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13 मार्च 1940 क्रांतिकारी ऊधमसिंह ने लंदन जाकर की थी जनरल डायर की हत्या

Date : 13-Mar-2024

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अधिकाँश क्राँतिकारियों का बलिदान सत्ता प्राप्ति के लिये नहीं अपितु इस राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया । क्राँतिकारी ऊधमसिंह वे संकल्पवान बलिदानी हैं जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लंदन जाकर लिया और जनरल डायर को लंदन में गोली मारी । यह घटना 13 मार्च 1940 की है ।

हालाँकि कुछ अंग्रेज इतिहासकार दावा करते हैं कि क्राँतिकारी ऊधमसिंह द्वारा मारा गया डायर कोई और था । यह डायर वह नहीं था जो जलियांवाला नरसंहार के लिये दोषी था । पर यह दावा हास्यास्पद है । चूँकि क्राँतिकारी ऊधम सिंह ने छै साल तक उसका लगातार पीछा किया था । अतएव क्राँतिकारी ऊधमसिंह का निशाना सही डायर पर था । अंग्रेजों ने जिस प्रकार भारतीय गौरव इतिहास में अनेक झूठ रचे वैसे ही यह कूटरचित वाक्य प्रचारित किये कि गलत डायर को मारा । 
अभी वे अपने जीवन और भविष्य के बारे में विचार कर ही रहे थे कि जलियाँ वाला बाग कांड हो गया । यह घटना 13 अप्रैल 1919 की थी । उस दिन जलियावाला बाग़ में बैशाखी पर्व का आयोजन था एक विशाल सभा का आयोजन किया था । जलियावाला बाग़ में परिवार सहित हजारों लोग जमा थे स्त्री बच्चे बूढ़े युवा सभी । समय उधम सिंह उस सभा मे थे । अचानक अंग्रेजी फौज आ धमकी निहत्थे  लोगों पर  गोलियाँ चला दीं । सैकड़ों बेगुनाह लोगों के प्राण गये । मरने वालों में दुधमुँये बच्चे भी थे । इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था । ऊधमसिंह ने इस घटना का बदला लेने की ठान ली' । जनरल माइकल ओडायर उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था । उसी के आदेश पर यह गोली चालन हुआ था ।
जेल से छुटने के बाद इसके बाद वे सुनाम आये फिर अमृतसर में उधम सिंह ने एक दुकान खोलकर पेंटर का काम करने लगे । अवसर मिलते ही वे पहले अफ्रीका गये फिर  नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका होते हुये सन् 1934 में लंदन पहुंचे । वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने एक पिस्टल और छह गोलियाँ खरीदीं और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे । उन्हें यह अवसर  21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में मिला ।  जहां डायर भी एक वक्ता था। उधम सिंह बैठक स्थल पर पहुंचे, रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी पुस्तक में छिपा रखा था । अवसर मिलते ही उन्होंने गोलियाँ डायर के सीने में उतार दी वह वहीं ढेर हो गया । क्राँतिकारी ऊधमसिंह ने भागने की कोशिश नहीं की । वे दीवार के सहारे खड़े हो गये । गिरफ्तार हुये और  31 जुलाई 1940 को उन्हें फाँसी दी गयी ।
 
लेखक - रमेश शर्मा 
 
 

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