रतनपुर की महामाया माता
छत्तीसगढ़ – धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ पूरे देश में अपने संस्कृति और परम्पराओं के लिया जाना जाता है | यहाँ किसी भी धर्म के प्रति भेद-भाव नहीं किया जाता है | छत्तीसगढ़ ने सभी धर्मों को अपनाया है | छत्तीसगढ़ में अनेक देवी-देवताओं के धार्मिक स्थल बनाये गए है जो काफी प्राचीन और प्रसिद्ध है | ऐसा ही एक मंदिर है महामाया मंदिर | इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1552 में हुआ था। मंदिर का जीर्णोद्धार वास्तुकला विभाग द्वारा कराया गया है। मंदिर का स्थापत्य कला भी बेजोड़ है। गर्भगृह और मंडप एक आकर्षक प्रांगण के साथ किलेबध्द हैं, जिसे 18 वीं शताब्दी के अंत में मराठा काल में बनाया गया था | यह मंदिर बिलासपुर जिले से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | मान्यता है कि त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा के द्वारा रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ राज्य में शासन किया। राजा रत्नदेव प्रथम के द्वारा मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनायी गई तथा इसके साथ ही साथ श्री आदिशक्ति मां महामाया देवी मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम के द्वारा 12 वीं शताब्दी में कराया गया था |
पौराणिक कथा
मान्यता है कि भगवान शिव जब सती के मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में तांडव नृत्य करने लगे तब भगवान शिव का यह रौद्र रूप देखकर सारे देवतागण भयभीत हो गए थे | तब सारे देवतागण ब्रम्हदेव के पास गए | तब ब्रम्हदेव ने उन सभी को भगवान विष्णु के पास जाने के लिए कहा, भगवान विष्णु ने कहाँ इस समय महादेव के सामने जाना उचित नहीं है | जब तक उनके गोद मे मां सती का पार्थिव शरीर है, वो शांत नहीं होंगे | तब भगवान विष्णु ने उस समय भगवान शिव को वियोग मुक्त करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े कर दिए | माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए | महामाया मंदिर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था | माना जाता है कि नवरात्र में यहां की गई पूजा निष्फल नहीं होती है|
माता के मंदिर के निमार्ण की कहानी
रतनपुर के राजा रत्नदेव एक बार जब मणिपुर में एक वृक्ष से नीचे विश्राम कर रहे थे | तब राजा ककी आखें आधी रात में खुली तो उन्होंने देखा की वृक्ष के ठीक नीचे से अलौकिक प्रकाश आ रही थी | यह देख राजा चकित हो गए कि वहां आदिशक्ति माता महामाया देवी की सभा लगी है | यह देख राजा रत्नदेव आश्चय हो गए और सुबह होने पर वे अपनी तत्कालीन राजधानी तुम्मान खोल लौट गए तथा रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया एवं 1050 ई. में आदिशक्ति मां महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया गया |
महत्त्व
इस मंदिर का महत्व ये है कि यहाँ कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं जाता है , और यहाँ कुवारी कन्याओं को सौभाग्य की प्राप्ति होती है |
