आजाद हिंद फौज को स्थापित करने वाले क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने भारत को आजादी दिलाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी अंग्रेजों के प्रभुत्व के खिलाफ लड़ते रहे। वर्ष 1905 में जब बंगाल विभाजन का विरोध पूरे देश में जारी था, तब पहली बार रासबिहारी बोस क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हुए। इस आंदोलन के दौरान उन्होंने अरविंद घोष और जतिन मुखर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की सोच को देशवासियों के सामने उजागर करने का प्रयत्न किया। उनका परिचय धीरे-धीरे बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ क्रान्तिकारी संगठन के अमरेन्द्र चटर्जी और अरविद घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी से हुआ। उनके नेतृत्व में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम से हमला करने की योजना बनाई।
गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया
रासबिहारी बोस ने भारत को आजादी दिलाने के लिये प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर पार्टी के सरदार करतार सिंह सराभा के साथ मिलकर गदर आंदोलन के माध्यम से 1857 की तरह क्रांति की योजना बनायी और 21 फरवरी, 1915 के दिन एक साथ पूरे देश में इसे शुरू करना था। इस योजना के बारे में अंग्रेजों को पता चलने पर क्रांतिकारियों को दो दिन पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया और योजना असफल हो गई। उनके क्रांतिकारी कार्यों का एक प्रमुख केंद्र वाराणसी रहा, जहाँ से उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का संचालन किया।
जापान में रहकर देश की आजादी के लिए लड़े
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान युगांतर के कई नेताओं ने ‘सशस्त्र गदर क्रांति’ की योजना बनाई, जिसमें रासबिहारी बोस की प्रमुख भूमिका थी। इस योजना के असफल होने पर के बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी के पीछे लग गयी, जिसके कारण उन्हें भागकर जून 1915 में राजा पी. एन. टैगोर के छद्म नाम से जापान जाना पड़ा और वहीं से देश की आजादी के लिए उम्रभर संघर्ष करते रहे। जापान में उन्होंने अपने जापानी क्रांतिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतंत्रता के लिये निरंतर प्रयास किया।
जापान में उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। वहाँ पर उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। उन्होंने जापानी भाषा भी सीख ली और इस भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘रामायण’ का भी अनुवाद जापानी भाषा में किया। रासबिहारी बोस ने जापान में ही वर्ष 1916 में विवाह कर लिया और वर्ष 1923 में जापानी नागरिकता प्राप्त कर ली। यही रहकर रासबिहारी ने जापानी अधिकारियों को भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और भारत की आजादी की लड़ाई में उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
वर्ष 1942 ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना
रासबिहारी बोस के प्रयासों से टोक्यो में ‘इंडियन इंडीपेंडेंस लीग’ की स्थापना मार्च 1942 में की गई और भारत की आजादी दिलाने के लिए एक सेना गठित करने का प्रस्ताव भी पेश किया। जून 1942 में उन्होंने बैंकाक में इंडियन इंडीपेंडेंस लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया गया। मलय और बर्मा के मोर्चे पर जापान ने कई भारतीय युद्धबंदियों को पकड़ा था। इन युद्धबंदियों को इंडियन इंडीपेंडेंस लीग में शामिल होने और आजाद हिन्द फौज यानि आई.एन.ए. का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया।
आई.एन.ए. इंडियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितम्बर 1942 में गठित की गयी। इसके बाद जापानी सैन्य कमान ने रास बिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आई.एन.ए.के नेतृत्व से हटा दिया, लेकिन आई.एन.ए. का संगठनात्मक ढाँचा बना रहा। बाद में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आई.एन.ए. का पुनर्गठन किया।
क्रांतिकारी रास बिहारी बोस का निधन
भारत को ब्रिटिश प्रभुत्व से आजादी दिलाने का सपना लिए भारत माता का यह वीर सपूत 21 जनवरी, 1945 को परलोक सिधार गया। रासबिहारी बोस के के कार्यों के लिए जापानी सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ के सम्मान से सम्मानित किया।
