प्रयागराज, 08 जून। हरित खाद एक प्राकृतिक एवं कम लागत वाली तकनीक है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, जैविक कार्बन में वृद्धि होती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। इसका उपयोग करने किसानों की आर्थिक आय में वृद्धि होगी। यह जानकारी सोमवार को कृषि विज्ञान केंद्र प्रयागराज सुआट्स संस्थान की कृषि वैज्ञानिक वैज्ञानिक डॉ. निमिषा नटराजन ने दी।
उन्होंने बताया कि खेत बचाओ अभियान कार्यक्रम के तहत किसानों व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से किसानों को जागरूक करने का अभियान चलाया जा रहा है। यह कार्यक्रम पूरे देश में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा संचालित किया जा रहे हैं।
उन्होंने किसानों को ढैंचा एवं सनई जैसी हरित खाद फसलों की खेती और उनके वैज्ञानिक उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अभियान के तहत कृषि विज्ञान केंद्र प्रयागराज ने 956 किसानों को हरित खाद के प्रति किया गया।
प्राकृतिक खेती एवं मृदा स्वास्थ्य सुधार
कृषि विज्ञान केंद्र, प्रयागराज की वैज्ञानिक डॉ. निमिषा नटराजन ने बताया कि हरित खाद एक प्राकृतिक एवं कम लागत वाली तकनीक है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, जैविक कार्बन में वृद्धि होती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।
उन्होंने किसानों को जानकारी देते हुए बताया कि ढैंचा एवं सनई जैसी हरित खाद फसलों की खेती और उनके वैज्ञानिक उपयोग भूमि की उर्वरा शक्ति मजबूत होगी।
जाने कैसे तैयार की जाएगी हरित खाद
इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सुबोध यादव ने बताया कि विभिन्न गांवों में आयोजित कार्यक्रमों, प्रशिक्षणों एवं किसान गोष्ठियों के माध्यम से 956 किसानों को हरित खाद के लाभों से अवगत कराया गया। उन्होंने बताया कि ढैंचा और सनई जैसी फसलें 45 से 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं तथा इन्हें खेत में पलटने से मिट्टी में जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि हरित खाद के प्रयोग से मिट्टी की संरचना सुधरती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता में वृद्धि होती है तथा फसल उत्पादन लागत कम करने में सहायता मिलती है। साथ ही यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों से खरीफ फसलों की बुवाई से पूर्व हरित खाद अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इससे मिट्टी अधिक उपजाऊ बनेगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय में भी सकारात्मक वृद्धि होगी।
