दुख यह सोचकर होता है कि काफिर शब्द के बारे में क्या ममता जानती नहीं हैं? सदियों से यह शब्द किन के द्वारा किन्हें संबोधित करने के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है और आज भी उसी तरह से उपयोग में लाया जा रहा है; क्या यह भी वे नहीं जानती है? भारतीय ज्ञान परंपरा में शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है, प्रत्येक शब्द के पीछे गहरे निहितार्थ छिपे रहते हैं। ऐसे में काफिर शब्द जिस अर्थ में उपयोग किया जाता है, उस अर्थ में यह शब्द इस्लाम में भाषायी दृष्टि से यह अरबी से आया है। इसका उपयोग उनके लिए होता है जिनका विश्वास इस्लाम में नहीं है। यदि इसके अधिक विस्तार में जाएं तो "वह व्यक्ति जो इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार अल्लाह और उसके रसूल प्रोफेट मोहम्मद को नहीं मानता है। फिर चाहे वह किसी भी धर्म का हो और किसी भी धर्म की मान्यता के अनुसार ईश्वर में आस्था रखता हो उसके लिए इतिहास में "काफिर" शब्द का प्रयोग है। आसान भाषा में उन लोगों के लिए ये शब्द है जो गैर-मुस्लिम है। जो इस्लाम में नहीं मानते हैं।
आश्चर्य होता है यह देखकर कि जिस समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश और दुनिया के तमाम देशों में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की खुशियां मनाई जा रही थीं, उस समय में ममता पश्चिम बंगाल के आम लोगों को अपनी जहरीली जुबान से भड़काने का काम कर रही थीं। वह भी ‘सर्व धर्म समभाव’ नाम से बुलाई गई रैली में। यहां वे लोगों को कड़ी चेतावनी देते हुए बोली हैं कि जो बीजेपी का समर्थन करते हैं या उसे वोट देते हैं। उन्हें देखेंगे।...एक बात याद रखना, बीजेपी की मदद मत करो, बीजेपी का अगर तुम लोग मदद करोगे कोई, तो अल्लाह की कसम, आप लोगों को कोई माफ नहीं करेगा, हम तो माफ नहीं करेंगे। फिर आगे बोलीं, “जो काफिर हैं, वो डरते हैं, वो मरते हैं, जो लड़ते हैं वो जिंदा रहते हैं, वो बसते हैं, वो काम करते हैं।
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
