सीएए पर कृपया चुप रहो यूएन और अमेरिका
Date : 15-Mar-2024
हजारों-लाखों लोगों का वह अह्लादित कर देनेवाला रुदन, जो वर्षों से अनवरत न्याय के लिए चित्कार रहा था। पूछ रहा था कि हमें किस लिए सजा दी गई है? देश का विभाजन तुमने किया, इसमें हमारा क्या दोष था? कहना होगा कि उन सभी की ह्दय वेदना को कई दशक बीत जाने के बाद अब जाकर न्याय मिला है। भारत में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लागू किया जाना जैसे उनकी वर्षों की तपस्या का परिणाम है। हालांकि इस कानून के लागू होने से यह तो पहले से तय था कि देश में कुछ विरोध के स्वर जरूर उठेंगे, किंतु विदेशों में भी इसके विरोध की होड़ लगेगी, इसका इतना अंदाजा किसी को नहीं था! कम से कम यूएन और अमेरिका से तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी।
सांस्कृतिक, राजनीतिक और भौगोलिक रूप से भी कभी जो भारत (पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश) एक रहा। उस भारत के विभाजन के परिणाम स्वरूप अन्य इस्लामिक गणराज्यों में पिछले सात दशकों में उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार किया गया और अब भी किया जा रहा है, यह उनमें से भारत में शरण लेने आए, पूर्व से रह रहे उन लाखों शरणार्थियों के लिए है, जिनके साथ उनके हिन्दू, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी, सिख होने के कारण से अत्याचार किए जा रहे थे। वस्तुत: इस मुद्दे पर यूएन को भारत का विरोध करने के पूर्व यह जरूर बताना चाहिए था कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बाद में बने बांग्लादेश में इस्लामिक सत्ता में कौन अल्पसंख्यक सुखी हैं ? क्या आज यूएन को इन तीनों देशों में हो रहे अत्याचार दिखाई नहीं देते ?
लेखक - डॉ. मयंक चतुर्वेदी