भगवान प्रलय की पश्चात क्षीरसागर में शयन करते थे । अंकोरवाट के कल्पनाकर ने मानव कृत पर्वत पर सुमेर की कल्पना की। प्रत्येक खंड को जल से गिरकर सागर के बीच उन्हें बनाया। 75 फीट ऊंचाई तक प्रति 25 फीट पर एक-एक सागर है। उस सागर के मध्य में प्रत्येक खंड है।
प्राचीन अंकोरवाट के ध्वंसावशेष 15 मील से अधिक भूमि परिधि को घेरे पड़े हैं। इसे संसार भर में उपलब्ध धवंसाव्शेशों में सबसे अधिक विशाल और बहुमूल्य कहा जा सकता है। इसका महा प्रांगण पेरिस के प्रसिद्ध पैलेस "दला कांकोई" से चार गुना बड़ा है। 'नाम पेंह' से 80 मील दूर अंकोरवाट है। इसके अवशेष मीलों तक बिखरे पड़े हैं। ब्रह्मा ,विष्णु, महेश की विशालकाय मूर्तियां कला कुशल हाथों से बनाई हुई हैं। जिनके सामने रोम, मिश्र और यूनान के कला प्रतीक भी तुच्छ प्रतीत होते हैं।
कंबोडिया के धर्मावलंबियों के पूजाग्रहों में वहां धनुषधारी राम और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। सरकारी मुद्रा पर हनुमान जी छपे हैं । सेना के ध्वज पर भी हनुमान जी विराजे हैं। राजधानी नाम पेन्ह के आधुनिकतम खेल स्टेडियम पर हनुमान जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। हनुमान जी वहां के मानस देवता हैं।
इतिहासकार कैंटलई और ली. टाओ युआन के कथनानुसार ईसा की तीसरी शताब्दी में कंबोडिया में हिंदू राज स्थापित हो चुका था। वहां उपलब्ध लेखो से विदित होता है की- प्राचीन काल में वहां एक असभ्य जाती रहती थी। जिसकी रानी का नाम ल्यू ए अथवा सोमा था। जिसने भारत से पहुंचे कोडिंय नामक ब्राह्मण से विवाह कर लिया और उनका पुत्र आगे चलकर कंबोडिया का शासक बना। उसने कई छोटे छोटे राज्य स्थापित किया। इंद्र वर्मा,श्रेष्ठ बर्मन ,जय बर्मन, रूद्र बर्मन ,भवर्मन आदि शासक इसी वंश के थे।
अनामी और कंबोजी नागरिकों के चेहरे भारतीयों से मिलते हैं। उनकी नस्ल आर्य है। वे हिंदुओं की संताने हैं।
'मेकांग ' नदी का नामकरण भी कोंग शब्दों को मिलाकर किया गया है। जिसका अर्थ वहां की भाषा में ' गंगा माता ' होता है। सचमुच ही वहां उस सरिता को श्रद्धा भाव से भारतीयों की तरह ही पूजा जाता है।
कंबोडिया में प्रचलित एक जनश्रुति के अनुसार स्वयंभू ,मनु नामक महापुरुष ने उस देश को बसाया। उसकी संताने कंबू कहलाई। भारत में जिस प्रकार मनु की संतान का मानव कहलाना प्रचलित है। इस प्रकार उस देश के निवासी भी अपने को कंबू ,स्वयंभू मनु की संतान मानते हैं।
इतिहासकार लेवी, प्रिजुलस्की तथा जूब्लैक के लेखो से सिद्ध होता है कि- "कंबोडिया के प्राचीन निवासी भारतीय नस्ल के थे। पुरातत्ववेत्ता क्रोम तो इससे भी एक कदम आगे इस बात की पुष्टि करते हैं।
