काठमांडू, 06 जून । नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने गत वर्ष 8 एवं 9 सितंबर को हुए जेनजी आंदोलन के दौरान बच्चों को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल किए जाने तथा हिंसा भड़काने के लिए उकसाने वाली गतिविधियों में संलिप्तता का निष्कर्ष निकाला है।
आयोग की सदस्य एवं जेनजी आंदोलन जांच समिति की संयोजक डॉ. लीली थापा ने शनिवार को एक कार्यक्रम में कहा कि जांच के दौरान बच्चों को मानव ढाल के रूप में उपयोग किए जाने के प्रमाण मिले हैं। आंदोलन के दौरान हुई गतिविधियां मानवाधिकार के दृष्टिकोण से अत्यंत गंभीर हैं।
थापा ने जांच के निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए कहा, “काफी लोग उत्साहित होकर आंदोलन में आगे आए और वहां बच्चों को ह्यूमन शील्ड के रूप में इस्तेमाल किया गया। नेपाल बाल अधिकार संबंधी अंतरराष्ट्रीय महासंधि (सीआरसी) का पक्षकार देश है। यदि बाल अधिकारों का उल्लंघन होता है तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। हमारे पास ऐसे वीडियो भी हैं जिनमें एक जिम्मेदार व्यक्ति बच्चों को अगले दिन बैग और अन्य सामग्री लेकर आने तथा बम बनाना सीखने के लिए कहता दिखाई देता है।”
रिपोर्ट में प्रधानमंत्री और नेपाली सेना को कथित रूप से जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने संबंधी उठे सवालों का खंडन करते हुए थापा ने स्पष्ट किया कि आयोग ने केवल उपलब्ध तथ्य और प्रमाणों के आधार पर ही सिफारिशें की हैं। उनका कहना था कि नेपाली सेना को घटना में जिम्मेदार दिखे कमांडरों को सचेत करने तथा भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न होने देने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने की सिफारिश की गई है।
उन्होंने कहा, “यह कहा जा रहा है कि वर्तमान प्रधानमंत्री का नाम क्यों नहीं शामिल किया गया और सेना को क्यों छोड़ा गया। लेकिन सेना को नहीं छोड़ा गया है। यदि सिफारिशों को ध्यान से देखा जाए तो सेना को स्पष्ट निर्देश देने की बात कही गई है। सेना प्रमुख और कमांडरों को भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराने तथा आयोग को सहयोग करने का निर्देश देने की सिफारिश की गई है।”
प्रधानमंत्री का नाम रिपोर्ट में शामिल न किए जाने के बारे में थापा ने कहा कि आयोग ने किसी दबाव या भय में नहीं, बल्कि गहन विश्लेषण और मानवाधिकार के सिद्धांतों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट तैयार करते समय मृत युवाओं और पीड़ित परिवारों की पीड़ा को केंद्र में रखा गया।
जांच के दौरान आयोग ने कुल 437 वीडियो क्लिप का अध्ययन किया। इन वीडियो की प्रामाणिकता की जांच के लिए बाहरी विशेषज्ञों की भी सहायता ली गई। परीक्षण के बाद लगभग 35 वीडियो वास्तविक पाए गए, जिनमें कुछ उच्च पदस्थ व्यक्तियों और अभियानों से जुड़े लोगों द्वारा हिंसक गतिविधियों के लिए उकसाने के प्रमाण मिले।
थापा ने बताया कि वीडियो में कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों को यह कहते हुए देखा गया कि “इस तरह बम बनाओ, इस तरह आओ, पानी की बोतल और बैग लेकर आओ, विद्यार्थियों को आगे रखो, ह्यूमन शील्ड बनाओ, बम ऐसे बनाया जाता है और आंखों में यह लगाओ।” उन्होंने कहा कि ऐसे प्रमाण मिलने के बाद आयोग के लिए संबंधित व्यक्तियों को आगे की जांच से बाहर रखना संभव नहीं था।
रिपोर्ट के अनुसार वीडियो में बच्चों को आगे रखकर मानव ढाल बनाने, बम बनाना सिखाने तथा सुरक्षाकर्मियों पर हमला करने के लिए उकसाने जैसी गतिविधियां दिखाई दी हैं। थापा ने कहा, “54 व्यक्तियों के नामों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। उनके नाम इसलिए शामिल किए गए क्योंकि आंदोलन में उनकी उकसाने वाली भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई है।”
आयोग ने कहा कि नेपाल द्वारा बाल अधिकार संबंधी अंतरराष्ट्रीय महासंधि (सीआरसी) का अनुमोदन किए जाने के कारण किसी भी आंदोलन में बच्चों का उपयोग मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने तथा दोषियों को कानून के दायरे में लाने के लिए सरकार को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है।
