श्लोकेन वा तदर्द्धेंन तदर्ध्दार्ध्दाक्षरेण वा |
अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययनकर्मभि ||
यहां आचार्य स्वाध्याय की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कह रहे हैं कि व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी एक श्लोक का या आधे या उसके भी आधे अथवा एक अक्षर का ही सही मनन करे | मनन, अध्ययन, दान आदि कार्य करते हुए दिन को सार्थक करना चाहिए |
अभिप्राय यह है कि कम-से-कम जितना भी हो सकें, मनुष्य को अपने कल्याण के लिए मनन अवश्य करना चाहिए | मनन करना, अध्ययन करना तथा लोगों की सहायता करना ये मनुष्य-जीवन के अनिवार्य कर्तव्य हैं | येसा करने से ही जीवन सार्थक होता है | क्योंकि मानव जीवन अमूल्य हैं| उसका एक-एक दिन, एक-एक क्षण अमूल्य है, उसे सफल बनाने के लिए स्वाध्याय, चिंतन-मनन एवं दान आदि सत्कर्म करते रहना चाहिए | यह जीवन का नियम ही बना लिया जाए तो सर्वोत्तम है|
