19 दिसंबर भारतीय इतिहास की वो तारीख़ है जो अपने आप में त्याग और बलिदान का अमिट रंग समेटे हुए है। क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को अंग्रेजों ने ऐतिहासिक 'काकोरी कांड' में मुकदमे के बाद 19 दिसंबर, 1927 को गोरखपुर की जेल में फांसी दी गई थी | रामप्रसाद बिस्मिल एक क्रांतिकारी के साथ-साथ एक संवेदनशील कवि, साहित्यकार, इतिहासकार और एक बहुभाषिक अनुवादक भी थे |
1. 30 साल के अल्प जीवनकाल में रामप्रसाद बिस्मिल की कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं लेकिन ये सभी पुस्तकें अंग्रेजों से न बच सकीं। सभी किताबें जब्त कर ली गयीं।
2. बिस्मिल ने देश में क्रांति की मशाल जलाए रखने के लिए अपनी किताबों की बिक्री से मिले पैसों से ज़रूरी हथियार खरीदे।
3. गाँधी जी द्वारा 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद असहयोग आन्दोलन वापस लेने के फैसले से नाखुश बिस्मिल ने अपनी खुद की पार्टी शुरू करने का निर्यण लिया था |
4. बिस्मिल बहुत कम उम्र में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये। इस क्रांतिकारी संगठन के माध्यम से ही वह अन्य स्वतंत्रता सेनानियों जैसे चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, अशफाक उल्ला खाँ, राजगुरु, गोविंद प्रसाद, प्रेमकिशन खन्ना, भगवती चरण, ठाकुर रोशन सिंह और राय राम नारायण को जानते थे।
5. बिस्मिल ने कई हिंदी कविताएँ लिखीं देशभक्ति कविताएं लिखते समय उनकी मुख्य प्रेरणा थीं। जिनमे सबसे प्रसिद्ध “सरफरोशी की तमन्ना “ रही |
6. राम प्रसाद ने बांग्ला रचनाओं के अनेक हिन्दी अनुवाद किये। उनके कुछ कार्यों में शामिल हैं, 'द बोल्शेविक प्रोग्राम', 'ए सैली ऑफ द माइंड', 'स्वदेशी रंग', 'कैथरीन' आदि।
7. 19 दिसंबर 1997 को भारत सरकार द्वारा बिस्मिल के जन्म शताब्दी वर्ष पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था।
