चाणक्य नीति:- पुत्र के प्रति कर्तव्य | The Voice TV

Quote :

"जिस व्यक्ति ने कभी कोई गलती नहीं की, उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की।" — अल्बर्ट आइंस्टीन

Editor's Choice

चाणक्य नीति:- पुत्र के प्रति कर्तव्य

Date : 14-Feb-2024

 

 पुनश्च विविधै: शीलैनिर्योज्य सततं बुधै: |
नीतिज्ञा शीलसम्प सम्पन्ना: भवन्ति कुलपूजिता: || 

आचार्य चाणक्य यहां पुत्र के संबंध में उपदेश करते हुए कहते हैं कि बुद्धिमान लोगों का कर्तव्य है कि पुत्र को सदा अनेक प्रकार से सदाचार की शिक्षा दें | नीतिज्ञ सदाचारी पुत्र ही कुल में पूजे जाते हैं | अर्थात् पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि पुत्र को अच्छी शिक्षा दे | शिक्षा  केवल विद्यालय में ही नहीं होती | अच्छे आचरण की, व्यवहार की शिक्षा देना पिता का पावन कर्तव्य है | अच्छे आचरणवाले पुत्र ही अपने कुल का नाम ऊंचा करते हैं | नीतिज्ञ और शील सम्पन्न पुत्र ही कुल में सम्मान पाते हैं |
नेतागण कहा करते हैं कि आज के युवा ही कल के नागरिक हैं | वही देश के भविष्य हैं तो उनका सही भविष्य बनाने की दिशा में सही कदम उठाना माता-पिता और समाज का परम कर्तव्य है |

अभिप्राय यह है कि जो हालत हंसों के बीच में आ जाने पर कौए की हो जाती है, ठीक वही दशा पढ़े-लिखे, सुशिक्षित लोगों के बीच में जाने पर अनपढ़ व्यक्ति की हो जाती है | इसलिए बच्चे को न पढ़ानेवाले माँ-बाप ही उसके शत्रु होते हैं | इस संबंध में आचार्य चाणक्य मानते हैं कि धन ही नहीं शिक्षा भी व्यक्ति को आदर योग्य बनाती है और शिक्षा से हीन व्यक्ति बिना पूंछ और सींगवाले पशु के समान है | इस संबंध में आचार्य चाणक्य मानते हैं कि धन ही नहीं शिक्षा भी व्यक्ति को आदर योग्य बनाती है और शिक्षा से हीन व्यक्ति बिना पूंछ और सींगवाले पशु के समान है | 
लालनाद बहवो दोषासताडनाद बहवो गुणा: |
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न टू लालयेत || 

आचार्य चाणक्य बालक के लालन-पालन में, लाड़-प्यार के सन्दर्भ में उसके अनुपात और सार के बारे में उपदेश करते हुए कहते हैं, कि अधिक लाड़ से अनेक दोष तथा ताड़न से गुण आते हैं | इसलिए पुत्र को और शिष्य को लालन की नहीं ताड़न से गुण आते हैं | इसलिए पुत्र को और शिष्य को लालन की नहीं ताड़न की आवश्यकता होती है | 
अभिप्राय यह है कि अधिक लाड़-प्यार करने से बच्चे बिगड़ जाते हैं | उसके साथ सख्ती करने से ही वे सुधरते हैं | इसलिए बच्चों और शिष्य को अधिक लाड़-प्यार नहीं देना चाहिए | उनके साथ सख्ती ही करनी चाहिए |

इसलिए चाणक्य का परामर्श है कि माता-पिता अथवा गुरु को अपने पुत्र अथवा शिष्य का इस बात के लिए ध्यान रखना चाहिए कि उसमें कोई बुरी आदतें घर न कर जायें | उनसे बचाने के लिए उनकी ताड़ना आवश्यकता है, ताकि बच्चा गुणों की ओर आकर्षित हो और दोष ग्रहण से बचे  |

RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement