हिन्दू धर्म में वैसे तो हर महीने के एकादशी तिथि का महत्व होता है लेकिन भगवान विष्णु को समर्पित सावन मास की एकादशी तिथि का विशेष महत्व है| मान्यता है कि एकादशी तिथि का व्रत करने पर सभी प्रकार के पापो से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है| हिन्दू पंचांग के अनुसार साल में दो बार पुत्रदा एकादशी मनाई जाती है | पहला पौष माह और दूसरा सावन के माह में। सावन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है|
कथा
द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था| उनका मानना था, कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं | पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है| न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है और किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा, कभी किसी से घृणा नहीं की, सबको समान माना है| सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ| इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य रहते हुए भी मेरे पुत्र नहीं है| सो मैं अत्यंत दुख पा रहा हूं, इसका क्या कारण है?
राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए| एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था|
सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया| उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूंगा | मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो | लोम ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले हे महर्षि! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक सामर्थ्य हैं | अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए| महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है| फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है| उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं| अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं| अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बताइये|
लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया| इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया| उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उनको एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई |
पुत्रदा एकादशी महत्व
संतान प्राप्ति हेतु इस एकादशी का विशेष महत्व है | जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती है अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की कामना करते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत बहुत ही शुभ और लाभकारी होता है|
पूजा विधि
इस दिन सुबह उठकर स्वच्छ जल से स्नान करें| फिर धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह सामग्री से भगवान विष्णु की पूजा करें| भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें | इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें | अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें | और भगवान को भोग लगाकर अपनी पूजाविधि सम्पन्न करें |
