वियतनाम (चंपा) भारतवर्ष से गए 'चाम' जाती के लोगों द्वारा बसाया गया देश है। उस देश पर सन 192 में 'श्रीमान' नामक हिंदू राजा का राज्य था। इसके बाद वहां अनेकों हिंदू राजाओं ने राज्य किया एवं हिंदू धर्म की स्थापना की। चंपा राज्य की सभ्यता के आदि संस्थापक 'चाम' वर्ग के लोग अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। दक्षिणी वियतनाम में अभी भी उनकी संख्या 5000 से ऊपर है। उनकी सभ्यता अभी भी हिंदू धर्म के अनुरूप है। किसी समय इन्हीं के पूर्वजों का समस्त वियतनाम पर अधिकार था। सन 192 के अभिलेखों में इनके शौर्य, साहस और वर्चस्व का विवरण भली प्रकार उपलब्ध है। 'चंपा' का नामकरण 'चंपक' जिन्हें अब 'चाम' कहते हैं, के वर्चस्व को ध्यान में रखकर किया गया था। आदिवासियों को किरात कहा जाता था । पर जो कुछ प्रमाण सूत्र मिले हैं, उनसे प्रतीत होता है कि वह आर्यवंशी लोग थे और भारतीय धर्म- मान्यताओं का अनुकरण करते थे। इसके बाद वहां ' बर्मन' उपाधि धारी राजा राज करते चले आए। उनके शासनकाल में ' माईसन ' और ' डांगडुंग ' के भव्य मंदिर बने । जिनमे प्रधानतया 'शिव' के साथ अन्य देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित थी।
यद्यपि हिंदू त्रिदेवों ब्रह्मा ,विष्णु एवं महेश की ही विशेष रूप से पूजा की जाती थी। फिर भी छोटे देवी- देवताओं जैसे इंद्र, यम, चंद्र ,सूर्य ,कुबेर एवं सरस्वती की पूजा भी की जाती थी। चंपा में गणेश ,कार्तिकेय की पूजा भी होती थी। बड़ी मात्रा में गणेश की मूर्तियां विद्यमान है। चंपा में शिव, विष्णु आदि की मूर्तियों के बावजूद निराकार परमात्मा की भी धारणा विद्यमान थी। जिसका उल्लेख एक शिलालेख में मिलता है। चंपा में यज्ञ के करने का विशेष जोर दिया जाता था। यज्ञ की महिमा की प्रशंसा बार-बार की गई थी।"
इतिहास विद डॉ अखिलेश चंद शर्मा अपने ग्रंथ- " विश्व सभ्यताओं का जनक: भारत" में चंपा के बारे में लिखते हैं कि- " चंपा राज्य में राजाओं के नाम भारतीय परंपरा के अनुसार ही रहे हैं ,जैसे गंगाराम ,रुद्रवर्मा, शंभू वर्मा, प्रसस्त धर्म,कंदर्प धर्मा, प्रकाश धर्म ,विक्रांत वर्मा ,पृथ्वीन्द्र वर्मा, इंद्र वर्मा ,भद्र वर्मा आदि।
डॉ. आर. सी. मजूमदार अपने ग्रंथ- " एसिएंट इंडियन कॉलोनीज इन द फॉर
ईस्ट" चंपा, Vol-1में उल्लेख करते हैं कि- " 1927 में चंपा राज्य में विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार के 130 अभिलेख पाए गए हैं । सभी अभिलेख संस्कृत भाषा में है और सभी अभिलेख ' ओम ' शब्द के साथ आरंभ होते हैं। विदित हो की ईश्वर का निज और मुख्य नाम' ओम ' है। "
इतिहास विद डॉ. प्रभु दयाल अग्निहोत्री अपने लेख - "दक्षिण -पूर्व एशिया में जीवंत है भारतीय संस्कृति" में लिखते हैं कि - " गत 15- 16 शताब्दियों के बीच श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो , चंपा, मलय, ब्रह्मदेश,तिब्बत ,मंगोलिया, चीन अर्थात लगभग सारा दक्षिण- पूर्वी ही नहीं, प्रत्युत एशिया का उत्तर- पूर्वी भाग भी कभी ना कभी और किसी न किसी रूप में भारत से प्रभावित रहा है। संस्कृति के क्षेत्र में संसार के प्राय: सभी देशों पर भारत का ऋण है। दक्षिण पूर्व एशिया तो ऐसा लगता है जैसे भारत का ही एक भाग हो। भारतीय संस्कृति के इस व्यापक प्रभाव को देखकर अनेक विद्वान इन सब द्वीपों को वृह्त्तर भारत की संज्ञा देते हैं। उनके नाम ' चंपा' (वियतनाम ) भारतीय मूल के ही हैं।
उक्त सभी तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि चंपा भारत का ही एक भाग रहा है। अथवा एक छोटा भारत ही है ।
किंतु आश्चर्य तब होता है कि भारत का इतना गौरवशाली अतीत और स्वर्णिम विस्तार इतिहास में हुआ था, तब विगत 75 वर्षों से पाठ्यक्रम में यह सब क्यों नहीं पढ़ाया गया ? बडे आश्चर्य व चिंतन का बिषय है।
लेखक - डॉ. नितिन सहारिया