'राष्ट्र की बेटी'- रानी गाइदिन्ल्यू
मार्च 2018 में पीएम मोदी मणिपुर पहुंचे थे। इस दौरान अपने संबोधन में पीएम ने मणिपुर की रानी गाइदिन्ल्यू को 'राष्ट्र की बेटी' कहकर संबोधित किया था।
13 साल की उम्र में रानी गाइदिनल्यू ने अपने चचेरे भाई हाईपू जदोनांग के साथ 'हेराका आंदोलन' से जुड़ने का फैसला किया। जीलियांगरोंग नगा समुदाय में सुधार के लिए हेराका आंदोलन छेड़ा गया था। बाद में यह धार्मिक आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। इसका मुख्य कारण नगाओं पर अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार थे। इसका एकमात्र मकसद मणिपुर और नगा आबादी वाली क्षेत्र से ब्रिटिश उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंकना |
जदोनांग को फांसी और गाइदिनल्यू के हाथ में कमान
राजनीतिक आंदोलन को ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने लिए चुनौती के तौर पर देखा। आंदोलन की क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 29 अगस्त, 1931 को अंग्रेजों ने जदोनांग को गिरफ्तार करके फांसी पर चढ़ा दिया। जदोनांग की फांसी के बाद आंदोलन की कमान रानी गाइदिन्ल्यू ने संभाल ली। उनको प्यार से रानीमा के नाम से पुकारा जाने लगा। ब्रिटिश शासन ने उनको 1932 में गिरफ्तार कर लिया। भले ही उनको राजनीतिक बंदी बना लिया गया लेकिन उनका वह एक असरदार लीडर के तौर पर उभरीं।
अंग्रजों के खिलाफ मोर्चा
उन्होंने नागाओं के कबीलों में एकता स्थापित करके अंग्रेजों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कदम उठाए। आदिवासी क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा कराए जा रहे धर्म परिवर्तन पर भी उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उसका जमकर विरोध किया। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और निर्भयता को देखकर जनजातीय लोग उन्हें देवी का अवतार मानने लगे। उन्होंने अपने आंदोलन को बड़े पैमाने पर चल रहे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। उन्होंने मणिपुर क्षेत्र में गांधीजी के संदेश को भी फैलाया।
अंग्रेजों ने आंदोलन को दबाने की भरपूर कोशिश की
सन 1972 में उन्हें ‘ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार’, 1982 में पद्म भूषण और 1983 में ‘विवेकानंद सेवा पुरस्कार’ दिया गया। सन 1991 में वे अपने जन्म-स्थान लोंग्काओ लौट गयीं जहाँ 17 फरवरी 1993 को 78 साल की आयु में उनका निधन हो गया।
