाता है।
सिक्किम की राजधानी गंगटोक के पास स्थित रुमटेक मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के कर्मा काग्यू परंपरा का प्रमुख केंद्र है। इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में 9वें कर्मापा द्वारा किया गया था और इसे तिब्बत के प्रसिद्ध त्सुरफू मठ की प्रतिकृति माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में स्थित वाट थाई मंदिर भारत और थाईलैंड के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। इसका निर्माण 1990 में थाईलैंड के राजा की भारत यात्रा की स्मृति में किया गया था। यह मंदिर थाई और भारतीय स्थापत्य शैली के सुंदर मिश्रण को दर्शाता है, जिसमें सुनहरे शिखर, बारीक नक्काशी और बुद्ध के जीवन से जुड़े दृश्यों को दर्शाने वाली मूर्तियां शामिल हैं।
लद्दाख के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित हेमिस मठ भारत के सबसे प्रसिद्ध और बड़े बौद्ध मठों में से एक है। इसकी स्थापना 1672 में लद्दाख के राजा सेंगे नामग्याल के शासनकाल में हुई थी। यह मठ तिब्बती बौद्ध धर्म की द्रुकपा परंपरा से संबंधित है और धार्मिक गतिविधियों तथा त्योहारों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। </description><guid>48943</guid><pubDate>16-Mar-2026 7:02:50 pm</pubDate></item><item><title>भारत के पहले ज्योतिर्लिंग का इतिहास: सोमनाथ मंदिर</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48812</link><description>सोमनाथ मंदिर भारत के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रभास पाटन, वेरावल के समुद्र तट पर स्थित एक अत्यंत पवित्र हिन्दू तीर्थस्थल है। यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है और हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए आस्था, शक्ति और धर्म की पहचान रहा है।
नाम और पौराणिक महत्व:
सोमनाथ का अर्थ है सोम का भगवान या चंद्रमा का ईश्वर, और इसे भगवान शिव का रूप माना जाता है जिसने चंद्रदेव की भक्ति को स्वीकार किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रदेव (चंद्रमा) ने अपनी पत्नी रोहिणी के कारण अपने सौंदर्य को खो दिया था और स्पष्टीकरण पाने के लिए भगवान शिव की पूजा के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपना वरदान दिया, और इसी वजह से यह स्थान शिवभक्ति का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया। 
इतिहास में मंदिर का महत्व और पुनर्निर्माण:
सोमनाथ मंदिर की प्राचीनता का संकेत पौराणिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण, शिव पुराण और भागवत पुराण में भी मिलता है, जो इसे हिन्दू धर्म में अत्यंत प्रतिष्ठित बनाते हैं। मंदिर के इतिहास में बार‑बार उसके तोड़ने और पुनर्निर्मित होने का दौर रहा है। इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन समय से ही यह मंदिर कई शासकों द्वारा बनाया और बार‑बार नष्ट किया गया है। 
सबसे प्रसिद्ध विनाश 1026 ईस्वी में महमूद गज़नी के आक्रमण के रूप में दर्ज है, जब मंदिर को लूटा और इसके खजाने को हड़प लिया गया। उसी समय मंदिर के विशाल धन, सोने‑चांदी और जेवरात को ले जाने का वर्णन मिलता है।  मंदिर को उसके बाद कई अन्य शासकों ने भी नुकसान पहुंचाया, जिनमें अलाउद्दीन खिलजी, जफर खान, मुजफ्फर शाह, और मुगल बादशाह औरंगज़ेब शामिल हैं। इन आक्रमणों के दौरान मंदिर कई बार नष्ट किया गया। 
इतिहासकारों के अनुसार मंदिर को कुल मिलाकर करीब 17 बार नुकसान और पुनर्निर्माण का सामना करना पड़ा, और परंपरागत रूप से हर बार यह फिर से बहाल किया गया। प्रत्येक पुनर्निर्माण ने मंदिर को और भी अधिक भव्य बनाया। 
आधुनिक पुनर्निर्माण और स्वतंत्र भारत में भूमिका:
भारत की आज़ादी के बाद, देश की राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक आत्म‑गौरव को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा में भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करने का निर्णय लिया। उन्होंने इस महान ऐतिहासिक स्थल को फिर से स्थापित करने के लिए प्रयास शुरू किए। प्रख्यात वास्तुकार प्रभाषंकरभाई ओघड़भाई सोमपुरा ने इसे पुनर्निर्मित करने का कार्य संभाला और 1947 से 1951 के बीच वर्तमान मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। 
वर्तमान मंदिर मारु‑गुर्जर शैली (चौलुक्य शैली) में निर्मित किया गया है, जिसमें विस्तृत नक्काशी, विस्तृत गोली और मंदिर का भव्य शिखर है। यह निर्माण वास्तुशिल्प के ऐसे स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें हिंदू मंदिरों की प्राचीन कला और शिल्पकला का सुंदर सम्मिलन दिखाई देता है। 
जब मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा हुआ, तब 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन भी किया। इसके बाद से सोमनाथ मंदिर देश और विदेश से आने वाले लाखों भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। 
आधुनिक समय में मंदिर का महत्व:
आज सोमनाथ मंदिर न केवल हिंदू धर्मियों के लिए तीर्थ यात्रा का मुख्य स्थान है, बल्कि यह भारत की धार्मिक सहनशीलता, सांस्कृतिक मजबूती और ऐतिहासिक धरोहर की प्रतीक भी माना जाता है। हाल ही में 2026 में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के कार्यक्रम आयोजित किए गए, जो मंदिर के प्रथम recorded आक्रमण को एक हजार वर्ष पूरा होने पर आयोजित किए गए और इस दौरान देश में इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को फिर से याद किया गया। </description><guid>48812</guid><pubDate>13-Mar-2026 5:59:59 pm</pubDate></item><item><title>गर्मियों की छुट्टियों में घूमने का है प्लान, ये हैं भारत के 8 एकदम कूलेस्ट ठिकाने</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48755</link><description>











गर्मियों में भारत के कई हिस्सों में तापमान बहुत बढ़ जाता है और लोग गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ों और ठंडी जगहों की ओर भागते हैं. अगर आप इस गर्मी में छुट्टियों का प्लान कर रहे हैं और सोच रहे हैं कि कहां जाएं जहां मौसम ठंडा और मन को शांत करने वाला हो, तो आइए आज हम आपको भारत के 8 ऐसे शानदार ठिकानों के बारे में बताते हैं जहां गर्मियों में भी तापमान कम रहता है और यहां आप गर्मियों की छुट्टियों में घूमने का प्लान बना सकते हैं
तीर्थन वैली ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के पास स्थित है और अभी बहुत कम लोग इसे जानते हैं. यह जगह शांतिपूर्ण और प्राकृतिक सौंदर्य से भरी हुई है. यहां गर्मियों में तापमान 10C से 25C के बीच रहता है. आप यहां रिवर क्रॉसिंग, ट्रेकिंग और रॉक क्लाइम्बिंग जैसी मजेदार गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं. दिल्ली से तीर्थन वैली की यात्रा सिर्फ एक रात की है, इसलिए आप जल्दी पहुंच सकते हैं और गर्मियों की गर्मी से राहत पा सकते हैं.
चेरापूंजी नेचर लवर्स के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. यहां गर्मियों में तापमान 15C से 23C रहता है. यह जगह अपने खूबसूरत झरनों और हरियाली के लिए मशहूर है. आप यहां डबल डेकर रूट ब्रिज देख सकते हैं और छोटे-छोटे गांवों की सफाई और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकते हैं.
तमिलनाडु का यह हिल स्टेशन अपने चाय के बागानों के लिए बहुत प्रसिद्ध है. यहां का मौसम गर्मियों में भी बहुत अच्छा रहता है और तापमान 20C से 25C के बीच रहता है. कुन्नूर में आप नीलगिरी माउंटेन रेलवे लाइन और चाय के बागानों में घूम सकते हैं. अगर आप शांत वातावरण चाहते हैं, तो रिजॉर्ट में बैठकर यहां की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेना भी मजेदार होगा.
तवांग अपनी खूबसूरत मोनेस्ट्री और प्राकृतिक दृश्यों के लिए जाना जाता है. यहां गर्मियों में तापमान 5C से 21C तक रहता है. यह जगह नेचर लवर्स और फोटोग्राफी शौकीनों के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. अगर आप गर्मी से बचना चाहते हैं और ठंडी वादियों का आनंद लेना चाहते हैं, तो तवांग आपके लिए बेहतरीन ऑप्शन है.
कसोल कुल्लू घाटी का एक छोटा सा गांव है जो ट्रेकर्स, बैकपैकर्स और नेचर लवर्स के बीच काफी लोकप्रिय है. यहां गर्मियों में तापमान 18C से 25C तक रहता है. आप मणिकरण गुरुद्वारा, पार्वती नदी और तोश गांव घूम सकते हैं. इसके अलावा कसोल खीरगंगा ट्रेक के लिए भी मशहूर है. यहां भारतीयों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में आते हैं.


औली भारत के सबसे ठंडे स्थलों में से एक है. यह जगह स्कीइंग और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती है.गर्मियों में भी यहां का तापमान 25C से कम रहता है. हरे-भरे जंगलों और बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच आप गर्मी को भूल जाएंगे.



मिरिक पश्चिम बंगाल का एक खूबसूरत हिल स्टेशन है. यहां आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिता सकते हैं, गर्मियों में तापमान 10C से 20C तक रहता है. मिरिक लेक, ऑरेंज ऑर्चिड, बुंगकुलुं और चाय के बागान यहां की प्रमुख आकर्षण हैं.

सिक्किम की राजधानी गंगटोक अपने शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है. यहां गर्मियों में भी तापमान 25C से कम रहता है. गंगटोक में आप सुंदर जगहों की सैर कर सकते हैं और यहां के लोकल खाने का आनंद भी ले सकते हैं.
















 </description><guid>48755</guid><pubDate>12-Mar-2026 3:37:15 pm</pubDate></item><item><title>भारत के अनोखे रेगिस्तान: थार से अलग 5 जगहें जहां दिखता है प्रकृति का अनोखा रूप</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48700</link><description>भारत में रेगिस्तान की बात होते ही सबसे पहले राजस्थान का थार रेगिस्तान और जैसलमेर की सुनहरी रेत याद आती है। ऊंट सफारी और रेत के टीलों का रोमांच लंबे समय से देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में थार के अलावा भी कई ऐसे इलाके हैं, जहां रेगिस्तान बिल्कुल अलग रूप में दिखाई देता है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं यह रेगिस्तान बर्फीले पहाड़ों के बीच मौजूद है, तो कहीं सफेद नमक के मैदानों के रूप में फैला हुआ है। कुछ जगहों पर लाखों साल पुराने जीवाश्म मिलते हैं, तो कहीं लाल रेत के टीलों का अनोखा नजारा देखने को मिलता है। यही कारण है कि ये जगहें सामान्य रेगिस्तान से बिल्कुल अलग अनुभव देती हैं। अगर आप भी हर बार की रेगिस्तान यात्रा से हटकर कुछ नया एक्सप्लोर करना चाहते हैं, तो भारत की ये खास जगहें जरूर देखनी चाहिए।
1. लद्दाख का कोल्ड डेजर्ट और शानदार स्टारगेजिंग
लद्दाख को अक्सर भारत का कोल्ड डेजर्ट कहा जाता है। ऊंचाई पर स्थित यह इलाका बर्फ से ढके पहाड़ों और सूखे परिदृश्य के कारण किसी दूसरे ग्रह जैसा महसूस होता है। खासतौर पर नुब्रा वैली के आसपास का क्षेत्र अपने अनोखे रेगिस्तानी वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
यहां की सबसे खास बात रात का आसमान है। कम लाइट पॉल्यूशन और साफ वातावरण के कारण यहां स्टारगेजिंग का अनुभव बेहद शानदार होता है। लद्दाख घूमने का सबसे अच्छा समय मई से सितंबर के बीच माना जाता है।
2. कच्छ का रण: सफेद नमक का अद्भुत रेगिस्तान
गुजरात में फैला ग्रेट रण ऑफ कच्छ अपने विशाल सफेद नमक के मैदानों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मानसून के बाद जब यहां का पानी सूख जाता है, तो दूर-दूर तक फैला सफेद नमक का मैदान दिखाई देता है।
दिन में धूप में चमकता यह इलाका और रात में चांदनी में चांदी की तरह चमकता है। यहां हर साल आयोजित होने वाला रण उत्सव भी पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इस जगह घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी के बीच होता है।
3. धोलावीरा के पास वुड फॉसिल पार्क
गुजरात के कच्छ क्षेत्र में धोलावीरा के पास स्थित वुड फॉसिल पार्क एक अलग तरह का रेगिस्तानी अनुभव देता है। यहां जमीन के भीतर लाखों साल पुराने समुद्री जीवों के अवशेष और जीवाश्म पाए गए हैं।
ये अवशेष बताते हैं कि कभी यह इलाका समुद्र के नीचे हुआ करता था। इस जगह की खासियत यह है कि यहां रेगिस्तान के बीच इतिहास और भूगोल दोनों को करीब से समझने का मौका मिलता है। यहां जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच है।
4. नागालैंड-मणिपुर सीमा की जुकू वैली
नागालैंड और मणिपुर की सीमा पर स्थित जुकू वैली पारंपरिक रेगिस्तान जैसी नहीं है, लेकिन यहां की जलवायु और खुला परिदृश्य इसे एक अनोखा सूखा इलाका बनाते हैं। यह एक ऊंचाई पर स्थित घास का मैदान है, जो मौसम के अनुसार अपना रूप बदलता रहता है।
मानसून के दौरान यहां हरियाली और फूलों की खूबसूरत चादर दिखाई देती है, जबकि सर्दियों में यह इलाका शांत और अपेक्षाकृत सूखा नजर आता है। यहां ट्रैकिंग के लिए अक्टूबर से अप्रैल का समय सबसे बेहतर माना जाता है।
5. तमिलनाडु का थेरी काडू: लाल रेत का रेगिस्तान
तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में स्थित थेरी काडू अपने लाल रंग के रेत के टीलों के लिए प्रसिद्ध है। यहां की रेत में आयरन की अधिक मात्रा होने के कारण इसका रंग लाल दिखाई देता है, जिससे यह बाकी रेगिस्तानों से बिल्कुल अलग लगता है।
इसे रेड सैंड डेजर्ट भी कहा जाता है। इस इलाके में लाल रेत के टीलों के बीच नारियल और ताड़ के पेड़ तथा छोटे-छोटे गांव एक बेहद अनोखा दृश्य पेश करते हैं। </description><guid>48700</guid><pubDate>11-Mar-2026 12:23:36 pm</pubDate></item><item><title>श्रीलंका की पहाड़ियों में स्थित भक्त हनुमान मंदिर: आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48674</link><description>श्रीलंका को अक्सर हिंद महासागर का मोती कहा जाता है। यह देश अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऊंचे पहाड़ों, विशाल चाय बागानों और समृद्ध संस्कृति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। भारत और श्रीलंका के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी सदियों पुराने हैं। इसी कारण यहां कई ऐसे पवित्र स्थल हैं जो भारतीय धार्मिक परंपराओं और कथाओं से जुड़े हुए हैं।
इन्हीं में से एक है Ramboda घाटी में स्थित Bhakta Hanuman Temple, जो पहाड़ों के बीच बसा एक शांत और सुंदर मंदिर है। यह स्थान केवल श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेमियों और यात्रियों के लिए भी बेहद खास माना जाता है।
सादगी भरी वास्तुकला और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य
भक्त हनुमान मंदिर की वास्तुकला भले ही बहुत भव्य न हो, लेकिन इसकी सादगी ही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। मंदिर के प्रवेश द्वारों पर की गई बारीक नक्काशी इसे विशेष बनाती है।
मंदिर के चारों ओर फैली प्राकृतिक सुंदरता यहां आने वाले हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर देती है। दूर-दूर तक फैली पहाड़ियां, घने जंगल और हरे-भरे चाय के बागान इस स्थान को बेहद मनमोहक बनाते हैं। साफ मौसम में यहां से दूर चमकती झील भी दिखाई देती है। शाम के समय आसमान में बिखरते रंग इस जगह को किसी सुंदर चित्र जैसा बना देते हैं।
रामायण से जुड़ा इस स्थान का महत्व
रामबोडा घाटी का उल्लेख प्राचीन हिंदू महाकाव्य रामायण में भी मिलता है। मान्यता है कि जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे थे, तो उन्होंने सबसे पहले इसी स्थान पर कदम रखा था।
कहा जाता है कि समुद्र पार करके लंका पहुंचने के बाद हनुमान जी ने यहां थोड़ी देर विश्राम किया था। इसके बाद वे सीता माता की खोज में आगे बढ़े।
सीता अम्मन मंदिर और पवित्र धारा
भक्त हनुमान मंदिर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर Seetha Amman Temple स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां बहने वाली एक छोटी धारा के किनारे माता सीता प्रतिदिन प्रार्थना किया करती थीं।
नदी के पास मौजूद कुछ चट्टानों पर स्थानीय लोग हनुमान जी के पदचिह्न होने का दावा भी करते हैं। माना जाता है कि जब हनुमान जी सीता माता से मिले और उन्हें भगवान राम की अंगूठी दी, तब उनके पैरों के निशान वहां पड़ गए थे।
रामबोडा नाम का अर्थ
कुछ इतिहासकारों के अनुसार रामबोडा नाम तमिल शब्द रामपडाई से निकला है, जिसका अर्थ होता है राम की सेना। एक मान्यता यह भी है कि लंका के राजा रावण के साथ युद्ध से पहले भगवान राम ने अपनी सेना को इसी क्षेत्र में एकत्र किया था।
कब बना भक्त हनुमान मंदिर
रामबोडा में स्थित यह मंदिर बहुत प्राचीन नहीं है। इसका निर्माण वर्ष 1999 में Chinmaya Mission द्वारा कराया गया था।
यह मंदिर श्रीलंका के प्रसिद्ध पहाड़ी शहर Nuwara Eliya से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यह क्षेत्र अपने विशाल चाय बागानों और ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है।
यात्री यहां पहुंचने के लिए Nanu Oya Railway Station तक ट्रेन से आ सकते हैं। वहां से टैक्सी लेकर मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। </description><guid>48674</guid><pubDate>10-Mar-2026 2:25:14 pm</pubDate></item><item><title>पहाड़ों में घूमने का है मन, ये हैं भारत के Hidden हिल स्टेशन, पैसों से सस्ते और नेचर में रिच</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48615</link><description>जब भी मन थक जाता है और शांति की तलाश होती है, तो सबसे पहले दिमाग में पहाड़ों का ख्याल आता है. ठंडी हवा, हरियाली, बादल और सुकू, यही पहाड़ों की पहचान है. हालांकि, शिमला, मनाली, नैनीताल जैसे हिल स्टेशन बहुत मशहूर हैं, लेकिन वहां भीड़ और खर्च दोनों ज्यादा हो गए हैं. ऐसे में बहुत से लोग चाहते हैं कि कोई ऐसी जगह मिले जहां कम पैसे में, कम भीड़ में और ज्यादा सुकून के साथ छुट्टियां बिताई जा सके. अच्छी बात ये है कि भारत में ऐसे कई Hidden हिल स्टेशन हैं, जो अब भी भीड़-भाड़ से दूर हैं और जेब पर भारी भी नहीं पड़ते तो आइए भारत के ऐसे ही खूबसूरत और सस्ते हिल स्टेशनों के बारे में जानते हैं.
वट्टाकनाल, तमिलनाडु के मशहूर हिल स्टेशन कोडाईकनाल के पास स्थित एक छोटा और बेहद शांत इलाका है. यह जगह चारों ओर से हरे-भरे जंगलों और पहाड़ियों से घिरी हुई है. यहां पर्यटकों की भीड़ बहुत कम होती है, इसलिए जो लोग शांति और अकेलेपन में प्रकृति का आनंद लेना चाहते हैं, उनके लिए यह जगह परफेक्ट है. यहां इजराइली पर्यटक ज्यादा आते हैं, इसी वजह से इसे छोटा इजराइल भी कहा जाता है.


कर्सियांग, दार्जिलिंग के पास स्थित एक खूबसूरत लेकिन कम भीड़ वाला हिल स्टेशन है. इसे लैंड ऑफ व्हाइट ऑर्किड्स भी कहा जाता है. यहां फैले चाय के बागान और ठंडा मौसम मन को बहुत सुकून देते हैं. यहां दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की सवारी का मज़ा भी लिया जा सकता है. जो लोग दार्जिलिंग की भीड़ से बचना चाहते हैं, उनके लिए कर्सियांग एक बेहतरीन ऑप्शन है.


कल्पेट्टा, केरल के वायनाड जिले में स्थित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के लिए जाना जाता है. यह जगह चाय और कॉफी के बागानों से घिरी हुई है. यहां से चेम्ब्रा पीक और घने जंगलों का नजारा देखने को मिलता है. नेचर लवर्स और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है.


अराकू घाटी आंध्र प्रदेश में स्थित है और अपने जनजातीय (ट्राइबल) कल्चर के लिए काफी मशहूर है. यहां ठंडी हवा, रंग-बिरंगे फूल, झरने और गुफाएं देखने को मिलती हैं. आप यहां बोरा गुफाएं देख सकते हैं और ट्राइबल म्यूजियम में स्थानीय संस्कृति को करीब से जान सकते हैं. यह जगह प्रकृति और संस्कृति दोनों का सुंदर मेल है.


उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है और यहां कई ऐसे हिल स्टेशन हैं जो बजट में घूमने के लिए बेहतरीन हैं. जैसे भीमताल नैनीताल से शांत और सस्ता, झील, बोटिंग और ट्रेकिंग के लिए मशहूर, चकराता देहरादून के पास स्थित, भीड़ से दूर और नेचर से भरपूर, अल्मोड़ा हिमालय की वादियों से घिरा, मंदिरों और प्राकृतिक नजारों के लिए जाना जाता है.


हिमाचल प्रदेश में भी कई ऐसे हिल स्टेशन हैं जहां कम खर्च में शानदार ट्रिप की जा सकती है. जैसे तीर्थन घाटी, नदी किनारे कॉटेज, शांति और ट्राउट फिशिंग के लिए मशहूर. चैल, दुनिया के सबसे ऊंचे क्रिकेट ग्राउंड के लिए जाना जाता है, यहां 5001000 रुपये में होटल मिल जाते हैं. मलाणा अपनी अलग संस्कृति और शांत माहौल के लिए प्रसिद्ध एक छोटा गांव.
 </description><guid>48615</guid><pubDate>09-Mar-2026 1:15:05 pm</pubDate></item><item><title>उज्जैनः बाबा महाकाल का भस्म आरती में हुआ विशेष श्रृंगार, हजारों भक्तों ने किए दिव्य दर्शन</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48420</link><description>उज्जैन, मध्य प्रदेश के उज्जैन में विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर सोमवार तड़के भस्म आरती में बाबा महाकाल का राजा स्वरूप में विशेष श्रृंगार किया गया। इस दौरान हजारों भक्तों ने दिव्य दर्शन का लाभ उठाया।

मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा ने बताया कि फाल्गुन माह शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी पर सोमवार तड़के 4 बजे श्री महाकालेश्वर मंदिर के पट खोले गए। पण्डे-पुजारी ने गर्भगृह में स्थापित सभी भगवान की प्रतिमाओं का पूजन कर भगवान महाकाल का जलाभिषेक और दूध, दही, घी, शकर, फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया। जटाधारी भगवान महाकाल का राजा स्वरूप में श्रृंगार किया गया। इस श्रृंगार की विशेषता यह रही कि बाबा महाकाल का त्रिनेत्र स्वरूप में विशेष अलंकरण किया गया।

इससे पहले प्रथम घंटाल बजाकर मंदिर में प्रवेश करते ही भगवान का ध्यान कर मंत्र उच्चार के साथ हरिओम का जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद भगवान के मस्तक पर भांग, चंदन और त्रिपुण्ड अर्पित कर श्रृंगार किया गया। श्रृंगार पूरा होने के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढांककर भस्म रमाई गई। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई।

भस्म अर्पित करने के बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ सुगंधित पुष्प से बनी माला अर्पित की गई। भगवान महाकाल को मोगरे और गुलाब के सुगंधित पुष्प धारण कराए गए। इसके बाद फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। भक्तों ने इस अलौकिक रूप के दर्शन कर जयघोष किया। पूरा मंदिर परिसर जय श्री महाकाल के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। मान्यता है कि भस्म अर्पित होने के बाद भगवान निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। </description><guid>48420</guid><pubDate>02-Mar-2026 12:23:53 pm</pubDate></item><item><title>रंगभरी एकादशी पर बाबा श्याम ने किया नगर भ्रमण, नीले घोड़े पर सवार होकर निकली रथयात्रा</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48366</link><description>सीकर जिले के खाटूश्यामजी कस्बे के प्रसिद्ध बाबा की धार्मिक नगरी में बाबा श्याम के वार्षिक फाल्गुनी लक्खी मेले के तहत आठ दिवसीय लक्खी मेले के सातवें दिन एकादशी के पावन अवसर पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला. शीश के दानी बाबा श्याम नीले घोड़े पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकले.
रथयात्रा का शुभारंभ बाबा श्याम मंदिर परिसर से हुआ जो मुख्य बाजार होते हुए नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए वापस मंदिर प्रांगण पहुंची.रथयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. बाबा श्याम के जयकारों से पूरा खाटू धाम गूंज उठा. श्रद्धालु रथ को छूकर आशीर्वाद लेने के लिए आतुर नजर आए जिससे मार्गों पर श्रद्धा और उत्साह का सैलाब दिखाई दिया. जगह-जगह फूलों की वर्षा और भजनों की मधुर धुनों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया.
फाल्गुनी लक्खी मेले के चलते देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु बाबा श्याम के दर्शन कर रहे हैं. मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा एवं व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु सुगमता से बाबा श्याम के दर्शन कर सकें। खाटू धाम में इन दिनों भक्ति, विश्वास और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है.
125 किलो चांदी से बना रथ
इस वर्ष की रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण बाबा का वह विशेष रथ है, जिसे लगभग 125 किलो शुद्धचांदीसे तैयार किया गया था. इस शाही रथ में बाबा श्याम के साथ उनके प्रिय नीले घोड़े की आकृति भी विराजमान रही. </description><guid>48366</guid><pubDate>28-Feb-2026 12:20:30 pm</pubDate></item><item><title>वाराणसी: रंगभरी एकादशी पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मध्याह्न भोग आरती में उमड़े श्रद्धालु</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48333</link><description>वाराणसी, रंगभरी एकादशी पर शुक्रवार को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर मंदिर में काशीपुराधिपति के गौने का उत्साह शिवभक्तों के मुख पर खूब दिखा। मंदिर के गर्भगृह में स्थित पावन ज्योर्तिलिंग पर श्रीकृष्णजन्मस्थान सेवा संस्थान मथुरा से आया नीलगुलाल,प्रसादफल मेवा अर्पित किया गया। बाबा के इस होलियारे रूप का दर्शन पाने के लिए मध्याह्न भोग आरती में शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। दरबार में हरहर महादेव के गगनभेदी उद्घोष के बीच श्रद्धालु बाबा के पावन ज्योर्तिलिंग का दर्शन कर उनसे होली खेलने की प्रतीक रूप से अनुमति भी लेते रहे।
 महादेव के गौने की रस्म में ब्रज के बाल-गोपाल और गोपियां बाबा के अंगना में पुष्पों की होली खेलने और रासनृत्य के लिए तैयार दिखे। शाम को धाम परिसर के शिवार्चनम मंच पर रास एवं फूलों की होलीहोगी। मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ. विश्वभूषण के अनुसार महाशिवरात्रि पर बाबा अपने विवाह के बाद ,रंगभरी एकादशी पर गौरा का गौना लेकर धाम आते हैं। काशीवासी बाबा के भाल पर गुलाल लगाकर और माता पार्वती के चरणों में अबीर अर्पित कर होली खेलने की अनुमति मांगते हैं। काशी में रंगभरी एकादशी से होली की शुरुआत हो जाती है। 
रंगभरी एकादशी के अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम और श्री कृष्ण जन्मस्थान के मध्य सांस्कृतिक एवं उपहारों का आदान-प्रदान किया गया। उन्होंने बताया कि रंगभरी एकादशी पर इस वर्ष व्यवस्थाओं को व्यापक स्तर पर सुदृढ़ किया गया है। उन्होंने बताया कि शाम को लोकाचार तथा सांस्कृतिक शास्त्रीय परंपरा के अनुसार शिव परिवार की चल प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह में विराजमान होगी, जहां सप्तऋषि आरती एवं अन्य अनुष्ठान विधि पूर्वक संपन्न किए जाएंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम रात्रि 10:00 बजे तक चलेगा। श्री काशी विश्वनाथ न्यास ने श्रद्धालुओं के लिए ठंडई, सूक्ष्म जलपान की भी व्यवस्था की है। 
उन्होंने बताया कि महाशिवरात्रि महापर्व पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास, वाराणसी द्वारा अभिनव आध्यात्मिक पहल का शुभारंभ किया गया है। इस पहल के अंतर्गत भगवान श्री विश्वेश्वर महादेव के श्रीचरणों में देश-विदेश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों, सिद्धपीठों, शक्तिपीठों एवं प्राचीन तीर्थस्थलों से पावन प्रसाद, पूजित वस्त्र, रज, पवित्र जल तथा श्रद्धा-उपहार अर्पित किए जाने की परंपरा प्रारंभ की गई है। साथ ही श्री बाबा विश्वनाथ के धाम से भी उपहार स्वरुप भेंट भेजी गई थी। इस आध्यात्मिक समन्वय का उद्देश्य संपूर्ण सनातन समाज को एक सूत्र में पिरोते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को मूर्त रूप प्रदान करना तथा वैश्विक आध्यात्मिक एकात्मता को सुदृढ़ करना है। महाशिवरात्रि पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में देश-विदेश के कुल 63 मंदिरों से अधिक पावन भेंट एवं प्रसाद प्राप्त हुआ था। </description><guid>48333</guid><pubDate>27-Feb-2026 6:23:03 pm</pubDate></item><item><title>उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में होलिका दहन 2 मार्च को, धुलंडी 3 मार्च को</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48272</link><description>उज्जैन, मध्य प्रदेश में उज्जैन स्थित ज्योतिलिंग भगवान महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार 2 मार्च को प्राचीन परंपरा अनुसार संध्या आरती के पश्चात होलिका दहन किया जाएगा। इसी प्रकार 3 मार्च को धुलंडी का पर्व मनाया जाएगा।

यह जानकारी मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक ने दी। उन्होंने बताया कि महाकालेश्वर भगवान की सायं आरती में सर्वप्रथम बाबा महाकालेश्वर को हर्बल गुलाल व परंपरानुसार शक्कर की माला अर्पित की जावेगी ।


सायं आरती के पश्चात महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण में ओंकारेश्वर मंदिर के सामने होलिका के विधिवत पूजन-अर्चन के पश्चात होलिका दहन किया जावेगा।

वहीं 3 मार्च धुलण्डी के दिन प्रातः 4 बजे भस्मार्ती में सर्वप्रथम भगवान महाकालेश्वर को मंदिर के पुजारी एवं पुरोहितों द्वारा हर्बल गुलाल अर्पित किया जावेगा।

आरतियों के समय में परिवर्तन

4 मार्च से

श्री कौशिक ने बताया कि परम्परानुसार ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की आरतियों के समय में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से अश्विन पूर्णिमा तक परिवर्तन होगा।

* प्रथम भस्मार्ती  प्रात: 04:00 से 06:00 बजे तक।

* द्वितीय दद्योदक आरती प्रात: 07:00 से 07:45 बजे तक।

* तृतीय भोग आरती प्रात: 10:00 से 10:45 बजे तक।

* चतुर्थ संध्या पूजन सायं 5:00 से 5:45 बजे तक।

* पचम संध्या आरती सायं 7 से 7:45 बजे तक।

* शयन आरती रात्रि 10:30 से 11:00 बजे तक होगी।

उपरोक्ता्नुसार भस्मार्ती, संध्या पूजन एवं शयन आरती अपने निर्धारित समय होगी।

8 मार्च को मनेगी रंगपंचमी

उन्होंने बताया कि 8 मार्च को रंगपंचमी के अवसर पर परंपरानुसार बाबा महाकाल का ध्वज चल समारोह निकाला जावेगा।

चंद्र ग्रहण पर मंदिर की व्यवस्था में होगा बदलाव

श्री कौशिक ने बताया कि 3 मार्च, मंगलवार (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा) को महाकालेश्वर मंदिर की प्राचीन परंपरा अनुसार चंद्र ग्रहण के कारण मंदिर की पूजा पद्धति में परिवर्तन रहेगा। शाम 6:32 से 6:46 तक रहने वाले 14 मिनट के ग्रहण का वेद काल सुबह सूर्योदय से ही प्रारंभ हो जाएगा। वेद काल के कारण सुबह की दद्योदक और भोग आरती में भगवान को केवल शक्कर का भोग अर्पित किया जाएगा। ग्रहण समाप्त होने के पश्चात मंदिर में शुद्धिकरण,भगवान का स्नान पूजन के पश्चात भोग अर्पित कर संध्या आरती संपन्न की जाएगी। </description><guid>48272</guid><pubDate>26-Feb-2026 3:34:11 pm</pubDate></item><item><title>अमरकंटक: इतिहास, आध्यात्म और प्रकृति का अद्भुत संगम</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48246</link><description>कहते हैं कि हर पत्थर अपनी कहानी कहता है, बस सुनने वाला चाहिए। मध्यप्रदेश के अनूपपुर ज़िले में बसा अमरकंटक ऐसा ही स्थल है, जहां इतिहास, आस्था और प्रकृति एक साथ सांस लेते हैं। मेकल पर्वतमाला की ऊंचाइयों पर स्थित यह तीर्थ लगभग 1065 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। चारों ओर घने वन, ठंडी हवाएं और पहाड़ी रास्तेयह यात्रा अपने आप में एक अनुभव बन जाती है।
विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के संगम क्षेत्र में स्थित यह स्थान छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट है। शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण इसे तीर्थराज भी कहा जाता है। यहां की सांझ ऐसा आभास कराती है मानो आकाश पर सिंदूरी रंग घुल गया हो।
  रोचक तथ्य और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अमरकंटक का अतीत हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में सूर्यवंशी शासकों ने यहां बसाहट की नींव रखी। चेदि और विदर्भ वंशों की स्थापत्य शैली के मंदिर आज भी उस युग की झलक दिखाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव, कपिल मुनि, व्यास और भृगु जैसे ऋषियों ने यहां साधना की थी। यह क्षेत्र औषधीय वनस्पतियों के लिए भी प्रसिद्ध है। काली हल्दी और गुलाबकवाली जैसे दुर्लभ पौधों का उल्लेख यहां मिलता है, हालांकि ये अब विलुप्ति के कगार पर हैं।
यहां का बायोस्फीयर रिज़र्व भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है। घने जंगलों में सागौन और महुआ के वृक्ष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।
  प्रमुख दर्शनीय स्थल
1. Narmada River का उद्गम
अमरकंटक वह पावन भूमि है जहां से नर्मदा नदी का प्रवाह आरंभ होता है। इसे मेकलसुता और मां रेवा के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थित कुंड से निकलकर यह नदी पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है, जो इसे अन्य नदियों से अलग बनाती है। उद्गम परिसर में अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं।
2. कलचुरी कालीन मंदिर समूह
11वीं शताब्दी में कलचुरी नरेश कर्णदेव द्वारा निर्मित मंदिरों का समूह नर्मदा कुंड के समीप देखा जा सकता है। कर्ण मंदिर और पातालेश्वर मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध हैं।
3. सोनमुड़ा
यह स्थान सोन नदी के प्रारंभ बिंदु के रूप में जाना जाता है। यहां से गिरता जलप्रपात मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है। मान्यता है कि सोन नदी आगे चलकर गंगा में समाहित होती है।
4. दूधधारा जलप्रपात
कपिल धारा से आगे स्थित यह प्रपात अपने दूधिया जल के कारण जाना जाता है। नर्मदा का पानी यहां गिरते समय सफेद झाग जैसा प्रतीत होता है।
5. कपिल धारा
नर्मदा का पहला प्रमुख झरना, जो लगभग 100 फीट की ऊंचाई से गिरता है। समीप ही कपिल मुनि का आश्रम और प्राचीन गुफाएं स्थित हैं।
6. ज्वालेश्वर मंदिर
अमरकंटकशहडोल मार्ग पर स्थित यह शिव मंदिर जोहिला नदी के उद्गम से जुड़ा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है।
7. श्रीयंत्र महामेरु मंदिर
विशेष ज्यामितीय संरचना वाला यह मंदिर घने जंगलों के बीच स्थित है और अपनी अनूठी वास्तु रचना के लिए जाना जाता है।
8. धुनी पानी
नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा में स्थित यह स्थल अपने औषधीय जलकुंड के लिए प्रसिद्ध है। कथा है कि एक ऋषि की धूनी को शांत करने हेतु यहां जलधारा फूटी थी।
  प्रमुख उत्सव
यहां हर वर्ष नर्मदा जयंती अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। उद्गम स्थल पर विशेष आरती और विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दराज़ से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
  पहुंचने का मार्ग
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर (लगभग 245 किमी) है। रायपुर से भी सड़क मार्ग उपलब्ध है।
रेल मार्ग: बिलासपुर और अनूपपुर प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जहां से सड़क मार्ग द्वारा अमरकंटक पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग: जबलपुर, बिलासपुर, शहडोल और अनूपपुर से नियमित बस और टैक्सी सेवाएं उपलब्ध हैं।
  यात्रा का उपयुक्त समय
अक्टूबर से मार्च के बीच यहां का मौसम सुहावना रहता है। वर्षा ऋतु में झरनों की छटा और भी मनमोहक हो जाती है। हालांकि, साल के किसी भी समय यहां आकर प्राकृतिक और आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया जा सकता है।
अमरकंटक प्रकृति प्रेमियों, इतिहास शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओंसभी के लिए एक विशेष अनुभव प्रदान करता है। यहां की वादियां, पवित्र जलधाराएं और शांत वातावरण मन को नई ऊर्जा से भर देते हैं।
 </description><guid>48246</guid><pubDate>25-Feb-2026 3:36:37 pm</pubDate></item><item><title>दुनिया के 5 सबसे खूबसूरत गुलाबी रेत वाले बीच, एक बार ज़रूर जाना चाहिए </title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48056</link><description>अगर आपको लगता है कि सूरज डूबने के समय बीच की साफ रेत से टकराती समुद्र की लहरों से ज़्यादा खूबसूरत कुछ नहीं हो सकता, तो सोचिए कि यह सब गुलाबी रंग में हो। हाँ, बिल्कुल! दुनिया में कई ऐसे बीच हैं जहाँ असल में गुलाबी रेत बहुत ज़्यादा फैली हुई है। ये जगहें किसी सपनों की दुनिया जैसी लगती हैं, जब सूरज डूबने के मनमोहक बैकग्राउंड के पीछे नीला पानी गुलाबी रेत से मिलता है। ये गुलाबी रेत वाले बीच घूमने के शौकीन लोगों के लिए जादुई और यादगार हैं।

गुलाबी रंग आमतौर पर कुचले हुए लाल कोरल, सीपियों और छोटे जीवों के सफेद रेत के साथ मिलने से बनता है, जिससे समुद्र के किनारे बहुत खूबसूरत नज़ारे बनते हैं। अगर आपको बीच पसंद है और आप दुनिया भर में अपने अगले एडवेंचर की प्लानिंग कर रहे हैं, तो अपनी ट्रैवल बकेट लिस्ट में कुछ खास जोड़ें। ये 5 बीच आपकी ट्रैवल लिस्ट में ज़रूर जगह पाने के लायक हैं। हार्बर आइलैंड, बहामास दुनिया के सबसे मशहूर गुलाबी रेत वाले बीच में से एक, हार्बर आइलैंड अटलांटिक महासागर के किनारे लगभग तीन मील तक फैला हुआ है। क्रिस्टल-क्लियर पानी के सामने नरम, हल्का गुलाबी किनारा एक पिक्चर-परफेक्ट सेटिंग बनाता है। यह रंग सबसे ज़्यादा सनराइज़ और सनसेट के समय दिखता है, जो इसे लंबी रोमांटिक वॉक और शानदार फ़ोटोग्राफ़ी के लिए आइडियल बनाता है।

पंताई मेराह, कोमोडो आइलैंड, इंडोनेशिया कोमोडो नेशनल पार्क में मौजूद यह बीच अपने वाइब्रेंट पिंक शेड के लिए सबसे अलग है। यह यूनिक रंग लाल कोरल के टुकड़ों और सफ़ेद रेत के मिलने से आता है। किनारे पर आराम करने के अलावा, विज़िटर साफ़ पानी में स्नोर्कलिंग का मज़ा ले सकते हैं, जो अलग-अलग तरह के मरीन लाइफ़ और रंगीन कोरल रीफ़ का घर है। बीच के आस-पास रहने की कोई सुविधा नहीं है, और इसलिए ज़्यादातर ट्रैवलर आस-पास के इलाकों में और उसके आस-पास के होटलों में रुकते हैं।

एलाफ़ोनिसी बीच, ग्रीस क्रीट आइलैंड पर मौजूद, एलाफ़ोनिसी अपने कम गहरे फ़िरोज़ी पानी और मुलायम गुलाबी रंग की रेत के लिए जाना जाता है। इसे दुनिया भर के सबसे खूबसूरत बीच में से एक माना गया है। कुछ इलाकों में इसका लाल रंग ज़्यादा दिखता है, खासकर जहाँ कुचले हुए सीप इकट्ठा होते हैं। लैगून जैसी सेटिंग और कम ज्वार के साथ काफ़ी कम गहरा पानी इसे परिवारों और उन लोगों के लिए एकदम सही बनाता है जो शांति से मेडिटेरेनियन एस्केप चाहते हैं। पिंक सैंड्स बीच, बारबुडा

प्रिंसेस डायना के पसंदीदा बीच के लिए मशहूर, बारबुडा का पिंक सैंड बीच, अक्सर कैरिबियन की सबसे खूबसूरत जगहों में गिना जाता है। यह खूबसूरत और शांत बीच 17 मील तक फैला है, जो बिना छुए समुद्र तट पर फैला है। नरम, गुलाबी रेत, हल्की लहरें और कम भीड़ इसे उन यात्रियों के लिए एक आदर्श जगह बनाती है जो कमर्शियल बीच हब से दूर शांति की तलाश में हैं। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि पहले कोको पॉइंट बीच के नाम से जाना जाने वाला यह आइलैंड, 2011 में प्रिंसेस डायना की 50वीं जयंती के मौके पर बदल दिया गया था। प्लाया डे सेस इलेट्स, स्पेन स्पेन के फोर्मेनटेरा में स्थित, प्लाया डे सेस इलेट्स कभी-कभी सही रोशनी में हल्के गुलाबी रंग दिखाता है। अपनी पाउडर जैसी रेत और शानदार नीले पानी के लिए जाना जाने वाला यह बीच, अनोखी प्राकृतिक सुंदरता के साथ एक यूरोपियन आइलैंड जैसा आकर्षण देता है। दूसरी जगहों के मुकाबले, यह एक मशहूर टूरिस्ट स्पॉट है और इसलिए भीड़ को अपनी ओर खींचता है। यह उन यात्रियों के लिए एकदम सही है जो शानदार जगहों को एक्सप्लोर करते हुए नए लोगों से मिलना चाहते हैं। </description><guid>48056</guid><pubDate>21-Feb-2026 2:17:02 pm</pubDate></item><item><title>आंजन  धाम: जहां मां अंजनी की गोद में विराजते हैं बाल हनुमान</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=48016</link><description> झारखंड के गुमला जिले से करीब 21 किलोमीटर दूर स्थित आंजन धाम आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। घने जंगल, पहाड़ी श्रृंखलाएं और शांत वातावरण इस स्थल को आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ पर्यटन के लिए भी खास बनाते हैं। मान्यता है कि यही वह पावन धरती है जहां भगवान हनुमान का अवतार हुआ था, इसलिए यह स्थान श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है।
पौराणिक मान्यता और जन्मस्थली
कथाओं के अनुसार, माता अंजनी ने आंजन गांव की एक गुफा में हनुमानजी को जन्म दिया था। इसी कारण गांव का नाम भी अंजनी माता के नाम पर पड़ा। शिव गुफा के समीप स्थित उस गुफा में आज भी बाल रूप में हनुमान की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसमें वे माता की गोद में विराजमान दिखाई देते हैं।
लोकविश्वास है कि माता अंजनी ने यहां तप और अनुष्ठान किए थे। कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहां 365 शिवलिंग, उतने ही सरोवर और महुआ के वृक्ष मौजूद थे। माता प्रतिदिन स्नान, पूजन और साधना करती थीं। समय के साथ इनमें से कई अवशेष लुप्त हो गए, फिर भी कुछ चिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं।
परंपरा और पूजा-पद्धति
इस तीर्थस्थल पर आज भी स्थानीय नागपुरी रीति से पूजा-अर्चना की जाती है। यहां के पाहन (स्थानीय पुजारी) धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्ची भावना से की गई प्रार्थना यहां अवश्य फलित होती है, यही कारण है कि दूर-दराज़ से भक्त यहां पहुंचते हैं।
पहाड़ी शिखर पर भव्य मंदिर
आंजन पहाड़ी की चोटी पर हनुमानजी का आकर्षक मंदिर स्थित है। इसे देश का अनूठा मंदिर माना जाता है, जहां हनुमान अपनी माता की गोद में विराजमान हैं। शिखर तक पहुंचने के लिए पक्की सीढ़ियां तथा अन्य मार्ग उपलब्ध हैं। ऊपर पहुंचकर आसपास के गांवों और हरियाली का विहंगम दृश्य मन को मोह लेता है। परिसर में अंजनी माता, राम-सीता-लक्ष्मण, राधा-कृष्ण और भगवान शिव की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
गुफाएं और अन्य दर्शनीय स्थल
आंजन क्षेत्र में कई प्राचीन गुफाएं मौजूद हैं। यहां लगभग 360 शिवलिंग और कई प्राचीन जलाशय बताए जाते हैं। चक्रधारी मंदिर में कतारबद्ध शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर के नीचे एक लंबी गुफा भी है, जिसे पहले बंद रखा जाता था। अब इसे श्रद्धालुओं के लिए खोला गया है। यह गुफा लगभग 1500 फीट से अधिक लंबी बताई जाती है।
प्रकृति की गोद में सुकून
हरियाली से आच्छादित यह इलाका शांति और ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह स्थान प्रकृति प्रेमियों और पिकनिक मनाने वालों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। पहाड़ी से दिखाई देने वाला दृश्य बेहद मनोहारी और यादगार होता है।
पहुंचने की जानकारी
यह स्थल गुमला से लगभग 21 किमी, रांची से 120 किमी, लोहरदगा से 50 किमी और सिमडेगा से करीब 100 किमी दूर है। गांव तक पक्की सड़क उपलब्ध है और मुख्य मंदिर तक भी वाहन पहुंच सकते हैं। स्थानीय परिवहन की सुविधा मिल जाती है, लेकिन ठहरने की व्यवस्था यहां नहीं है। इसलिए गुमला में रुकना बेहतर विकल्प है। साथ में आवश्यक सामान और पेयजल ले जाना सुविधाजनक रहेगा।
आंजन धाम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि इतिहास, भक्ति और प्राकृतिक छटा का अनोखा संगम है, जो हर आगंतुक को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है।
 </description><guid>48016</guid><pubDate>20-Feb-2026 6:06:15 pm</pubDate></item><item><title>महाशिवरात्रि पर तंजावूर बड़े मंदिर में भगवान पेरुवुडैयार के अभिषेक के लिए उमड़े श्रद्धालु</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47987</link><description>तंजावूर, महाशिवरात्रि के अवसर पर तमिलनाडु के विभिन्न शिव मंदिरों में विशेष पूजाएं आयोजित की गईं। श्रद्धालुओं ने अपने-अपने क्षेत्रों के शिव मंदिरों में आयोजित विशेष प्रार्थनाओं में भाग लेकर भगवान के दर्शन किए। विश्व प्रसिद्ध तंजावूर बड़े मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान पेरुवुडैयार का विशेष अभिषेक किया।

दरअसल, तंजावूर बड़ा मंदिर, जिसे अरुलमिगु पेरियानायकी अम्मन समेता पेरुवुडैयार मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, में हर वर्ष महाशिवरात्रि का उत्सव उत्साह से मनाया जाता है। इस वर्ष भी महाशिवरात्रि पर रविवार की रात से साेमवार तड़के सुबह तक बड़ी

संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान पेरुवुडैयार के दर्शन किए और उनका द्रव्य पाउडर, हल्दी, दूध, दही, नारियल पानी, शहद व चंदन आदि से अभिषेक किया। यह विशेष अभिषेक चार चरणों में संपन्न हुआ। इसके बाद रंग-बिरंगे फूलों से भगवान का श्रृंगार किया गया और महा दीपाराधना की गई।

इसी प्रकार तंजावूर जिले के अन्य सभी शिव मंदिरों में भी महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालुओं ने विशेष रूप से अभिषेक कर पुण्य

कमाया। तंजावूर में महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में वीणा वादन और भरतनाट्यम सहित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। इसके बाद पेत्थनन कला अरंगम में प्रगन नाट्यांजलि के तत्वावधान में राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए नृत्य कलाकारों ने नाट्यांजलि कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम में वीणा वादन और भरतनाट्यम की प्रस्तुतियों का आनंद एक हजार से अधिक लोगों ने अपने परिवार के साथ बैठकर लिया। </description><guid>47987</guid><pubDate>16-Feb-2026 12:09:58 pm</pubDate></item><item><title>ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल की संध्या और शयन आरती की</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47986</link><description>भोपाल, मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिग भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन व्यवस्था को और अधिक सुगम, पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए मंदिर प्रबंध समिति ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उज्जैन में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया का विस्तार करते हुए मंदिर समिति ने बाबा महाकाल की 'संध्या आरती' और 'शयन आरती' की बुकिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से ऑनलाइन करने का निर्णय लिया है।

महाकाल मंदिर प्रबंध संमिति के प्रशासक संदीप कुमार सोनी ने गुरुवार को बताया कि अब देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु घर बैठे ही आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से आरती में शामिल होने के लिये अपना स्थान सुनिश्चित कर सकेंगे। श्रद्धालु श्री महाकालेश्वर मंदिर की अधिकृत वेबसाइट https://www.shrimahakaleshwar.mp.gov.in/ के माध्यम से ही बुकिंग कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि संध्या आरती के लिए ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे से शुरू होगी और शयन आरती के लिए ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन शाम 4:00 बजे से की जा सकेगी। दोनों ही आरतियों के लिए प्रति श्रद्धालु 250 रूपये का शुल्क (शीघ्र दर्शन के समान) निर्धारित किया गया है। बुकिंग की यह प्रक्रिया पूर्णतः 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर संचालित होगी। बाबा महाकल की आरती में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को प्रवेश द्वार क्रमांक 1 से ही प्रवेश दिया जाएगा। संध्या आरती के लिए शाम 6:00 बजे तक प्रवेश करना अनिवार्य होगा। शयन आरती के लिए रात 10:00 बजे तक ही प्रवेश मिल सकेगा।

आरती के दौरान जारी रहेंगे चलित दर्शन

मंदिर प्रबंधन ने यह स्पष्ट किया है कि दोनों आरतियों के निर्धारित समय के दौरान 'चलित दर्शन' की व्यवस्था सुचारू रूप से जारी रहेगी। इससे वे श्रद्धालु जो आरती की बुकिंग नहीं कर पाए हैं, वे भी कतार में चलते हुए सुगमता से बाबा महाकाल के दर्शन लाभ प्राप्त कर सकेंगे। मंदिर प्रबंधन समिति के अनुसार, इस डिजिटल पहल का मुख्य उद्देश्य व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी और श्रद्धालु-अनुकूल बनाना है, ताकि उज्जैन पहुँचने वाले हर भक्त को एक सुखद और दिव्य अनुभव प्राप्त हो सके। </description><guid>47986</guid><pubDate>19-Feb-2026 12:05:35 pm</pubDate></item><item><title>उज्जैनः सम्राट विक्रमादित्य विवि में गुरुवार से ऊर्जा-सेतु व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47985</link><description>उज्जैन, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में गुरूवार को ऊर्जा-सेतु व्याख्यान श्रृंखला का शुभारंभ होगा। विवि के पूर्व छात्रों के संगठन द्वारा नवाचार करते हुए व्याख्यान श्रृखला प्रारंभ की जा रही है। पहला व्याख्यान भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव और नई शिक्षा नीति क्रियान्वयन के प्रभारी रहे सेवानिवृत्त आईएएस अनिल स्वरूप का होगा।

विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने बुधवार को बताया कि विश्वविद्यालय एल्यूमनाई एसोसिएशन के माध्यम से नई परम्परा शुरू की जा रही है, जिसके अंतर्गत ऊर्जा-सेतु व्याख्यान श्रृंखला प्रारंभ की जा रही है। आप इसे संभव बना सकते हैं... विषय पर पहला विशिष्ट अनिल स्वरूप गुरुवार देंगे।

कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा ने बताया कि सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों के संगठन विक्रम विश्वविद्यालय एल्यूमनाई एसोसिएशन द्वारा यह आयोजन किया जा रहा है। आयोजन विक्रमोत्सव-2026 के तहत विवि के स्वर्ण जयंती सभागार में दोपहर 12 बजे से होगा। यह आयोजन भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के बीच एक वैचारिक पुल के रूप में है। वक्ता अनिल स्वरूप अपनी प्रखर दृष्टि और अनुभव के आधार पर केवल प्रशासनिक कार्यों पर ही नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा नीति निर्धारण और वर्तमान परिदृश्य को केंद्र में रखकर शिक्षकों , विद्यार्थियों और विशेषज्ञों के समक्ष व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करेंगे।

व्याख्यान का विषय यू कैन मेक इट हैपन को विद्यार्थियो को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। अनिल स्वरूप ने अपने कार्यकाल के दौरान कोयला मंत्रालय और शिक्षा नीति जैसे संवेदनशील विभागों में बुनियादी और क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफलता प्राप्त की थी। उन्होने बताया कि विश्वविद्यालय पूर्व छात्र संघ द्वारा इस आयोजन का मूल उद्देश्य वर्तमान छात्रों और अनुभवी पूर्व छात्रों के बीच एक ऐसा सशक्त वैचारिक आदान-प्रदान करना है, जिससे नवागत पीढ़ी को भविष्य की ऊर्जा नीति और करियर की जटिल चुनौतियों से निपटने की दिशा मिल सके। आयोजन विद्यार्थियों के लिए एक दुर्लभ अवसर है, जहां वे देश के समसामयिक विषयों पर सीधा संवाद कर सकेंगे।

कार्यक्रम का विशेष सत्र दोपहर 12 से 1.30 बजे तक चलेगा, जिसके पश्चात उपस्थित जनों के बीच संवाद भी रहेगा। विक्रमोत्सव-2082 के तत्वावधान में आयोजित इस व्याख्यान में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होने के लिए एसोसिएशन ने समस्त संबंधित महाविद्यालयों, संस्थानों और विभागों को निर्देशित किया है कि वे प्रोफेशनल कोर्सेस के विद्यार्थियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करें ताकि श्री स्वरूप के इस प्रेरणादायी और नीतिगत उद्बोधन का पूर्ण लाभ उठा सकें </description><guid>47985</guid><pubDate>18-Feb-2026 11:54:04 am</pubDate></item><item><title>रतनपुर महामाया मंदिर  छत्तीसगढ़ का प्राचीन शक्ति पीठ</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47865</link><description>महामाया मंदिर भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के बिलासपुर जिले के रतनपुर शहर में स्थित है। यह मंदिर देवी दुर्गा और महालक्ष्मी को समर्पित है और पूरे भारत में फैले ५२ शक्ति पीठों में से एक प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। यह शक्ति पीठ दिव्य स्त्री शक्ति की पूजा-अर्चना के लिए प्रसिद्ध है।
रतनपुर एक छोटा सा ऐतिहासिक शहर है, जो मंदिरों, तालाबों और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यह बिलासपुर से लगभग २५ किलोमीटर दूर स्थित है। देवी महामाया को कोसलेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, जो पुराने दक्षिण कोसल क्षेत्र (वर्तमान छत्तीसगढ़) की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।
मंदिर और उसके आसपास का क्षेत्र न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी आकर्षक है। रतनपुर में स्थित तालाब, प्राचीन किले और अन्य मंदिर यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक सम्पूर्ण अनुभव प्रदान करते हैं। नवरात्रि और अन्य त्योहारों के समय यह मंदिर विशेष रूप से श्रद्धालुओं से भर जाता है, जिससे इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
रतनपुर महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है और इसे देखने के लिए भारत भर से लोग यहां आते हैं।
 </description><guid>47865</guid><pubDate>17-Feb-2026 3:29:04 pm</pubDate></item><item><title>पौराणिक प्रसंग: आखिर किस कारण भगवान शिव ने धारण किया वृषभ रूप?</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47737</link><description> इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी को मनाई जाएगी। यह पर्व देवों के देव महादेव को समर्पित है। सनातन परंपरा में भगवान शिव को अत्यंत गूढ़ और अलौकिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में उनके अनेक रूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि उन्होंने 19 प्रमुख अवतार धारण किए, जिनमें अधिकांश अधर्म के विनाश के लिए थे। इन्हीं में से एक है वृषभ (बैल) स्वरूप, जिसकी कथा विशेष महत्व रखती है।
समुद्र मंथन से आरंभ होती है कथा
पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तब अमृत प्रकट हुआ। उस समय भगवान विष्णु ने दैत्यों को छलने के लिए मोहिनी का मोहक रूप धारण किया। इसी प्रसंग में कुछ अप्सराओं की उत्पत्ति भी हुई, जिन्होंने असुरों को अपने प्रभाव में लेकर पाताल लोक की ओर मोड़ दिया। बाद में देवासुर संग्राम समाप्त हुआ और देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई।
पाताल लोक में घटित घटनाएँ
जब पाताल लोक में शांति स्थापित हुई, तब अप्सराएँ विष्णु के सौंदर्य पर मोहित हो गईं। उन्होंने कठोर तप कर भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे विष्णु को उनके पति रूप में प्रदान करें। भक्तों की भावना का सम्मान करते हुए शिव ने विष्णु को कुछ समय के लिए पाताल लोक में रहने की अनुमति दी।
इस अवधि में अप्सराओं और विष्णु से अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। किंतु उनकी माताओं पर पूर्व में असुरों का प्रभाव रहा था, जिससे उन संतानों में उग्र और विनाशकारी स्वभाव आ गया। वे अत्यंत बलशाली बने और तीनों लोकों में उपद्रव फैलाने लगे। देवगण और ऋषि-मुनि उनके अत्याचारों से व्यथित हो उठे।
वृषभ अवतार का उद्देश्य
जब स्थिति असहनीय हो गई, तब धर्म की रक्षा हेतु भगवान शिव ने वृषभ का रूप धारण किया। वे बैल के स्वरूप में पाताल लोक पहुँचे और अपने प्रचंड सींगों से उन उग्र पुत्रों का संहार करने लगे।
यह दृश्य देखकर विष्णु क्रोधित हो उठे और शिव के साथ उनका घोर संघर्ष प्रारंभ हो गया। युद्ध लंबे समय तक चला, किंतु किसी की विजय नहीं हुई। अंततः अप्सराओं ने विष्णु को मोह-माया से मुक्त किया। जैसे ही उनका चित्त निर्मल हुआ, उन्हें शिव के इस अवतार का वास्तविक उद्देश्य समझ में आ गया।
तब विष्णु ने शिव की महिमा स्वीकार की और उनके निर्णय का सम्मान किया। अंततः शिव के मार्गदर्शन से विष्णु वैकुंठ लौट गए और तीनों लोकों में पुनः संतुलन स्थापित हुआ।
यह कथा दर्शाती है कि जब-जब संसार में संतुलन बिगड़ता है, तब-तब महादेव किसी न किसी रूप में अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं।
 </description><guid>47737</guid><pubDate>14-Feb-2026 6:15:55 pm</pubDate></item><item><title>काशी की मसान होली: अनोखी परंपरा और महिलाओं के प्रवेश पर रोक का कारण</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47669</link><description>भारत में होली के अनेक रूप देखने को मिलते हैं, लेकिन मोक्ष नगरी वाराणसी की मसान होली अपनी अलग पहचान रखती है। जहां देशभर में लोग रंग और गुलाल से उत्सव मनाते हैं, वहीं काशी के मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच राख से होली खेली जाती है। वर्ष 2026 में यह विशेष आयोजन 28 फरवरी को होगा। आइए जानते हैं इस परंपरा का महत्व और महिलाओं के प्रवेश को लेकर प्रचलित मान्यताओं के बारे में।
मसान होली क्या है?
मसान होली को भस्म या भभूत की होली भी कहा जाता है। मसान का अर्थ श्मशान होता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, भगवान शिव अपने गणों के साथ श्मशान में उत्सव मनाते हैं। यहां रंगों की जगह चिता की राख उड़ाई जाती है और हर ओर हर-हर महादेव के उद्घोष सुनाई देते हैं। श्रद्धालु शिवगणों का रूप धारण कर इस अनूठे आयोजन में भाग लेते हैं।
महिलाओं को क्यों नहीं दिया जाता प्रवेश?
इस परंपरा से जुड़े कुछ आध्यात्मिक और धार्मिक नियमों के कारण महिलाओं और बच्चों को वहां जाने की अनुमति नहीं दी जाती।
1. सूक्ष्म शक्तियों की मान्यता:
मान्यता है कि श्मशान स्थल पर अदृश्य ऊर्जाएं सक्रिय रहती हैं। सुरक्षा की दृष्टि से महिलाओं और बच्चों को इन प्रभावों से दूर रखने की परंपरा बनी हुई है।
2. वैराग्य का प्रतीक स्थल:
श्मशान को त्याग और जीवन की नश्वरता का प्रतीक माना जाता है। संतों और अखाड़ों के अनुसार, यह वातावरण गृहस्थ जीवन से जुड़े लोगों के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता।
3. भावनात्मक संवेदनशीलता का तर्क:
परंपरागत विचारों में महिलाओं को अधिक संवेदनशील माना गया है। श्मशान का गंभीर और रहस्यमय माहौल मानसिक रूप से गहरा असर डाल सकता है, इसलिए उन्हें इस आयोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है।
परंपरा की उत्पत्ति कैसे हुई?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के अवसर पर भगवान शिव माता पार्वती को काशी लाए थे। उस दिन देवताओं और भक्तों के साथ उत्सव मनाया गया, लेकिन शिव के गणभूत, प्रेत और अघोरीउसमें सम्मिलित नहीं हो सके। अगले दिन महादेव ने श्मशान में जाकर अपने इन प्रिय गणों के साथ भस्म से होली खेली। तभी से यह अनोखी परंपरा प्रचलित हो गई।
विश्वभर में प्रसिद्ध काशी की यह छवि
आज यह आयोजन केवल भारत ही नहीं, बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। मसान होली जीवन और मृत्यु के गहरे संबंध को दर्शाती हैएक ऐसा दर्शन, जो काशी की सांस्कृतिक आत्मा में रचा-बसा है।
 </description><guid>47669</guid><pubDate>13-Feb-2026 4:11:04 pm</pubDate></item><item><title>शिवरात्रि पर बाबा आमरेश्वर धाम में होगा रुद्राभिषेक और विशेष पूजा अर्चना</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47581</link><description>खूंटी, 12 फ़रवरी । जिले के प्रसिद्ध बाबा आमरेश्वर धाम में महाशिवरात्रि के मौके पर रविवार को विशेष पूजा का आयोजन किया जाएगा। इस आशय की जानकारी देते हुए बाबा आमरेश्वर धाम प्रबंध समिति के अध्यक्ष लाल ज्ञानेंद्र नाथ शाहदेव और महामंत्री मनोज कुमार ने बताया कि शिवरात्रि के पावन अवसर पर सुबह पांच बजे से रुद्राभिषेक और नौ बजे भजन कीर्तन शुरू होगा।

इस अवसर पर मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया जाएगा तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

उन्होंने बताया कि दिन के 11:00 बजे से विशेष पूजा एवं आरती और प्रसाद वितरण किया जाएगा। शाम सात बजे से बाबा भोलेनाथ की श्रृंगार पूजा का आयोजन किया जाएगा।

समिति के अध्यक्ष तथा आयोजन से जुड़े सदस्यों ने क्षेत्र के समस्त शिवभक्तों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्म लाभ लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का पावन पर्व है, जो श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है।

इस अवसर पर श्रद्धालु व्रत रखकर एवं पूजा-अर्चना कर भगवान शिव से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। बाबा आमरेश्वर धाम प्रबंध समिति ने लोगों से अपील की है अधिक से अधिक संख्या में आकर भोलेनाथ की पूजा अर्चना करें और पुण्य के भागी बनें। </description><guid>47581</guid><pubDate>12-Feb-2026 1:50:28 pm</pubDate></item><item><title>महाशिवरात्रि पर गौरा को लाने राजसी स्वरूप में बारात लेकर निकलेंगे काशीपुराधीश्वर</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47543</link><description>वाराणसी, देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परंपराओं और आस्थाओं का जीवंत उत्सव है। इसी परंपरा के निर्वाह में इस बार महाशिवरात्रि पर काशीपुराधीश्वर महादेव माता गौरा को लाने के लिए प्रतीकात्मक स्वरूप में सिगोंल (दंड) के साथ राजसी ठाठ-बाट में नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इस दौरान बाबा का विग्रह स्वरूप अन्य पर्वों से सर्वथा भिन्न और विशिष्ट होगा। काशी में बाबा विश्वनाथ वर्ष में चार बार चल स्वरूप में नगर भ्रमण पर निकलते हैं, किंतु महाशिवरात्रि का नगर भ्रमण सबसे अलग और विशिष्ट माना जाता है। इस दिन काशीपुराधीश्वर माता गौरा के बिना, अकेले राजसी स्वरूप में अपने अढ़भंगी भक्तों और गणों के साथ दिखाई देते हैं।

तीन पर्वों पर बाबा विश्वनाथ सपरिवार देते हैं दर्शन

काशी की प्राचीन लोकपरंपरा के अनुसार हर वर्ष सावन पूर्णिमा, दीपावली के दूसरे दिन मनाए जाने वाले अन्नकूट महोत्सव और रंगभरी एकादशी के अवसर पर टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत आवास से बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को विधि-विधानपूर्वक लाकर मंदिर के गर्भगृह में विराजमान कराया जाता है। इन तीनों अवसरों पर काशीपुराधीश्वर माता गौरा और प्रथमेश के साथ सपरिवार प्रतीकात्मक नगर भ्रमण में भक्तों को दर्शन देते हैं।

महाशिवरात्रि पर अकेले निकलते हैं गौरा को लाने

लोकमान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ माता गौरा को लेने अकेले ही निकलते हैं। यही कारण है कि इस दिन बाबा का श्रृंगार, उनका वाहन, छत्र, सिगोंल और सिंहासन सभी कुछ विशेष रूप से तैयार किया जाता है। यह परंपरा शिव-विवाह की पूर्व संध्या का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें बाबा दूल्हे के रूप में गौरा को लेने निकलते हैं।

नवरत्नों से सुसज्जित छत्र और नवग्रह के काष्ठ से बने सिंहासन पर विराजेंगे महादेव

शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बुधवार को बताया कि इस वर्ष काशी की ऐतिहासिक शिव-बारात में काशीपुराधीश्वर का प्रतीकात्मक चल स्वरूप विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। बाबा नवरत्नों से सुसज्जित राजसी छत्र और सिंगोल के साथ 11 प्रकार की काष्ठ से बने भव्य सिंहासन पर विराजमान रहेंगे। इन काष्ठों का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व बताया जाता है, जो नवग्रहों का भी प्रतीक माने जाते हैं। बाबा के छत्र का निर्माण श्री काशी विश्वनाथ डमरू सेवा समिति के ओम शकर शर्मा मोनू बाबा और पागल बाबा ने कराया है।

अढ़भंगी भक्तों संग निकलती है शिव-बारात

महाशिवरात्रि की शिव-बारात काशी की सबसे अनूठी और जीवंत परंपराओं में से एक है। इसमें बाबा के साथ उनके अढ़भंगी, वैरागी, नागा साधु और गण शामिल होते हैं। ढोल-नगाड़ों, डमरुओं की नाद और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच निकलने वाली यह बारात श्रद्धा, उल्लास और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है। महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी में महाशिवरात्रि का आयोजन केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे नगर की लोकचेतना में रच-बस जाता है। घर-घर में दीप प्रज्ज्वलन, व्रत-उपवास, शिवभक्ति और बारात के स्वागत की परंपरा निभाई जाती है। काशीपुराधीश्वर का यह प्रतीकात्मक नगर भ्रमण सदियों से चली आ रही उस लोक परंपरा का साक्ष्य है, जिसमें भगवान शिव को नगर का राजा और काशीवासियों को उनका परिवार माना जाता है। महाशिवरात्रि को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। बाबा के राजसी स्वरूप और ऐतिहासिक शिव-बारात के दर्शन के लिए देश-विदेश से भक्त काशी पहुंच रहे हैं। महंत परिवार और परंपराओं से जुड़े परिवारों द्वारा सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। </description><guid>47543</guid><pubDate>11-Feb-2026 5:23:14 pm</pubDate></item><item><title>महाशिवरात्रि पर नवग्रहों की साक्षी बनेंगी काशी की परम्पराएं, हल्दी-सगुन से मांगलिक अनुष्ठान</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47496</link><description>वाराणसी, देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक परम्पराओं, आस्था और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व पर काशीपुराधिश्वर भगवान विश्वनाथ नवग्रहों के प्रतीक नौ प्रकार की पवित्र लकड़ियों सहित कुल 11 लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठपट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।

महाशिवरात्रि से पूर्व शुक्रवार को होने वाले हल्दी और सगुन के लोकाचार में भी इसी विशेष काष्ठपट्ट का उपयोग किया जाएगा। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के टेढ़ीनीम स्थित आवास पर इन आयोजनों की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। काशी की परम्परानुसार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाओं को विधि-विधानपूर्वक काष्ठपट्ट पर विराजमान कर मांगलिक अनुष्ठान सम्पन्न कराए जाएंगे।

मंगलवार को यह जानकारी महंत वाचस्पती तिवारी ने दी। उन्होंने बताया कि काशी की परम्परा में बाबा विश्वनाथ के प्रत्येक लोकाचार में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा सम्बंध छिपा है। इसी भाव के साथ इस वर्ष विशेष काष्ठपट्ट का निर्माण नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक होता है।

नवग्रहों के अनुरूप सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश (ढाक), मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है। इसके साथ ही अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के पावन काष्ठों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है।

--देशभर के शिवभक्तों की श्रद्धा से सजी काष्ठपट्ट

वाचस्पती तिवारी ने बताया इस विशेष काष्ठपट्ट के निर्माण में केवल काशी ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों की आस्था भी जुड़ी है। उत्तर प्रदेश के साथ-साथ राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से इन पवित्र लकड़ियों को एकत्र किया गया। शिवभक्तों ने श्रद्धा भाव से इन लकड़ियों को महंत आवास तक पहुंचाया, जिसके बाद पारम्परिक विधि से काष्ठपट्ट का निर्माण कराया गया। महंत आवास पर काष्ठपट्ट को धार्मिक मर्यादाओं और लोकाचार के अनुरूप अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसमें किसी प्रकार की आधुनिक सजावट के बजाय शास्त्रीय परम्पराओं और काशी की लोक संस्कृति का विशेष ध्यान रखा गया है।

हल्दी-सगुन से महाशिवरात्रि तक चलेगा उत्सव

काशी में महाशिवरात्रि का उत्सव कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठानों की श्रृंखला है। शुक्रवार को हल्दी और सगुन के साथ मांगलिक आयोजनों का शुभारम्भ होगा। इसके बाद महाशिवरात्रि के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का विशेष श्रृंगार, पूजन और लोकाचार सम्पन्न किया जाएगा।

मान्यता है कि इन अनुष्ठानों के माध्यम से काशीपुराधिश्वर अपने भक्तों के जीवन से कष्ट हरते हैं और सुख, समृद्धि तथा मंगलकामनाओं का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। नवग्रहों से जुड़ी लकड़ियों से बने काष्ठपट्ट पर बाबा का विराजमान होना इस विश्वास को और अधिक दृढ़ करता है।

काशी की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप

शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया काशी की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि उन लोक परम्पराओं से है, जो पीढ़ियों से जीवित चली आ रही हैं। महाशिवरात्रि पर 11 पावन काष्ठों से बने विशेष काष्ठपट्ट पर बाबा विश्वनाथ का विराजमान होना उसी परम्परा का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति, देवता और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। </description><guid>47496</guid><pubDate>10-Feb-2026 3:18:15 pm</pubDate></item><item><title>महाशिवरात्रि: महंत आवास पर दूल्हे के रूप में सजेेंगे बाबा विश्वनाथ, रुद्राक्ष और मेवों से बने सेहरे से होगा विशेष श्रृंगार</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47439</link><description>वाराणसी, देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व भव्य और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। महापर्व पर काशीपुराधिश्वर बाबा विश्वनाथ दूल्हे के रूप में भक्तों को दर्शन देंगे। इस अवसर पर बाबा के विशेष श्रृंगार में रुद्राक्ष, फल, मेवा और पुष्पों से निर्मित पारंपरिक सेहरा चढ़ाया जाएगा, जो शिव-विवाह की लोकपरंपरा और आस्था का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि पर बाबा के दूल्हा स्वरूप का श्रृंगार काशी की सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार किया जाता है। दूल्हे के रूप में किए जाने वाले इस श्रृंगार में सेहरा विशेष महत्व रखता है। रुद्राक्ष से बना सेहरा बाबा की वैराग्य परंपरा और शिवतत्व का प्रतीक है, जबकि इसमें प्रयुक्त फल, मेवा और पुष्प लोकाचार और मंगल भाव को दर्शाते हैं। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत के टेढ़ीनीम स्थित आवास से लेकर शिव बारात और श्री काशी विश्वनाथ धाम में रात्रिभर चलने वाली चारों पहर की आरतियों तक बाबा को यह सेहरा अर्पित किया जाएगा। यह सेहरा बाबा की चल प्रतिमा सहित मंदिर में संपन्न होने वाली समस्त आरतियों के दौरान विराजमान रहेगा।

महंत वाचस्पति तिवारी ने सोमवार को बताया कि सेहरा पूर्ण रूप से प्राकृतिक और धार्मिक सामग्री से तैयार किया जा रहा है। इसमें रुद्राक्ष के साथ मखाना, लौंग, इलायची, शिवलिंगी, अंगूर तथा विविध प्रकार के सुगंधित पुष्पों का प्रयोग किया जाएगा। इन सभी वस्तुओं का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। रुद्राक्ष शिव का प्रिय है, शिवलिंगी संतान और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है, वहीं फल और मेवा मंगलकामना और समर्पण भाव को दर्शाते हैं।

उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि पर काशी में शिव बारात का विशेष महत्व होता है। लोक परंपरा के अनुसार भगवान शिव दूल्हा बनकर माता गौरा को ब्याहने निकलते हैं। इसी परंपरा के निर्वहन में बाबा विश्वनाथ का दूल्हा स्वरूप श्रृंगार किया जाता है। सेहरा इसी श्रृंगार का प्रमुख अंग होता है, जो बाबा के मस्तक को अलौकिक सौंदर्य प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में चारों पहर की सप्तर्षि आरती का आयोजन किया जाएगा। यह आरती काशी की विशिष्ट परंपरा है, जिसमें सात ऋषियों के प्रतीक स्वरूप विशेष विधि-विधान से आरती संपन्न होती है। सप्तर्षि आरती का संचालन महंत परिवार के वरिष्ठ सदस्य और सप्तर्षि आरती के प्रधान पं. शशिभूषण त्रिपाठी गुड्डु महाराज के नेतृत्व में किया जाएगा। पर्व पर पूरी रात्रि मंदिर में आरती, अभिषेक और विशेष पूजन का क्रम चलता है। श्रद्धालु पूरी रात बाबा के दर्शन और जलाभिषेक के लिए कतारों में लगे रहते हैं। बाबा के दूल्हा स्वरूप के दर्शन को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह रहता है। </description><guid>47439</guid><pubDate>09-Feb-2026 12:45:14 pm</pubDate></item><item><title>सोमनाथ मंदिर: आस्था, इतिहास और पुनर्जागरण का प्रतीक</title><link>https://thevoicetv.in/travel.php?articleid=47320</link><description>राज्य के पश्चिमी छोर पर स्थित, बारीक नक्काशी से सजा हुआ, शहद के रंग का सोमनाथ मंदिर वह स्थान माना जाता है जहाँ भारत में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था  वह स्थान जहाँ शिव अग्नि के स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। यह मंदिर कपिला, हिरन और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित है और अरब सागर की लहरें उस तट को छूती हैं जिस पर यह बना है। प्राचीन मंदिर का इतिहास 649 ईसा पूर्व से शुरू होता है, लेकिन माना जाता है कि यह उससे भी पुराना है। इसका वर्तमान स्वरूप 1951 में पुनर्निर्मित किया गया था। मंदिर के उत्तरी भाग में शिव कथा के रंगीन चित्र बने हुए हैं, हालाँकि धुंधले शीशे के कारण इन्हें देखना मुश्किल है। अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज में एक घंटे का ध्वनि और प्रकाश शो प्रतिदिन शाम 7.45 बजे मंदिर की शोभा बढ़ाता है।
संक्षिप्त इतिहास:ऐसा कहा जाता है कि सोमराज (चंद्रमा देवता) ने सबसे पहले सोमनाथ में सोने का मंदिर बनवाया था; बाद में रावण ने इसे चांदी से, कृष्ण ने लकड़ी से और भीमदेव ने पत्थर से पुनर्निर्मित करवाया। वर्तमान शांत, सममित संरचना मूल तटीय स्थल पर पारंपरिक डिजाइनों के अनुसार बनाई गई है: यह मलाईदार रंग से रंगी हुई है और इसमें उत्कृष्ट मूर्तिकला है। इसके केंद्र में एक विशाल, काला शिवलिंग हैजो 12 सबसे पवित्र शिव मंदिरों में से एक है, जिन्हेंज्योतिर्लिंगके रूप में जाना जाता है ।
प्रसिद्ध फ़ारसी विद्वान अल-बिरूनी द्वारा मंदिर का विस्तृत वर्णन संभवतः इसे विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्धि दिलाने में सहायक रहा। सन् 1025 के अंत या सन् 1026 के प्रारंभ में, वर्तमान अफ़गानिस्तान के क्रूर आक्रमणकारी महमूद ग़ज़नी ने मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय मंदिर इतना समृद्ध था कि कहा जाता है कि वहाँ 300 संगीतकार, 500 नर्तकियाँ और 300 नाई कार्यरत थे। महमूद ने दो दिनों तक चले भीषण युद्ध में शहर और मंदिर पर कब्जा कर लिया, जिसमें अनुमानित 70,000 रक्षक मारे गए। इसके बाद उसने मंदिर की अपार संपत्ति लूट ली और संरचना को नष्ट कर दिया। यहीं से विनाश और पुनर्निर्माण का एक ऐसा चक्र शुरू हुआ जो सदियों तक चलता रहामंदिर को 1297, 1394 और अंततः 1706 में मुगल शासक औरंगज़ेब के शासनकाल में फिर से नष्ट कर दिया गया।
आधुनिक मंदिर का पुनर्निर्माण भारत की स्वतंत्रता के बाद 1950 में उसी स्थान पर किया गया था। पुनर्निर्माण की पहल भारत रत्न सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, जो भारत के पहले उप प्रधानमंत्री थे। उन्होंने 12 नवंबर 1947 को राष्ट्रीय पुनरुत्थान और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक के रूप में इसकी आधारशिला रखी थी।
दर्शन का सर्वोत्तम समय:सोमनाथ मंदिर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी तक के ठंडे महीने हैं, हालांकि यह मंदिर पूरे वर्ष खुला रहता है। शिवरात्रि (आमतौर पर फरवरी या मार्च में) और कार्तिक पूर्णिमा (दिवाली के आसपास) यहां बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती हैं। अधिक जानकारी के लिए, कृपया दिए गए स्रोत पर जाएं। </description><guid>47320</guid><pubDate>07-Feb-2026 5:46:13 pm</pubDate></item></channel></rss>