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26 जनवरी जयंती विशेष:- राष्ट्र की बेटी- रानी गाइदिन्ल्यू

Date : 25-Jan-2024

'राष्ट्र की बेटी'- रानी गाइदिन्ल्यू  

मार्च 2018 में पीएम मोदी मणिपुर पहुंचे थे। इस दौरान अपने संबोधन में पीएम ने मणिपुर की रानी गाइदिन्ल्यू को 'राष्ट्र की बेटी' कहकर संबोधित किया था।

रानी गाइदिन्ल्यू नॉर्थ ईस्ट की एक जानी-मानी भारतीय महिला क्रांतिकारी थीं। सिर्फ 13 साल की उम्र में ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर दिया था।इतना ही नहीं, ईसाई मिशनरियों के द्वारा आदिवासियों के धर्म परिवर्तन का भी उन्होंने जमकर विरोध किया। रानी गाइदिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को मणिपुर के तमेंगलोंग जिले के तौसेम उप-खंड के नुन्ग्काओ नामक गांव में हुआ था।  

13 साल की उम्र में रानी गाइदिनल्यू ने अपने चचेरे भाई हाईपू जदोनांग के साथ 'हेराका आंदोलन' से जुड़ने का फैसला किया। जीलियांगरोंग नगा समुदाय में सुधार के लिए हेराका आंदोलन छेड़ा गया था। बाद में यह धार्मिक आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन में बदल गया। इसका मुख्य कारण नगाओं पर अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचार थे। इसका एकमात्र मकसद मणिपुर और नगा आबादी वाली क्षेत्र से ब्रिटिश उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंकना |

जदोनांग को फांसी और गाइदिनल्यू के हाथ में कमान

राजनीतिक आंदोलन को ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने लिए चुनौती के तौर पर देखा। आंदोलन की क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 29 अगस्त, 1931 को अंग्रेजों ने जदोनांग को गिरफ्तार करके फांसी पर चढ़ा दिया। जदोनांग की फांसी के बाद आंदोलन की कमान रानी गाइदिन्ल्यू ने संभाल ली। उनको प्यार से रानीमा के नाम से पुकारा जाने लगा। ब्रिटिश शासन ने उनको 1932 में गिरफ्तार कर लिया। भले ही उनको राजनीतिक बंदी बना लिया गया लेकिन उनका वह एक असरदार लीडर के तौर पर उभरीं।

अंग्रजों के खिलाफ मोर्चा

उन्होंने नागाओं के कबीलों में एकता स्थापित करके अंग्रेजों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कदम उठाए। आदिवासी क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा कराए जा रहे धर्म परिवर्तन पर भी उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उसका जमकर विरोध किया। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और निर्भयता को देखकर जनजातीय लोग उन्हें देवी का अवतार मानने लगे।  उन्होंने अपने आंदोलन को बड़े पैमाने पर चल रहे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। उन्होंने मणिपुर क्षेत्र में गांधीजी के संदेश को भी फैलाया।

अंग्रेजों ने आंदोलन को दबाने की भरपूर कोशिश की

रानी द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने वहां के कई गांव जलाकर राख कर दिए। लेकिन वे आदिवासियों का उत्साह कम नहीं कर पाए। स्थान बदलते, अंग्रेज़ों की सेना पर छापामार प्रहार करते हुए गाइदिन्ल्यू ने एक ऐसा क़िला बनाने का फैसला किया जिसमें उनके चार हजार साथी रह सकें। इस पर काम चल ही रहा था कि 17 अप्रैल, 1932 को अंग्रेजों की सेना ने अचानक आक्रमण कर दिया। गाइदिन्ल्यू गिरफ़्तार कर ली गईं, उन पर मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा हुई।

अंग्रेजों ने उनको दबाने की जितनी कोशिश की, उतनी ही उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। उनकी रिहाई के मामले को ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में उठाया गया। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो 14 सालों तक जेल में रहने के बाद रिहाई मिली। उन्होंने अखंड भारत के अंदर नागा रीति-रिवाजों, आस्थाओं और परपंराओं के संरक्षण के लिए काम जारी रखा। मणिपुर के अलगाववादी गुटों का उन्होंने जमकर विरोध किया। उनको सशस्त्र विद्रोहियों की ओर से धमकी मिलती रहती थी जिस वजह से वह 1960 में अंडरग्राउंड हो गईं। लेकिन उनके दुश्मन उनके दृढ़ संकल्प को कमजोर नहीं कर सके। वह किसी भी कीमत पर नागा क्षेत्रों के भारत से अलग होने के पक्ष में नहीं थीं।

सन 1972 में उन्हें ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार’, 1982 में पद्म भूषण और 1983 में विवेकानंद सेवा पुरस्कारदिया गया। सन 1991 में वे अपने जन्म-स्थान लोंग्काओ लौट गयीं जहाँ 17 फरवरी 1993 को 78 साल की आयु में उनका निधन हो गया।

 

 

 


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