प्रकाश प्रर्व के रूप में, गुरु गोबिंद सिंह की 357वां जयंती 17 जनवरी को मनाया जा रहा है | वह सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर के पुत्र थे, इनका जन्म पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को पटना के साहिब (बिहार) में हुआ था| इनकी माता का नाम गुजरी देवी था | पटना के जिस घर में गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था उसी जगह पर आज ‘तखत श्री पटना साहिब’ स्थित है |
खालसा पंथ की स्थापना करने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी अपने ज्ञान और सैन्य ताकत की वजह से काफी प्रसिद्ध थे| ऐसा कहा जाता है कि गुरु गोबिंद सिंह को संस्कृत, फारसी, पंजाबी और अरबी भाषाओं का भी ज्ञान था | धनुष-बाण, तलवार, भाला चलाने में उन्हें महारथ हासिल थी |
गुरु गोबिंद सिंह विद्वानों के संरक्षक थे. इसलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था | उनके दरबार में हमेशा 52 कवियों और लेखकों की उपस्थिति रहती थी. गुरु गोबिंद सिंह स्वयं भी एक लेखक थे, अपने जीवन काल में उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की थी| इनमें चंडी दी वार, जाप साहिब, खालसा महिमा, अकाल उस्तत, बचित्र नाटक और जफरनामा जैसे ग्रंथ शामिल हैं |
गोबिंद सिंह की जयंती पर उनके जीवन से कुछ जुडी प्रेरक प्रसंग के बारे में जानेंगे|
कहा जाता है कि जब तेग बहादुर असम की यात्रा में गए थे| उससे पहले ही होने वाले बच्चे का नाम गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया था | जिसके कारण उन्हें बचपन में गोबिंद राय कहा जाता था | गुरु गोबिंद बचपन से ही अपनी उम्र के बच्चों से बिल्कुल अगल थे | जब उनके साथी खिलौने से खेलते थे तो गुरु गोबिंद सिंह तलवार, कटार, धनुष से खेलते थे|
गुरु गोबिंद सिंह जी जन्मजात योद्धा थे, लेकिन वो कभी भी अपनी सत्ता को बढ़ाने या किसी राज्य पर काबिज होने के लिए नहीं लड़े| उन्हें राजाओं के अन्याय से घोर चिढ थी | आज जनता या वर्ग विशेष पर अत्याचार होते देख वो किसी से भी राजा से लोहा लेने के तैयार हो जाते थे, चाहे वो शासक मुगल हो या हिन्दू| यही वजह रही कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब के अलावा,
गढ़वाल नरेश और शिवालिक क्ष्रेत्र के कई राजाओं के साथ अनेक युद्ध लड़े | गुरु गोबिंद सिंह जी की वीरता को यूँ बयाँ करती हैं ये पंक्तियाँ ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ‘ |
