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शिक्षाप्रद कहानी:- बुद्धिमान कपिल

Date : 24-Feb-2024

 

 
नितिन और लक्ष्मी ने कपिल से कुट्टी कर दी। कारण, कपिल अब उनके साथ नहीं खेलता था। खेलने के समय कहीं और चला जाता था। लक्ष्मी के बार-बार पूछने पर भी उसने नहीं बताया कि वह कहां जाता है। नितिन ने उससे कहा कि उसे साथ ले चले। कपिल ने मना कर दिया। अब नितिन और लक्ष्मी ने मिलकर तय किया कि वे कपिल से कभी नहीं बोलेंगे।
 
आज तीसरा दिन था, कपिल आज भी खेलने नहीं आया। माता-पिता की आज्ञा से सभी बच्चे 'बच्चों के पार्क' में खेलने के लिए इकट्ठे होते। नितिन, कपिल और लक्ष्मी एक साथ खेलते थे। क्या खेलना है, यह कपिल तय करता था। नितिन और लक्ष्मी का आज कोई खेल नहीं हो सका। लक्ष्मी ने कहा- "नितिन, कोई भी खेल अच्छा नहीं लगता। क्या तुम्हें अच्छा लगता है?"
 
"नहीं, मुझे भी अच्छा नहीं लगता।"
 
"क्यों अच्छा नहीं लगता?"
"पता नहीं, बस, अच्छा नहीं लगता।"
 
"चलो, उनके साथ चलकर खेलते हैं।"
 
"नहीं, मैं नहीं खेलूंगा उनके साथ। वे अच्छे नहीं हैं। उनमें
 
बुरी आदतें हैं। मां ने उनके साथ खेलने को मना किया है।" नितिन ने सिर हिलाते हुए कहा।
 
उनमें क्या है।"
 
लक्ष्मी बहस के स्वर में बोली "बच्चा कोई बुरा नहीं होता, मेरी मां कहती हैं, बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं।"
 
नितिन ने कहा "लेकिन बड़े होकर वे बुरी आदतें सीख जाते हैं। इसके बाद वे भगवान का रूप नहीं रह जाते। यदि उनमें अच्छी आदतें हों, तो उन्हें भगवान का रूप मान सकते है।"
 
"पर हमें उनकी बुरी आदतों के साथ नहीं खेलना है। उनके साथ खेलना है।" लक्ष्मी बोली।
 
नितिन जानता था कि बच्चों में आदतें कहां से और कैसे आती हैं। वह तुरंत बोल उठा-"उनके साथ खेलते रहने से ही उनकी अच्छी या बुरी आदतें तुम में आ जाएंगी और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।"
 
लक्ष्मी ने कहा- "हम यदि सावधान रहें, तो खेलते हुए भी हम बुरी आदतों से दूर रहेंगे और हमारी अच्छी आदतें उनमें जा सकती हैं। इससे वे बुरे नहीं कहलाएंगे।"
 
लक्ष्मी की बात बिल्कुल ठीक थी। नितिन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था, किंतु फिर भी वह वहां नहीं जाना चाहता था। वह बोला- "तुम चाहो तो जाओ, लेकिन मैं नहीं जाऊंगा। कपिल के बिना मुझे वहां भी अच्छा नहीं लगेगा।"
 
लक्ष्मी भी नहीं जाना चाहती थी। वह चुपचाप खड़ी रही। थोड़ी देर तक दोनों मिट्टी में अपनी-अपनी उंगली से लकीरें
खींचते रहे। प्रतिदिन उनकी निराशा बढ़ती जाती थी। लक्ष्मी ३ सिर उठाया।
 
सूर्य अपने घर जा रहा था। वह उठी और अपने घर की ओर चल दी। नितिन भी उठा, वह भी अपने घर की और चलने लगा।
 
नितिन ने थोड़ी दूरी से लक्ष्मी को पुकारकर मैं कल खेलने नहीं आऊंगा।" कहा- "लक्ष्मी
 
लक्ष्मी रुकी। मुड़कर उसने नितिन की ओर देखा अवश्य, पर कुछ बोली नहीं। निराशा लिए, धीरे-धीरे अपने घर की ओर बढ़ गई।
 
नितिन रास्ते में मन-ही-मन कपिल के बारे में सोचता जा रहा था- 'न जाने कपिल को क्या हो गया है। न वह बात करता है, न अपने मन की बात बताता है। मुझसे तो उसका झगड़ा कभी नहीं हुआ। वह बड़ा है इसलिए लक्ष्मी भी उसका सम्मान करती है। फिर भी उसने हमारे साथ खेलना क्यों छोड़ दिया। हां, हो सकता है, वे बच्चे हमसे अच्छे हों, जिनके साह वह खेलने जाता है।' उसने निश्चय किया कि कल वह यह पता लगाएगा कि वह कहां जाता है और किसके साथ खेलत है।
 
अगले दिन पांच बजने से पहले ही वह कपिल के घर के पास पहुंचा। कुछ दूरी पर खड़ा होकर वह कपिल की प्रतीक्षा करने लगा। कपिल अपने घर से निकला। उसके हाथ में बल्ला
नहीं था, कुछ पुस्तकें थीं। नितिन भी उसके पीछे-पीछे चल नीक्षा दिया। कपिल पार्क की ओर न जाकर, सड़क की ओर मुड़ गया। नितिन भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। कपिल ने पहले
दाएं देखा, फिर बाएं और फिर सड़क पार हो गया। नितिन ने भी ऐसा ही किया। कपिल सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते पर चला जा रहा था। उसमें एक उत्साह दिखाई दे रहा था। नितिन ने भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। सामने एक मैदान था। मैदान के दूसरे छोर पर कुछ झोंपड़ियां बनी हुई थीं। कपिल ने रास्ता छोड़ दिया। वह इस खेल के मैदान के अंदर चला गया। नितिन बाहर रुक गया। वह सोचने लगा 'कपिल यहां खेलता है परंतु यहां तो उसके साथ खेलने वाला कोई नहीं, मैदान भी खेलने लायक नहीं है।' नितिन सोच ही रहा था कि कपिल के तेज कदम मैदान को पार कर गए। नितिन दौड़ा जिससे वह कपिल को देख सके। उसने दूर से इतना ही देखा कि कपिल मैदान के पार बनी झोंपड़ियों की बस्ती में घुसा है। उसके बार वह कहां गया, उसे पता नहीं चला। फिर भी उसका उत्साह कम न हुआ। वह भी उस बस्ती में घुस गया। दाएं घूमा, बा घूमा, आगे बढ़ा। बस्ती मानो सुनसान थी। मजदूरों की इस बस्ती में उसे कोई नहीं दिखाई दिया था। अंत में नितिन अपनी मंजिल पर पहुंच गया। उसने कपिल को ढूंढ़ ही लिया। उसने देखा कि कपिल मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चों को एक चबूतरे पर बैठकर पढ़ा रहा है। उन्हें हाथ पकड़कर लिखना सिखा रहा है। लकड़ी के फट्टे पर अक्षर और अंक ख लिख-लिखकर उन्हें समझा रहा है। नितिन ठिठका खड़ा रहा। और कपिल के लिए उसके हृदय में प्यार और गहरा होता चला गया
 
 उसकी आंखों से आंसू बह निकले। थोड़ी देर तक वह अंक बड़ा-खड़ा रोता रहा। वह कपिल के पास नहीं गया। वहीं से लौट आया।
 
नितिन पार्क में पहुंचा। लक्ष्मी वहां अकेली निराश बैठी थी 
आकाश में उड़ते पक्षियों को देख रही थी। नितिन जाकर उसके पास खड़ा हो गया। उसने नितिन की ओर तनिक भी ध्यान न दिया। नितिन ने स्वयं बताना शुरू किया-"मुझे पता उसकी है कपिल कहां है। मैं यह भी जानता हूं कि वह कहां जाता है और क्या करता है।"
 
 
बिना रुके नितिन तीनों वाक्य बोल गया। लक्ष्मी की आंखों में चमक आ गई, मानो उसे उसकी कोई खोई हुई वस्तु मिल गई हो। नितिन ने लक्ष्मी को सब कुछ बता दिया। सुनकर लक्ष्मी की आंखें भी भर आईं। अपना खेल छोड़कर कपिल उन निर्धन बच्चों को पढ़ाने जाता है, जिन्होंने विद्यालय का मुंह तक नहीं देखा। दोनों ने हाथ मिलाया और निश्चय किया कि कल से वे भी वहां जाएंगे 1
 
अगले दिन ठीक पांच बजे कपिल अपने घर से निकला। उसने लक्ष्मी और नितिन को घर के सामने खड़े देखा। वह नहीं रुका। नितिन और लक्ष्मी भी उसके पीछे-पीछे चलने लगे।
 
कपिल रुका और बोला- "तुम दोनों मेरे पीछे-पीछे क्यों आ रहे हो। मैं तुम्हारे साथ नहीं खेल सकता। मुझे एक बहुत आवश्यक कार्य करना है।"
 
लक्ष्मी ने कहा- "हमें भी नहीं खेलना।"
 
नितिन बोला "हमें भी बहुत आवश्यक कार्य करना है।" दोनों ने अपने हाथ कपिल के आगे कर दिए। इनमें पुरानी कॉपियां, पुस्तकें और पेंसिलें थीं। कपिल समझ गया कि इनकोभी वही आवश्यक कार्य है, जो उसको है। इन्हें मेरे बारे में पता कभी चल गया है। वह मुस्करा दिया। नितिन और लक्ष्मी ने भी उसकी मुस्कराहट बांट ली। तीनों अपने लक्ष्य की ओर बढ़ चले।
तीनों बस्ती के पास पहुंचे तो आश्चर्य से ठिठक गए। अब वहां बस्ती नहीं थी। झोंपड़ियों का सामान पास खड़े ट्रकों में भरा जा चुका था। मजदूर अपने-अपने बच्चों को सहारा देकर ट्रकों में चढ़ा रहे थे।
 
एक मजदूर ने पूछने पर उसने बताया- "हमारा यहां का काम समाप्त हो गया है। हमारा ठेकेदार हमें दूसरे स्थान पर ले जा रहा है।"
 
कपिल सोचने लगा- 'इन बच्चों का भविष्य क्या है। एक खाना खाक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहने से इनकी शिक्षा कैसे पूरी होगी। जीवन-भर ये शिक्षा से दूर रहेंगे।'
 
कपिल की आंखों में आंसू आ गए। नितिन और लक्ष्मी भी कपिल को देखकर रो पड़े। ट्रक चलने लगे। उनकी आवाज तीनों के कानों से दूर होती जा रही थी। वे बच्चे भी शिक्षा से दूर होते जा रहे थे।

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