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"यूरोप में रहकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम की मशाल जलाने वाले बेमिसाल योद्धा थे" - श्याम जी कृष्ण वर्मा

Date : 30-Mar-2024

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास लेखन का यही दुखद पहलू रहा है कि उसमें वामपंथी और तथाकथित सेकुलर इतिहासकारों ने भारत के क्रांतिकारियों के योगदान को धूमिल करके रख दिया, फिर तो विदेशों में हो रहे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रांतिकारियों के प्रयासों की अनदेखी करना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। भारत के बहुत से महान क्रांतिकारी विदेश में संघर्षरत थे,इंडिया हाउस और गदर पार्टी के बारे में तो थोड़ा बहुत पता है परंतु यूरोप और अमेरिका में अभी भी बहुत कुछ शोध सामग्री है जिसका उपयोग नहीं किया गया है। इसलिए श्याम जी कृष्ण वर्मा जी जैंसे अन्य क्रांतिवीरों पर भी विस्तृत शोध अपेक्षित है। 

श्याम जी कृष्ण वर्मा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान और उच्च कोटि के पत्रकार थे। वे भारत के प्रथम व्यक्ति थे, जिन्हें आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से एम. ए. और बार-एट-ला की उपाधियाँ प्राप्त हुईं थीं। इंग्लैंड में सन् 1905 में "इंडिया हाऊस" की स्थापना की, जो भारतीय क्रांतिकारियों के लिए वरदान साबित हुआ। यद्यपि इंडिया हाऊस भारतीय विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए खोला गया था परंतु मूलतः क्रान्तिकारियों के लिए था - सर्वश्री लाला हरदयाल, विनायक दामोदर सावरकर जी, मदनलाल धींगरा सहित अन्य महान् क्रांतिकारियों ने यहीं से सारी योजनाएं संचालित कीं। महान् वीरांगना भीकाजी कामा भी यहाँ रहीं थीं। भारतीयों के लिए 2-2 हजार रुपये की 6 फैलोशिप शुरु कीं, जिनमें गुरु गोविंद सिंह फैलोशिप और शिवाजी फैलोशिप उल्लेखनीय हैं। भारत में क्रांतिकारियों के लिए पिस्तौल और बम की आपूर्ति में विशेष भूमिका थी।
श्रीयुत मदन लाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली का इंग्लैंड में वध कर देने से श्याम जी कृष्ण वर्मा पर अंग्रेजों का संदेह गहरा गया था। "धींगरा" फैलोशिप भी प्रारंभ की।अंग्रेज श्याम जी कृष्ण वर्मा को पकड़ पाते इसके पूर्व ही उन्होंने अपना रहवास बदल लिया और फ्रांस चले गए, यहाँ भी अंग्रेजों ने पीछा नहीं छोड़ा इसलिए, महारथी श्याम जी कृष्ण वर्मा जिनेवा (स्विट्जरलैंड) चले गए और मृत्यु पर्यन्त (31 मार्च 1930) तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
स्विट्जरलैंड की सरकार श्याम जी कृष्ण वर्मा से अत्यंत प्रभावित थी इसलिए उनके मरने के बाद उनकी अस्थियाँ सुरक्षित रखी गईं। हम स्वाधीन हो गये और स्वतंत्रता का इतिहास भी लिखा गया परंतु एक दल विशेष के समर्थक और वामपंथी इतिहासकारों ने इस महारथी के अवदान को 4-5 पंक्तियों में निपटा दिया गया और उनकी अस्थियों की किसी ने सुध न ली। 22 अगस्त 2003 को तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्विट्जरलैंड से उनकी अस्थियाँ ससम्मान मंगवाई और "क्रांति तीर्थ" बनवाकर सुरक्षित कीं - एतदर्थ उनका अनंत कोटि आभार है।

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