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"छोटा सा बदलाव ही जिंदगी की एक बड़ी कामयाबी का हिस्सा होता है"।

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भारत द्वेषी होकर अपने ही हाथों पैरों में कुल्हाड़ी मारता मालदीव

Date : 19-Jan-2024

 भारत दुनिया में तेजी से हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, इसकी यह गति इतनी अधिक है कि अमेरिका समेत कई देश जहां अचंभित हैं, वहीं इससे द्वेष करने वाले बिना किसी कारण के होते हुए भी पैदा हो गए हैं। जिसमें कि सबसे अधिक तकलीफ में वे देश दिखाई दे रहे हैं जोकि भारत के सबसे अधिक नजदीक के हैं। यही शायद वह कारण भी है कि जिन देशों की सीमाएं कहीं न कहीं भारत के साथ जुड़ती हैं या वह करीब में हैं, उन देशों को ही 21वीं सदी में विश्व विजय करता भारत और उसकी तरक्की सहन नहीं हो रही है। यह ठीक वैसा ही व्यवहार है जैसा कि हमारे बीच में तेजी से कोई हमारा साथी आगे बढ़ता हुआ दिखता है तो अक्सर हम उसमें तमाम गलतियां ढूंढ़ना आरंभ कर देते हैं। किंतु इससे नुकसान किसका है? यह सोचनेवाली बात है। स्वभाविक है नुकसान उसे ही अधिक होगा जो बिना किसी कारण के बैर लेगा। इस समय भारत और मालदीव के आपसी संबंधों को लेकर भी यही स्थिति नजर आ रही है। जिसमें कि संबंधों की तरह ही यदि कोई सबसे अधिक अपना नुकसान करवाता दिख रहा है तो वह स्‍वयं मालदीव ही है। 


दुखद है कि चीन की गोद में बैठा आज का मालदीव यह नहीं समझ पा रहा है कि जैसा व्यवहार चीन उसके साथ करता नजर आ रहा है, यह आंखों का भ्रम है। जब तिलिस्म टूटे और हकीकत से सामना हो तो पता चले, मालदीव अपना बहुत कुछ खो चुका है! जैसा कि चीन का चाल-चरित्र हैं और दुनिया के कई देश उसके भुक्त भोगी भी हैं । भारत मालदीव द्वारा उसे बार-बार उकसाए जाने पर यदि ठोस जवाब नहीं दे रहा तो उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं । लेकिन भारतीय जनता सब देख रही है, अभी तक जिन भारतीयों ने पर्यटन के माध्‍यम से मालदीव की अर्थव्‍यवस्‍था को गतिमान रखा है, यदि वे पूरी तरह से इस देश की ओर से मुंह मोड़ लेंगे तो सिर्फ यह सोचने भर से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस देश के पास पेट भरने तक के रुपए नहीं बचेंगे। 

फिर इसकी चिंता चीन कितने वक्‍त तक करेगा यह भी इसके समझ आ जाएगा, क्‍यों कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि जो भी देश चीन के ऊपर आश्रित हुआ वो भूखा-नंगाहो गया । हमारे सामने पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार से लेकर केन्या, जिम्बाब्वे और कई अन्‍य अरबियन देशों के उदाहरण हैं, जिन्‍होंने चीन पर भरोसा किया अब पछता रहे हैं। पाकिस्तान की विदेश नीति बीजिंग तय कर रहा है । श्रीलंका अपने हंबनटोटा बंदरगाह को गिरवी रख चुका है।  म्यांमार गृहयुद्ध में फंस चुका है। यही हालत कई अफ्रिकी एवं अन्‍य देशों के भी है। 

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारतीय सैनिकों के लिए मालदीव से बाहर निकलने की डेडलाइन 15 मार्च तय कर दी है, लेकिन मुइज्जू, यह भूल रहे हैं कि यहां से भारतीय सेना अपने आस पास के संपूर्ण समुद्री जल मार्ग पर नजर रखती है और इसके कारण से ही समुद्री लुटेरे यहां अपना वर्चस्‍व स्‍थापित नहीं कर सके हैं। ऐसे में समुद्री मार्ग से व्‍यापार करनेवालों को बहुत सुविधा इस समय है जोकि मालदीव समाप्‍त कर देना चाहता है, जिसके लिए कभी भी भारत सरकार तैयार नहीं हो सकती। आश्‍चर्य तो यह सोचकर भी होता है कि मालदीव जैसे देश जिनके लिए भारत हमेशा सहयोग करने के लिए तत्‍पर रहता आया है आज वे उसे आंख दिखाने की हिमाकत कर रहे हैं। 

इतिहास में वे कई दिन दर्ज हैं जब इस अदने से देश और यहां के नागरिकों को हर संभव सहायता पहुंचाने के लिए भारत सदैव आगे होकर सहायता देता आया। स्‍वास्‍थ, रोजगार, पर्यटन के रूप में तो मदद भारत सदैव करता ही है, लेकिन अभी इस बात को दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं जब मालदीव की वित्तीय स्‍थ‍िति खराब होने पर उसे आर्थ‍िक सहायता मुहैया कराने में सबसे पहले भारत ही आगे आया था । भारत ने नवंबर 2022 में उसे 100 मिलियन डॉलर की सहायता पैकेज दिया । 

विश्‍व भर में कोरोना वायरस से जब हाहाकार मचा, तब भी मालदीव के जीवन को बचाने सबसे पहले तमाम प्रकार की मदद और मेडिकल सहायता भारत ने ही उसे भेजी। इससे पहले भारतीय सेना ने वायरल टेस्ट लैब बनाने के लिए 14 सदस्यीय मेडिकल दल भेजा, फिर  5.5 टन जरूरी दवाएं मालदीव को उपहार के रूप में दी थीं। मोदी सरकार ने जनवरी 2021 में यहां के लिए कोरोना वैक्सीन के एक लाख टीके भेजे । इसके दूसरे एवं तीसरे माह में एक-एक लाख टीकों के दो और पैकेज मालदीव भेजे गए थे। पांच लाख लोगों की आबादी वाले इस छोटे से द्वीप देश जिसमें कि बच्‍चों की संख्‍या भी बड़ी मात्रा में हैं भारत ने समय रहते इन सभी की स्‍वास्‍थ्‍य कुशलक्षेम के लिए ऑपरेशन संजीवनी चलाकर तीन  लाख कोविड के टीके भेज दिए थे। भारत जटिल हृदय सर्जरी, कैंसर देखभाल जैसे उपचार मालदीव को प्रदान करता है, जिनकी इलाज की सुविधा मालदीव में उपलब्ध नहीं हैं, वह भी काफी कम कीमत पर ।  हे ना आश्‍चर्य कि जिस भारत के भरोसे इस देश के नागरिकों को नया जीवन दान मिला और सतत मिल रहा है, वही आज भारत को आंख दिखा रहा है! 

चलो मान लेते हैं कि कोविड काल में भारत दुनिया भर के लिए एक मसीहा के रूप में उभरा लेकिन मालदीव को तो भारत ने जनवरी 2020 में खसरे के प्रकोप के बढ़ने एवं यहां हाहाकार मच जाने पर तुरंत खसरे के टीके की 30,000 खुराकें भेज दी थीं, तब जाकर यहां इस बिमारी को रोका जाना संभव हुआ था । इसी साल भारत ने ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट (जीएमसीपी) का समर्थन करने के लिए मालदीव के लिए एक वित्तीय पैकेज की घोषणा की थी। पैकेज में राशि 100 मिलियन और राशि 400 मिलियन की नई क्रेडिट लाइन शामिल थी। भारत ने मालदीव को 1.3 अरब डॉलर की आठ 'लाइन ऑफ क्रेडिट' परियोजनाएं भी प्रदान की हैं। 

जब पूरा मालदीव बूंद-बूंद पीने के पानी के लिए तरस उठा था उस समय भी भारत ही वह देश था जिसने 2014 में सुषमा स्वराज और विदेश सचिव जयशंकर के ऑपरेशन नीर के माध्‍यम से 5 से 7 सितंबर के बीच 374 टन पीने का पानी वहां पहुंचाया था।  तीन नवंबर को 1988 को मालदीव की राजधानी माले की सड़कों पर आक्रमणकारी पहुंचे तो वहां की सरकार ने भारत से मदद मांगी। सोचनेवाली बात है कि यदि भारत यहां ऑपरेशन कैक्टस नहीं चलाता तो सत्‍ता क्‍या होती, यह भी नहीं सोचा जा सकता है । इसी प्रकार से  2004 के हिंद महासागर सुनामी के वक्त जो सहायता भारत ने की वह करने से भारत यदि पीछे हट चुका होता तो भी आज यह देश इस रूप में हमारे सामने नहीं होता, हो सकता है, इसका अस्‍तित्‍व ही नहीं रहता! लेकिन हमेशा की तरह अपने पड़ौसियों की मदद करने भारत सदैव से आगे आता रहा है। 

मोहम्मद मुइज्जू की सरकार आज भले ही चीन की गोद में बैठकर यह नहीं समझ पा रही होगी कि भारत से आनेवाले पर्यटक सबसे अधिक हैं, रूस और चीन का स्थान उसके बाद आता है और भले ही भारत सरकार अपनी सीमारेखा रणनीति और विदेश नीति के तहत बहुत कठोर संकेत मालदीव को न दे क्‍योंकि मालदीव हिंद महासागर में उस जगह पर स्‍थ‍ित है, जहां से ज्यादातर व्यापारिक मार्ग गुजरते हैं और इस बात को जानकर ही आज वह भारत को आंख दिखाने की कोशिश कर रहा हो, जिसमें मालदीव यह बताना चाह रहा है कि चीन का वहां पैठ जमाना, भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा होगा। लेकिन वह यह नहीं जानता कि यदि भारत के नागरिकों ने उसके यहां से पूरी तरह से मुंह मोड़ लिया और भारत ने उसे पूर्व की तरह सहायता देने से अपना हाथ पीछे खींच लिया तो कहीं उसके अस्‍तित्‍व पर ही संकट न खड़ा हो जाए? फिलहाल तो यही नजर आ रहा है कि वह भारत द्वेषी होकर अपने ही हाथों अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार रहा है, जो उसके बने रहने के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
 
 
लेखक - मयंक चतुर्वेदी 

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