त्रिपुरी में स्व की विजय से स्वतंत्रता के शिखर तक :- नेताजी सुभाष चंद्र बोस | The Voice TV

Quote :

“स्वयं जैसे हो वैसे ही रहो; बाकी सब तो पहले से ही कोई और बन चुके हैं।” ― ऑस्कर वाइल्ड

Editor's Choice

त्रिपुरी में स्व की विजय से स्वतंत्रता के शिखर तक :- नेताजी सुभाष चंद्र बोस

Date : 23-Jan-2024

 नेताजी सुभाष चंद्र बोस" की 127वीं जयंती पर शत् शत् नमन है | "नेताजी को सन् 1939 में जबलपुर के पवित्र तीर्थ त्रिपुरी में मिला था, भारत का शीर्ष नेतृत्व, देश के युवाओं ने गाँधी जी को नकार दिया था "-महा महारथी महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी - आजाद हिंद नायक - नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अवतरण  एवं पराक्रम दिवस की अनंत कोटि शुभकामनायें जबलपुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का 4 बार शुभ आगमन हुआ|

प्रथम बार 22 दिसंबर 1931 से 16 जुलाई 1932 (जबलपुर सेंट्रल जेल में प्रथम प्रवास लगभग 6 माह 25 दिन) , द्वितीय बार 18 फरवरी 1933 से 22 फरवरी 1933 (जबलपुर सेंट्रल जेल में द्वितीय प्रवास 4 दिन) तृतीय 5 मार्च 1933 से 11 मार्च 1939 (तृतीय प्रवास त्रिपुरी अधिवेशन के समय 7 दिन) एवं चतुर्थ 4 जुलाई 1939 आईये चलते हैं, त्रिपुरी अधिवेशन की ओर - 29 जनवरी को 1939 को मतदान हुआ और परिणाम अत्यंत विस्मयकारी आए |

1580वोट नेताजी को मिले और महात्मा गाँधी व अन्य सभी के प्रतिनिधि पट्टाभि सीतारमैय्या को 1377 ही वोट मिल पाये.. इस तरह नेताजी ने 203 वोट के अंतर से हरा दिया.. और गाँधी जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार के रुप में स्वीकार कर लिया चूँकि अब नेतृत्व हाथ से निकल गया था इसलिए दुबारा नेतृत्व कैंसे हाथ में लिया जाये.. फिर क्या था? ऐंसी चालें चली गयीं जिससे इतिहास भी शर्मिंदा है! 

क्यों था त्रिपुरी अधिवेशन1939 (जबलपुर) इतिहास का भूकंप?..तत्कालीन विश्व की राजनीति का सबसे घातक बयान था "पट्टाभि की हार मेरी(व्यक्तिगत)हार है"..महात्मा गाँधी..गाँधी जी जान गये थे की देश की युवा पीढ़ी और नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस के हाथ में चला गया है अब क्या किया जाए? इसलिए उक्त कूटनीतिक बयान दिया गया.. अब त्रिपुरी काँग्रेस अधिवेशन में पट्टाभि की हार को गाँधी जी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था |

5 मार्च को 52 वें अधिवेशन में नेताजी की विजय पर 52 हाथियों का जुलूस निकाला गया.. नेताजी अस्वस्थ थे इसलिए रथ पर उनकी एक बड़ी तस्वीर रखी गई 10 मार्च 1939 को तिलवारा घाट के पास विष्णुदत्त नगर में 105 डिग्री बुखार होने बाद भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना वक्तव्य दिया जिसे उनके बड़े भाई श्री शरत बोस ने पूर्ण किया इस दिन 2 लाख स्वतंत्रता के दीवाने उपस्थित रहे यह अपने आप में एक अभिलेख है  इस भाषण में उन्होंने अंग्रेजों को 6 महीने का अल्टीमेटम देने के लिए कहा गांधी जी समेत अन्य शीर्ष नेताओं के साथ अंग्रेजों के हाथ - पांव फूल गए। एक सोची समझी संयुक्त चाल के अंतर्गत विवाद की स्थिति बना दी गई क्योंकि गांधी जी के समर्थक इस बात पर गांधी जी का समर्थन चाहते थे(यह अलोकतांत्रिक था और गांधी जी की तानाशाही भी थी) और प्रस्ताव टल गया परंतु आगे भी गांधी जी तैयार ही नहीं हुए , वे तो परामर्श देने भी तैयार नहीं हुए इसलिए कांग्रेस की कार्य समितियों ने सुभाष चंद्र बोस के साथ असहयोग किया .. और सुभाष चन्द्र बोस ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.. उसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 60 हजार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आजाद हिंद फौज बनायी जिसके दवाब में अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा क्योंकि भारतीय थल सेना, जल सेना और वायुसेना से आजाद हिंद फौज के सेनानियों के विरुद्ध बरतानिया सरकार के क्रूरता पूर्ण व्यवहार के चलते स्वाधीनता संग्राम छेड़ दिया था - इस बात को सन् 1956 में इंग्लैंड के सेवानिवृत्त प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने कलकत्ता में सार्वजनिक रुप से स्वीकार किया |

लेखक:- डॉ आनंद सिंह राणा


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement