राजमाता कर्मवती का उपनाम कर्णवती था | वे मेवाड़ की राजमाता थीं | 30 जनवरी 1528 को कर्मवती के पति का स्वर्गवास हुआ | राज्य का भार राजमाता कर्मवती के कन्धों पर आ गया | इसका कारण यह भी था कि उनके दोनों पुत्र, विक्रमजीत और रत्न सिंह अभी अयोग्य थे | उनमें राज्य चलाने की सूझ-बूझ अभी नहीं थी |
दोनों में ईर्ष्या और स्वार्थ अधिक था | बड़े होने पर दोनों ही राज्य का बंटवारा चाहते थे | राजमाता कर्मवती यह नहीं चाहती थीं | राज्य को हथियाने के लिए दोनों भाईयों में कलह शुरू हो गई | कलह युद्ध में बदल गई और इस स्वार्थ युद्ध में राजकुमार रत्न सिंह मारा गया | राजकुमार विक्रमजीत को राज सिंहासन प्राप्त हुआ |
राजमाता विक्रमजीत से संतुष्ट नहीं थीं | विक्रमजीत राज्य नहीं चला पाया | राज्य में झगड़े बहुत बढ़ गये | सेना के जवानों में भी स्वार्थ आ गया | राज कर्मचारी स्वार्थ में डूब गए | हर कोई अपना लाभ चाहता था| किसी को अपने राज्य की चिंता नहीं थी | मेवाड़ को तितर-बितर होते देख राजमाता की आँखों में आंसू आ जाते थे |
मेवाड़ पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा | घर की लड़ाई तो अभी समाप्त नहीं हुई, बाहर की लड़ाई शुरू हो गई | गुजरात के बादशाह बहादुर ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया | राजमाता चिंतित रहने लगीं | जिस मेवाड़ ने आज तक हार नहीं मानी अब उसकी हार निश्चित दिखाई दे रही थी |आपसी झगड़ों के कारण सेना में पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाई देता था | मेवाड़ की तलवार को स्वार्थ का जंग खा गया था | गुजरात की सेना के साथ युद्ध में प्रतिदिन हार का समाचार राजमाता को मिलता | किले तक पहुंचने में गुजराती सेना को अब अधिक दिन नहीं लगेंगे | राजमाता को संकट के समय कौन सहयोग देगा | राजमाता का आंचल आंसुओं से भीग गया था | उसके धागे निकलने लगे थे | उसने अपने आंचल से एक धागा खींचा | यह धागा आंसुओं में भीगा था | अपने हरकारे को बुलाकर आँखों में आसूं भरकर राजमाता ने कहा- “हरकारे, इस धागे को हिफाजत के साथ दिल्ली के बादशाह हुमायूं के पास ले जाओ | मेरे इस पत्र के साथ धागे को हुमायूं के हाथ में दे देना |”
हरकारा दिल्ली पहुंचा | हुमायूं राजपूतों की बहादुरी से बहुत खुश था | उसने कच्चे धागे को सम्मान दिया | उसे राजमाता कर्मवती द्वारा लिखा गया पत्र सुनाया गया | इस पत्र का प्रारंभ ही ‘भैया’ शब्द से किया गया था |
‘प्यारे भैया,
अपने आंसुओं से भीगे आंचल का कच्चा धागा मैं तुम्हें भेज रही हूं | यह धागा कच्चा है, परन्तु बहन के आंसुओं ने इसे पवित्र बना दिया है | यह धागा बहन का प्रेम है | इसे अपनी कलाई पर बांधकर बहन के प्यार को तुन्हें अमल करना है | जिस आंचल का यह धागा है | वह आंचल तुम्हारे सामने फैला है | इस आंचल में तुम्हें मेरी रक्षा का वचन डालना है|
आज मैं गुजराती सेना से चारों ओर से घिरी हुई हूं | आज भाई को अपनी बहन की रक्षा करके इस वचन को पूरा करना है | भैया, इस आंसुओं से भीगे आंचल की लाज अब मैं तुम्हारे हाथों में सौंप रही हूं |
तुम्हारी बहन
कर्मवती
बादशाह हुमायूं की आंखें आंसुओं से डबडबा गईं | उसने धागे को अपनी कलाई पर बंधवाया |
उसने सेनापति को हुक्म दिया – “सेनापति, सेना तैयार करो | इसी वक्त मेवाड़ के लिए कूच करना है | हर सिपाही की कलाई पर बहन की रक्षा का धागा बंधा होगा |”
हुमायूं की सेनाएं मेवाड़ पहुंचीं | बहन की रक्षा के लिए उठीं तलवारों ने गुजराती सेना के छक्के छुड़ा दिए | गुजराती सिपाहियों को गाजर-मूली की तरह काट दिया गया | हुमायूं की जीत हुई | हुमायूं को इस जीत पर गर्व था | इस जीत में भाई-बहन का प्यार छिपा था | जीत के बाद हुमायूं ने मेवाड़ के किले में प्रवेश किया |
दुर्भाग्य! हुमायूं को बहन कर्मवती नहीं मिली | वे राजपूतानियों के साथ जौहर कर चूकी थीं |
हुमायूं को अफसोस हुआ| वह देर से पहुंचा | हुमायूं को आफसोस हुआ | वह देर से पहुंचा | हुमायूं ने बहन कर्मवती की राख को उसी हाथ से उठाकर मस्तक पर लगाया, जिस हाथ में वह पवित्र धागा बंधा हुआ था |
