दिनांक 31 जनवरी 2025 को भारत सरकार की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन द्वारा लोक सभा में देश का आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 पेश किया गया। स्वतंत्र भारत का पहिला आर्थिक सर्वेक्षण वर्ष 1950-51 में बजट के साथ पेश किया गया था। 1960 के दशक में आर्थिक सर्वेक्षण को बजट से अलग कर दिया गया एवं इसे बजट के एक दिन पूर्व संसद में पेश किया जाने लगा। आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था की समीक्षा की जाती है एवं अर्थव्यवस्था की सम्भावनाओं को देश के सामने लाने का प्रयास किया जाता है। इसे देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार की देखरेख में वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के आर्थिक प्रभाग की ओर से तैयार किया जाता है।
सल्तनत और अंग्रेजी काल का इतिहास धोखे और फरेब से भरा है । दिखावटी दोस्ती और मीठी बातों में फँसाकर कर भारतीय शासकों को धोखा दिया ही गया, उनके अंदरूनी रिश्तों में भी ऐसी असंख्य घटनाएँ हैं। इसी शैली में 31 जनवरी 1561 को हमलावरों के एक गिरोह ने मुगल सेनापति बैरम खान की हत्या की थी । इस हत्या के बाद बैरम खान पत्नि सलीमा सुल्तान बेगम और बेटे रहीम को मुगल बादशाह अकबर के हरम में पहुँचा दिया गया ।
महात्मा गांधी का जीवन और उनके विचार न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। वे सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर चलते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख नेता बने। उनके विचार और संघर्ष आज भी हमें न्याय, समानता और शांति का मार्ग दिखाते हैं।
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे और उनकी परवरिश धार्मिक वातावरण में हुई। उन्होंने सत्य, अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांतों को बचपन से ही अपनाया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड गए, जहां से उन्होंने वकालत की डिग्री प्राप्त की।
गांधीजी ने अपने जीवन का एक बड़ा भाग समाज सेवा और स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित किया। वे केवल एक राजनेता नहीं बल्कि आध्यात्मिक गुरु भी थे, जिन्होंने भारतीय समाज और राजनीति को सत्य और अहिंसा के माध्यम से प्रभावित किया।
महात्मा गांधी का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण था। उनके द्वारा चलाए गए आंदोलनों ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं:
· सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व: उन्होंने सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलन के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया।
· असहयोग आंदोलन (1920-22): इस आंदोलन के तहत उन्होंने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करने और स्वदेशी अपनाने का संदेश दिया।
· दांडी यात्रा (1930): यह आंदोलन ब्रिटिश नमक कानून के खिलाफ एक ऐतिहासिक पैदल यात्रा थी।
· भारत छोड़ो आंदोलन (1942): इस आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारत को तुरंत स्वतंत्र करने की मांग की।
· चंपारण और खेड़ा आंदोलन: इन आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
महात्मा गांधी का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। उन्होंने पहले दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए आंदोलन किया और फिर भारत में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया।
1893 में, जब वे वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए, तो वहां भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव को देखकर उन्होंने इसके खिलाफ आंदोलन चलाया। उन्होंने वहाँ सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया, जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य हथियार बना। भारत लौटने के बाद, उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई अहिंसक आंदोलनों का नेतृत्व किया।
महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' का दर्जा सबसे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1944 में दिया। नेताजी ने सिंगापुर रेडियो के एक प्रसारण में उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया। इसके बाद, पंडित नेहरू सहित कई नेताओं ने इस उपाधि को स्वीकारा।
गांधीजी ने कई अहिंसक आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें प्रमुख हैं:
· रोलेट एक्ट सत्याग्रह (1919): इस काले कानून के खिलाफ भारतीय जनता को संगठित किया।
· असहयोग आंदोलन (1920-22): ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध का नया अध्याय।
· दांडी यात्रा (1930): 240 मील की यह यात्रा नमक कर के खिलाफ एक ऐतिहासिक विरोध थी।
· भारत छोड़ो आंदोलन (1942): यह आंदोलन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाने के लिए था।
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘द स्टोरी ऑफ माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ’ लिखी, जो 1927 में प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने जीवन, संघर्षों और नैतिक मूल्यों के प्रति उनके विचारों को साझा किया। यह पुस्तक आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
30 जनवरी 1948 को, दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी। गोडसे गांधीजी की हिंदू-मुस्लिम एकता की नीति से असहमत था। यह दुखद घटना बिड़ला भवन (अब गांधी स्मृति) में हुई, जब गांधीजी प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।
महात्मा गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनका जीवन सत्य, अहिंसा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। उनकी पुण्यतिथि, 30 जनवरी को ‘राष्ट्रीय शहीद दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। 2 अक्टूबर, गांधी जयंती, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में भी विश्वभर में मनाई जाती है।
महात्मा गांधी के विचार और संघर्ष आज भी हमें प्रेरित करते हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा परिवर्तन शक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम, अहिंसा और सहिष्णुता से आता है। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएं, तो हम न केवल अपने समाज को, बल्कि पूरी दुनिया को एक बेहतर स्थान बना सकते हैं।
आज भारत के संदर्भ में यह सपना देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा किए गए विभिन्न सुधार कार्यक्रमों के बल पर वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन जाएगा। परंतु, सकल घरेलू उत्पाद में औसतन लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ क्या भारत वास्तव में वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बन पाएगा अथवा भारत को अभी भी कई प्रकार के सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की आवश्यकता है। किसी भी देश को अपनी आर्थिक विकास दर को तेज करने के लिए कई प्रकार के सुधार कार्यक्रम लागू करने होते हैं। भारत ने वर्ष 1947 में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, एक लम्बे अंतराल के पश्चात देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1991 में प्रारम्भ किया। जबकि इस समय तक अमेरिका एवं कई यूरोपीय देश विकसित राष्ट्र बन चुके थे एवं चीन ने तो आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1980 में ही लागू कर दिया था तथा अपनी वार्षिक आर्थिक विकास दर को दहाई के आंकड़े के भी पार ले गया था। भारत इस मामले में बहुत पिछड़ चुका था।
1528 : राणा सांगा का बलिदान दिवस
महाराणा संग्राम सिंह जिनकी लोक जीवन में प्रसिद्धि "राणा साँगा" के नाम से है । एक ऐसे महान यौद्धा थे जिनका पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिये समर्पित रहा । उनका जन्म 12 अप्रैल 1484 को हुआ था । राणा सांगा राजपूतों के सिसोदिया उप वर्ग से संबंधित थे। यह सूर्यवंशी क्षत्रियों की एक शाखा है । भगवान राम, भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी भी इसी शाखा से माने जाते हैं। राणा संग्राम सिंह सुप्रसिद्ध विजेता राणा कुंभा के पौत्र और राणा रायमल के पुत्र थे । उन्होंने 1509 में चित्तौड़ की गद्दी संभाली इसके साथ ही विदेशी आक्रमणकारियों का वीरता से सामना किया । उन्होनें अपनी रणनिति और युद्ध कौशल से आक्रमणकारियों द्वारा छल बल से स्थापित की गई सत्ता को उखाड़ फेकने का अभियान आरंभ हुआ । उन्होंने अठारह बड़े बड़े युद्ध किये और सभी जीते । यद्यपि लोक जीवन की गाथाओं में उनके द्वारा सौ युद्ध जीतने का वर्णन है । लेकिन अठारह बड़े युद्धों को जीतना अंग्रैज शोध कर्ताओं ने भी स्वीकारा है। उन्होंने दिल्ली , मालवा और गुजरात के सुल्तानों को पराजित किया। उनका शासन वर्तमान राजस्थान , मध्य प्रदेश और गुजरात के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त करके अपने क्षेत्र का विस्तार विस्तारित हो गया था । उन्होंने हरियाणा , उत्तर प्रदेश और अमरकोट , सिंध के कुछ हिस्सों पर भी विजय प्राप्त की और दिल्ली सुल्तान लोधी से छीनकर आगरा में अपनी सैन्य छावनी स्थापित कर ली थी । उन्होने समस्त राजपूत शक्तियों को एकजुट किया । कुछ को वैवाहिक संबंधों से भी जोड़ा। उन्होने स्वयं भी एक से अधिक विवाह किये और अपने परिवार की बेटियों को र्यसेन, कालिंजर और चंदेरी के शासकों को ब्याहीं। इससे राजपूताने में एकजुटता आई और परस्पर संघर्ष कम हुये । और सबने मिलकर एकजुटता से आक्रमणकारियों का सामना किया । राणाजी ने एक युद्ध तो ऐसा जीता जिसमें गुजरात, दिल्ली और मालवा के सुल्तानों ने एक संयुक्त मोर्चा बना कर तीन तरफ से चित्तौड पर धावा बोला था पर राणा सांगाजी ने अपनी वीरता से तीनों को पराजित किया । उन्होने अपने विजित क्षेत्रों से जजिया कर हटा दिया था । उस समय दिल्ली की गद्दी पर इब्राहिम लोदी का शासन था । महाराणा जी ने सिकंदर लोदी के समय ही दिल्ली के कई क्षेत्रों अधिकार कर लिया था । आगरा क्षेत्र सल्तनत से छीनकर अपना ध्वज फहरा दिया था । इसका बदला लेने सिकंदर लोदी के उत्तराधिकारी इब्राहिम लोदी ने 1517 में मेवाड़ पर धावा बोला । यह युद्ध कोटा क्षेत्र के खातोली नामक स्थान पर हुआ जिसमें महाराणा सांगा की विजय हुई। खातोली की पराजय का बदला लेने के लिए इब्राहीम लोदी ने 1518 में फिर एक बड़ी सेना भेजी । और पुनः पराजित होकर भागा । लोदी ने मालवा के शासक सुल्तान मोहम्मद को आक्रमण के लिये उकसाया । राणा जी ने माण्डु के शासक सुलतान को बन्दी बना लिया था परंतु उसने दया की याचना की, आधीनता स्वीकार की तो राणा जी ने उन्होंने उदारता दिखाते हुए उसे मुक्त कर दिया और उसका राज्य लौटा दिया था। पर कुछ शर्तों के साथ ।
इसी बीच दिल्ली में एक बड़ा घटनाक्रम हुआ । मुगल हमलावर बाबर ने दिल्ली पर धावा बोला । इब्राहीम लोदी मारा गया और बाबर ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया । बाबर इब्राहीम के सभी परिजनों को मार डालना चाहता था । किन्तु इब्राहीम लोदी का पुत्र मेहमूद लोदी और अन्य बचे हुये परिजनों ने भाग कर राणा जी से शरण माँगी। उदारमन राणा जी ने शरण दे दी । बाबर ने राणा जी के पास दो संदेश भेजे। एक इब्राहीम लोदी के परिजनों को सौंपने और दूसरा दोस्ती करने का । राणा जी ने अमान्य कर दिया । तब चित्तौड की सीमा आगरा तक लगती थी । अंततः बाबर से आक्रमण कर दिया । यह युद्ध 1527 में खानवा के मैदान में युद्ध हुआ । जब किसी प्रकार बाबर को सफलता न मिली तो उसने राणाजी की सेना में इब्राहीम लोदी के पुत्र मेहमूद लोदी को इस्लाम का वास्ता दिया और दिल्ली लौटाने का लालच। एन वक्त पर मेहमूद ने पाला बदल लिया । इधर बयाना का शासक हसन खाँ मेवाती भी बाबर से मिल गया और माँडू के सुल्तान ने भी राणा जी के साथ विश्वासघात किया और राणा जी घायल हो गये । उन्हे अचेत अवस्था में सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया । होश आने पर उन्होंने फिर से लड़ने की ठानी और सेना एकत्रीकरण का अभियान छेड़ दिया । लेकिन वे अपने अभियान में सफल होते कि किसी विश्वासघाती ने विष दे दिया और 30 जनवरी 1528 में कालपी में उनके जीवन का समापन हो गया। उनके बाद चित्तौड की गद्दी उनके पुत्र रतन सिंह द्वितीय ने संभाली।
राणा जी का अन्तिम संस्कार माण्डलगढ भीलवाड़ा में हुआ । माण्डलगढ़ के लोक जीवन में एक कथा प्रचलित है । कहा जाता है कि मांडलगढ़ में राणा जी घोड़े पर सवार होकर मुगल सेना पर टूट पड़े। लेकिन युद्ध में महाराणा का सिर अलग हो गया तो सिर अलग होने के बाद घोड़े पर सवार उनका धड़ लड़ता हुआ चावण्डिया तालाब तक पहुँचा और वहाँ वीरगति को प्राप्त हुआ। राणाजी एक कुशल यौद्धा और आदर्श शासक थे । उनके शासनकाल मे मेवाड़ ने समृद्धि की नई ऊँचाई को छुआ । वे अपने समय के एक महान विजेता और “हिन्दूपति” के नाम से विख्यात हुये । वे भारत से विदेशी शासकों को पराजित कर हिन्दू-साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे । इसलिये सभी विदेशी शासक परस्पर मतभेद भुलाकर एक जुट हो गये थे । जब वे बल से न जीत सके तो छल पर उतर आये । राणाजी की सेना में विश्वासघाती तलाशे। और राणा जी मैदानी मुकाबले में नहीं बल्कि पीठ पर किये गये वार से हार गये । बाबरनामा में राणाजी को दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य के कृष्णदेवराय के साथ सबसे बड़ा काफिर राजा बताया है । ऐसे महान वीर के जीवन का समापन तीस जनवरी को समापन हो गया । इतिहास में राणाजी का जितना कम वर्णन है उतना ही अधिक वे लोक जीवन में सम्मानित हैं।
लेखक - रमेश शर्मा
नई दिल्ली, 29 जनवरी। देश के 76वें गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी को कर्तव्य पथ पर निकली परेड में शामिल उत्तर प्रदेश की झांकी को पहला पुरस्कार मिला है। उत्तर प्रदेश की झांकी में प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ की भव्यता को दर्शाया गया, जो 'विरासत और विकास' के संदेश को पूरी दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास था। तीनों सेनाओं और अर्धसैनिक बलों की मार्चिंग टुकड़ियों में जम्मू और कश्मीर राइफल्स दल को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया है।
गणतंत्र दिवस परेड में शामिल सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्तों और झांकियों के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। तीनों सेनाओं, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ), अन्य सहायक बलों के मार्चिंग दस्तों, विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) और केंद्र सरकार के मंत्रालयों तथा विभागों की झांकियों के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए जजों के तीन पैनल गठित किए गए थे। पैनल ने राज्य सरकारों की झांकियों में उत्तर प्रदेश को अव्वल घोषित किया है। स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास थीम पर आधारित इस झांकी ने महाकुंभ की भव्यता दर्शाते हुए सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अनूठा संगम पेश किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियों में त्रिपुरा की झांकी ने दूसरा स्थान हासिल किया। त्रिपुरा की झांकी का विषय 'शाश्वत श्रद्धा' था, जिसमें 14 देवताओं की पूजा को दर्शाया गया था। आंध्र प्रदेश की झांकी को तीसरा पुरस्कार मिला है। इस झांकी में पर्यावरण अनुकूल लकड़ी के खिलौनों को प्रदर्शित किया गया था। सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग टुकड़ी का पुरस्कार जम्मू और कश्मीर राइफल्स दल को दिया गया है। सीएपीएफ और अन्य सहायक बलों में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्ता दिल्ली पुलिस का रहा। केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में जनजातीय कार्य मंत्रालय की झांकी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया है, जिसमें जनजातीय गौरव वर्ष को दर्शाया गया था।
पैनल ने केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की झांकी को विशेष पुरस्कार से नवाजा है, जिसमें पुष्पों के माध्यम से भारत के संविधान के 75 वर्ष का जश्न मनाते हुए सजाया गया था। इसी तरह 'जयति जय ममः भारतम्' डांस ग्रुप को भी विशेष पुरस्कार मिला है। इस वर्ष ‘जयति जय ममः भारतम्’ शीर्षक के तहत 5 हजार कलाकारों ने 11 मिनट के सांस्कृतिक प्रदर्शन में देश के विभिन्न भागों से 45 से अधिक नृत्य शैलियों का प्रदर्शन किया था। केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में सर्वश्रेष्ठ झांकी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रही, जिसमें मंत्रालय की व्यापक योजनाओं के अंतर्गत पोषित महिलाओं और बच्चों की बहुमुखी यात्रा को दिखाया गया था।
रक्षा मंत्रालय ने 26 से 28 जनवरी तक 'माई गर्वमेंट पोर्टल' पर नागरिकों से उनकी पसंदीदा झांकी और मार्चिंग टुकड़ियों को 'लोकप्रिय पसंद श्रेणी' के रूप में वोट देने के लिए एक ऑनलाइन पोल आयोजित किया गया था। इसके अनुसार सर्वश्रेष्ठ सिग्नल मार्चिंग टुकड़ी, सीएपीएफ और अन्य सहायक बलों में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्ता सीआरपीएफ का रहा। राज्यों की झांकी में गुजरात को पहले, उत्तर प्रदेश को दूसरे और उत्तराखंड की झांकी को तीसरे नंबर पर ऑनलाइन चयनित किया गया है।
महाकुम्भ का दूसरा अमृत स्नान आज है। मौनी अमावस्या के दिन किया जाने वाला यह स्नान धार्मिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा जाता है, ऐसे में महाकुम्भ के दूसरे अमृत स्नान के दिन डुबकी लगाने से भक्तों को कई शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। स्नान के बाद दान-पुण्य और मौन व्रत रखना भी आज के दिन धार्मिक दृष्टि से कल्याणकारी है। हिंदू पंचांग के अनुसार अमृत स्नान के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 25 मिनट से लेकर 6 बजकर 18 मिनट तक है। गौरतलब है कि, कड़ी सुरक्षा के बीच बड़ी संख्या में भक्त त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने पहुंच रहे हैं।
महाकुंभ के दूसरे अमृत स्नान पर बने हैं ये शुभ योग
पण्डित अवधेश मिश्र शास्त्री ने बताया कि, महाकुम्भ के दिन दूसरे अमृत स्नान के दिन त्रिग्रही योग बना है। इस दिन सूर्य-बुध और चंद्रमा मकर राशि में एक साथ विराजमान हैं। इसके साथ ही शिववास योग भी दूसरे अमृत स्नान के दिन बना हुआ है। इन शुभ योगों में स्नान-दान करने से महा पुण्य की प्राप्ति होगी।
मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के दिन क्या करना शुभ
ज्योतिषाचार्य राकेश त्रिपाठी ने बताया कि, आप चाहें प्रयागराज में त्रिवेणी घाट में डुबकी लगाएं चाहे घर पर ही व्रत और पूजन करें, कुछ कार्य आपके लिए बेहद शुभ फलदायी इस दिन हो सकते हैं। इस दिन आपको सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। पितरों को स्मरण करते हुए ’ॐ पितृ देवतायै नमः’ मंत्र का जप करना चाहिए। तुलसी के पास दीपदान करने के साथ ही इस दिन कुछ समय के लिए मौन रहना चाहिए। इन कार्यों को करने से शुभ फल आपको प्राप्त होगा।
उन्होंने बताया कि, मौनी अमावस्या के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, तिल और चावल का दान करें। मान्यता है कि ऐसा करने से पितर खुश होते हैं। इस दिन गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। अगर यह संभव न हो, तो घर पर ही गंगाजल में पानी डालकर स्नान कर लें। इस दिन गाय, कुत्ते और कौवे को भोजन खिलाना शुभ माना जाता है। यह पितरों को प्रसन्न करता है।
मकर संक्रांति से अब तक 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालु लगा चुके हैं डुबकी
महाकुंभ की शुरुआत 13 जनवरी के दिन पूर्णिमा के स्नान से हुई थी। तब से अब तक प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी घाट में 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालु डुबकी लगा चुके हैं।
महाकुम्भ नगर | महाकुम्भ का दूसरा अमृत स्नान मौनी अमावस्या के दिन 29 जनवरी को है। इस दिन आसमान से दूसरी बार अमृत टपकेगा। इस दिन 14 जनवरी को हुए पहले अमृत स्नान से भी अधिक लोगों के पहुंचने की पूरी संभावना है। मौनी अमावस्या के दिन किए जाने वाले अमृत स्नान से न केवल आपको शुभ फल मिलते हैं, बल्कि आपके पितरों की आत्मा भी तृप्त होती है। प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक ये चार प्रमुख स्थान हैं, जहां कुम्भ का आयोजन किया जाता है। गौरतलब है कि मौनी अमावस्या को लगभग 10 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाएंगे। मौनी अमावस्या से एक दिन पहले मंगलवार को तीन करोड़ से अधिक लोगों ने संगम में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
कुम्भ मेले का विशेष महत्वसनातन धर्म में कुंभ मेले का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व सनातन संस्कृति की महानता को तो दर्शाता ही है। वहीं करोड़ों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। मान्यता है कि करोड़ों वर्ष पूर्व देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जो अमृत कुंभ निकला था। उसकी अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गई थीं। उन सभी स्थानों पर हर 12 वर्ष में कुंभ मेले का आयोजन होता है।
महाकुम्भ का अमृत कुम्भ से संबंधपुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कुंभ लेकर आए थे, तब देवताओं और दानवों के बीच अमृत प्राप्ति को लेकर संघर्ष छिड़ गया। भगवान विष्णु ने इस संघर्ष को रोकने और अमृत को सुरक्षित रखने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया। उन्होंने अमृत कलश को सुरक्षित रखने के लिए इंद्रदेव के पुत्र जयंत को सौंपा। जयंत अमृत कुम्भ को लेकर आकाश मार्ग से चले, लेकिन दानवों ने उनका पीछा किया। इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गईं। ये बूंदें प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर, हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में क्षिप्रा नदी में और नासिक में गोदावरी नदी में गिरीं। इन्हीं स्थानों पर कुम्भ मेले की परंपरा शुरू हुई।
12 साल में कुम्भ मेला, 6 साल में अर्धकुम्भविश्व का सबसे बड़ा मेला हर 12 साल में आयोजित होता है, जबकि हर 6 साल में अर्धकुम्भ का आयोजन किया जाता है। कुम्भ पर्व का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मेले में संत-महात्मा, ऋषि-मुनि, आस्थावान श्रद्धालु और पर्यटक बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
कुम्भ स्नान का महत्वहिंदू धर्मग्रंथों में कुंभ स्नान का महत्व विस्तार से वर्णित है। मान्यता है कि कुम्भ में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, कुम्भ मेला आध्यात्मिक ज्ञान, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। यहां कई आध्यात्मिक और धार्मिक सभाएं आयोजित होती हैं, जिनमें साधु-संतों के प्रवचन, योग साधना और विभिन्न अनुष्ठान शामिल होते हैं।
संगम तट पर कुम्भ मेलाप्रयागराज का कुम्भ मेला विशेष रूप से संगम तट पर आयोजित होता है, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम होता है। संगम का यह स्थान हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। कुम्भ मेले के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु एकत्रित होकर पवित्र स्नान करते हैं और ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
