श्रीलाल शुक्ल ने करीब 50 वर्ष पहले अपने कालजयी उपन्यास “राग दरबारी" में वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि “वर्तमान शिक्षा-पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।” स्वतंत्रता के बाद से आज तक हर सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में बारंबार प्रयोग किये। लेकिन सुधार व एकरूपता के नाम पर धरातल पर कुछ खास दिखता नहीं है। इसका परिणाम है कि हर साल लाखों छात्रों को परीक्षाओं के तनाव से गुजरना पड़ता है। बहुत से छात्र तो वार्षिक परीक्षाओं के तनाव में आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह तो स्थिति विद्यालयों की वार्षिक परीक्षा की है, यदि बात प्रतियोगी परीक्षाओं की जाए तो स्थिति ओर भयावह है।
हर वर्ष की तरह देश के अधिकांश क्षेत्रों में वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो गई है। साथ ही विद्यालय के छात्र छात्राएं भी हर बार की तरह पुरी तैयारी से परीक्षाओं में लगे हैं। लेकिन हर बार देखने में आता है कि बोर्ड परीक्षाओ के लिए छात्राओं में एक भय व तनाव-सा बना रहता है या फिर बहुत से शिक्षकों व अभिभावकों द्वारा बना दिया जाता है। जो कि पुरी तरह से गलत व अनुचित है। इसके कारण प्रतिवर्ष बहुत से बच्चें गलत निर्णय लेते हैं।
वार्षिक परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद कई छात्र इसे आत्मसम्मान व जीवन का अंतिम परिणाम मान लेते हैं, जो कि गलत है। वार्षिक परीक्षाएं सिर्फ़ आगे की पढ़ाई व उच्च शिक्षा के लिए एक सीढ़ी है इससे ज्यादा कुछ नहीं। और आजकल तो उच्च शिक्षा के लिए भी फिर प्रतियोगी परीक्षाएं देना होती है तो फिर वार्षिक परीक्षाओं के लिए इतना तनाव क्यों ? इस विषय पर नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में विशेष ध्यान रखना चाहिए। साथ ही पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम जल्द से जल्द लागू करना चाहिए। देखने में आता है कि बहुत बार तो जीवन में इन परीक्षा परिणामों का ज्यादा महत्व नहीं रहता है। यहां तक की दसवी की अंकसूची तो जन्म तारीख देखने के ही काम आती है बस। यह मेरा निजी अनुभव है कि वार्षिक परीक्षाए सिर्फ़ एक छोटा सा पड़ाव भर है। इन्हें इतने तनाव व मानसिक दबाव में आकर न दे। यह समय आपके सीखने व ज्ञान अर्जित करना का एक पड़ाव भर होता है। ना की मानसिक तनाव में आकर बोर्ड परीक्षाओं के लिए जीवन का सब कुछ दाव पर लगा जाने का। अभिभावकों को इस समय विशेष तौर पर अपने बच्चों का उत्साहवर्धन करते रहना चाहिए व उनके संपूर्ण स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। विद्यालय के बच्चों को इस तरह के तनाव से दूर रखना चाहिए।
इसलिए सभी विद्यालय छात्रों से एक प्यार भरा निवेदन है कि बोर्ड परीक्षाए बगैर किसी तनाव, भय या चिंता के शांति व मस्ती में दे। जीवन की यात्रा आगे तो बहुत लंबी हैं। ओर वैसे भी आपने अब तक जो तैयारी कर ली है वही इन परीक्षाओं में काम में आऐगी, फिर तनाव किस बात का। वही शिक्षकों व अभिभावको को भी समझना चाहिए कि बच्चों पर किसी भी तरह का अनुचित दवाब या तनाव ना बनाए। अक्सर खबरों में देखने को आता है कि विद्यालय की बोर्ड परीक्षाओं के समय बच्चें मानसिक तनाव बहुत ज्यादा ले लेते है। जिसके कारण कई बार गंभीर घटनाएं टीवी व अखबारों के माध्यम से देखने व सुनने को मिलती हैं। इन परीक्षाओं के समय छात्रों को टीवी व इंटरनेट से उचित दूरी बनाकर रखना चाहिए तथा अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस बात की ओर अभिभावकों को भी ध्यान रहना चाहिए।
इस तरह की गलाकाट प्रतियोगिताओं का वातावरण निर्माण करना, हमारे समाज व बच्चों के जीवन के लिए कभी सही नहीं हो सकता है। इन जैसी परीक्षाओं के लिए विद्यालय, शिक्षकों, अभिभावकों व शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को सहज व भयमुक्त वातावरण का निर्माण करना चाहिए और साथ ही एक स्वस्थ प्रतियोगिता व बच्चों के संपूर्ण शैक्षणिक सत्र के तौर पर इन परीक्षाओं का संचालन होना चाहिए। सरकार द्वारा शिक्षा के व्यवसायिकरण को रोककर भी इस समस्या से निपटा जा सकता है। उम्मीद है नई शिक्षा नीति के कारण इस समस्या का समाधान जल्द से जल्द हो।
लेखक - भूपेन्द्र भारतीय
