पिता का साया उठ गया था पर केशवजी ने पिता की इस सीख का जीवन भर पालन किया और मन लगाकर पढ़ाई पूरी की । अपने लक्ष्य निर्धारित किये और आगे बढ़े । पढ़ाई के दौरान वे सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी अध्ययन करते रहे । उन दिनों चाफेकर बंधुओं के बलिदान से पुणे का वातावरण बहुत गर्म था। असंतोष को दबाने केलिये अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे । वहीं तिलक जी का सामाजिक जागरण का अभियान भी चल रहा था । इसी वातावरण में केशव जी ने अपनी विद्यालयीन शिक्षा पूरी की और मेडिकल की पढ़ाई के लिये 1910 में कलकत्ता चले गये । कलकत्ता में वे युवाओं की अनुशीलन समिति के संपर्क में आये । यह समिति बंगाल में क्राँतिकारियों के लिये काम करती थी । केशव जी अनुशीलन समिति में सक्रिय हुये । उन्होंने 1915 मेडिकल की डिग्री प्राप्त की और नागपुर लौट आये । यहाँ लौटकर उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और काँग्रेस की गतिविधियों से जुड़ गये । यद्यपि परिवार जन चाहते थे कि वे डाँक्टरी पढ़कर आये हैं कोई औषधालय खोल लें या सरकारी औषधालय से जुड़ जायें और विवाह कर लें । पर डा केशव ने ये दोनों काम न कियै । वे पूरी तरह राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित हो गये । काँग्रेस में वे उस टोली के समर्थक थे जो गर्म दल की मानी जाती थी । इस दल के नेता तिलकजी थे । डाक्टर केशव जी पूरा समय कांग्रेस को देने लगे । विदर्भ में घूम घूमकर सभायें करते और लोगों को जागरूक करके काँग्रेस से जोड़ते । 1916 में काँग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में सम्मिलित हुये । 1920 में नागपुर में आयोजित काँग्रेस अधिवेशन की तैयारियों का अधिकाँश दायित्व इन्हीं के ऊपर था । इन्होंने नागपुर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव रखा पर संयोगवश पारित न हो सका । 1921 में असहयोग आंदोलन के लिये उन्होंने पूरे क्षेत्र में सभायें की । लोगों को जाग्रत किया और आँदोलन से जोड़ा । वे गिरफ्तार हुये और एक वर्ष जेल में रहे । 12 जुलाई 1922 में रिहा हुये । वे अपने कार्यों से समाज और कांग्रेस में कितने लोकप्रिय थे इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब डा केशव हेडगेवार जेल से रिहा हुये और उनके स्वागत के लिये सभा का आयोजन हुआ । उस सभा में पं मोतीलाल नेहरू और हकीम अजमल खाँ जैसे नेता सम्मिलित हुये । लेकिन इसी वर्ष उनके काँग्रेस के कुछ नेताओं से मतभेद आरंभ हुये । इसका कारण असहयोग आंदोलन में खिलाफत आँदोलन को जोड़ना था । डा केशव हेडगेवार का मानना था संघर्ष केवल राष्ट्र और उसकी स्वतंत्रता के लिये हो इसे धार्मिक मुद्दों से अलग रखा जाये । राष्ट्रधर्म सबसे ऊपर है । अन्य धार्मिक विन्दु केवल उस सीमा तक ही रहना चाहिए जहाँ तक राष्ट्रीय आंदोलन को सहायता मिले । अभी यह आँदोलन चल ही रहा था कि देश के विभिन्न भागों से साम्प्रदायिक दंगों के समाचार आने लगे । विशेषकर मालाबार से, जहाँ धार्मिक आधार पर एक वर्ग के लोगों को निशाना बनाया गया । हत्या लूट बलात्कार और बलपूर्वक धर्मान्तरण के समाचार आये । अपनी पढ़ाई के दौरान भी वे बंगाल में इस प्रकार की घटनाओं के बारे में सुन चुके थे । उन्होंने डा बालकृष्ण शिवराम मुजे और स्वामी श्रृद्धानंद के साथ मालावार की यात्रा की । वहाँ का दृश्य देखकर व्यथित हो गये । लौटकर अपनी बात से वरिष्ठ नेताओं को अवगत कराया गाँधी जी से भी मिले । लेकिन वरिष्ठ जनों में किसी ने भी इस हिंसा को गंभीरता से न लिया अपितु कुछ ने तो यह प्रचार भी किया कि जो लोग मारे गये वे अंग्रेजों के समर्थक थे । ऐसा प्रचार करने वाली लाॅबी वही थी जिसने गाँधी जी को खिलाफत आँदोलन को काँग्रेस से जोड़ने केलिये तैयार किया था । यह लाॅबी फिर सफल हुई और मालाबार के पीड़ितों के प्रति किसी की सहानुभूति प्रकट नहीं हुई । डाॅ केशव हेडगेवार को लगा कि यह समस्या इसलिये है कि समाज में राष्ट्र और संस्कृति की प्राथमिकता का भाव कमजोर है । यदि इनके मन में राष्ट्र और संस्कृति के प्रति प्रबल भाव होता यह सब न होता । उन्हें लगा कि आने वाली पीढ़ी में राष्ट्र और संस्कृति को सर्वोपरि मानने का भाव जगाना होगा । इसके लिये उन्होंने 27 सितम्बर 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी । यह विजय दशमीं का दिन था । इस तिथि के बाद उनकी भूमिका दोहरी रही । वे राष्ट्र भाव और साँस्कृतिक चेतना के जागरण के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विस्तार में तो लगे और साथ ही अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिये काँग्रेस में भी सक्रिय रहे । यह डाॅ हेडगेवार के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि सामाजिक जागरण के लिये सक्रिय लगभग सभी संस्थाएँ और उनके प्रमुख उन्हें अपना विश्वस्त मानते थे । इनमें आर्य समाज, सशस्त्र क्राँति आँदोलनकारी आदि सभी प्रमुख संस्थाएँ भी।
लेखक - रमेश शर्मा
