14 मई 1934 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बैकुण्ठ शुक्ल का बलिदान | The Voice TV

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14 मई 1934 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बैकुण्ठ शुक्ल का बलिदान

Date : 14-May-2024

 

कहने के लिये भारत विदेशी आक्रांताओं से पराजित हुआ किन्तु भारत का इतिहास तो घर के उन विश्वासघातियों ने लिखा जो मुखबिर बन गये थे । अंग्रेजों का एक ऐसा ही मुखबिर फणीन्द्र घोष बना जिसके कारण क्राँतिकारी आँदोलन में बिखराव आया । सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बैकुण्ठ लाल शुक्ल ने सबकाम छोड़कर विश्वासघायी फणीन्द्र को मौत के घाट उतार दिया था । 
बैकुंठ शुक्ला का जन्म 15 मई 1907 को जलालपुर गांव में हुआ था । उनकी प्रारंभिक अपने गाँव में ही हुई और मुजफ्फरपुर सः मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की । उनका परिवार भी राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिये बलिदानियों का रहा है । पितामह 1857 की क्रान्ति में सक्रिय हुये तो चाचा योगेन्द्र शुक्ल बिहार में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएसन का नेतृत्व कर रहे थे। स्वत्व के लिये ऐसे संघर्षशील परिवार में जन्में बैकुण्ठ लाल जी का बालवय से झुकाव स्वतंत्रता संघर्ष की ओर हुआ । किशोर वय से ही वे क्राँतिकारियों के सहयोगी बन गये थे । समय के साथ विवाह हुआ और परिवार की आवश्यकता के लिये शिक्षक की नौकरी शुरु कर दी । नौकरी के साथ क्राँतिकारी आँदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते थे । इसलिए अहिसंक आँदोलन की ओर मुड़ गये । इसके अलावा उन्हें लगता था कि क्राँतिकारी आँदोलन से पहले जन जागरण जरूरी है । इसलिए यह नवविवाहित जोड़ा स्वदेशी आँदोलन से जुड़ गये और 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी भाग लिया । गिरफ्तार हुये । यहीं से बैकुंठ शुक्ला की जेल यात्राएँ आरम्भ हुई। गांधी-इरविन समझौते के बाद उन्हें अन्य सत्याग्रहियों के साथ रिहा किया गया था। रिहाई के बाद 1931 में मुजफ्फरपुर के तिलक मैदान में पत्नी राधिका सहित पहुँचे और झंडा फहरा दिया। किसी प्रकार राधिका देवी तो बच निकलीं पर बैकुण्ठ लाल शुक्ल बंदी बना लिये गए। राधिका देवी ने अपने पति बैकुंठ शुक्ल तथा गिरफ्तार अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रिहाई के लिये सत्याग्रह किया और, अंततः वे भी गिरफ्तार करलीं गईं । यद्यपि बैकुण्ठ लाल शुक्ल अहिसंक आँदोलन से जुड़ गये थे लेकिन उनका सद्भाव क्राँतिकारी आँदोलन के प्रति बना रहा । इसी बीच क्राँतिकारी आँदोलन सेंट्रल एसेम्बली बम कांड का सनसनी खेज समाचार आया । इसमें में सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 1931 में फांसी का समचार भी आया । यह समाचार भी छिपा न सका कि इस असेंबली बम काँड में बेतिया निवासी फणीन्द्र नाथ घोष टूट गये और पुलिस के मुखबिर बन गये । अदालत ने उनके बयान महत्वपूर्ण माने चूँकि फणीन्द्रनाथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का सदस्य और क्राँतिकारियों के सहयोगी रहे थे । यह बात सभी को चुभी । फणीन्द्र बिहार के रहने वाले थे । इसके चलते और बैकुंठ शुक्ल भी बिहार से थे । इसलिए हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने बैकुण्ठ शुक्ल से संपर्क किया । 1932 के अंत में फणीन्द्रनाथ घोष की हत्या का निर्णय हुआ और यह काम बैकुंठ शुक्ला और चंद्रमा सिंह को सौंपा गया दोनों फणीन्द्र घोष उन दिनों बिहार के बेतिया में थे। बैकुण्ठ लाल शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साइकिल से बेतिया पहुँचे । घर पहुँचे तो फणीन्द्र बाहर अपने  दोस्त गणेश प्रसाद गुप्त से बात कर रहा था । गणेश प्रसाद गुप्त भी पहले हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ा था लेकिन समय के साथ दूर हो गया था । दोनों क्राँतिकारियों ने बिना कोई विलंब किये दोनों को गोली मारी और साइकिल वहीं छोड़कर भाग निकले। यह 17 नवंबर 1932 का दिन था । फणीन्द्र नाथ घोष की मौत उसी दिन हुई जबकि गणेश प्रसाद की मौत तीन दिन बाद 20 नवंबर को हुई ।
इस दोहरे हत्याकांड से पूरी सरकार सकते में आ गई। विशेषकर फणीन्द्र की मौत से वे चौंक गये । फणीन्द्र उनका महत्वपूर्ण मुखबिर था जिसकी सूचनाओं से ही ब्रिटिश सरकार को क्राँतिकारी आँदोलन का दमन करने के रास्ते मिले । अंग्रेज सरकार ने दोनों की गिरफ्तारी पर इनाम की घोषणा की । अंग्रेजों को फिर कोई विश्वासघाती मिला जिसकी सूचना पर चन्द्रमा सिंह की गिरफ्तारी 5 जनवरी 1933 को कानपुर से, और बैकुण्ठ लाल शुक्ल की गिरफ्तारी 6 जुलाई 1933 को सोनपुर के गंडक पुल पर हुई । मुजफ्फरपुर की जिला अदालत में दोनों पर हत्या का मुकदमा । क्राँतिकारी बैकुण्ठ लाल शुक्ल ने चंद्रमा सिंह को बचाते हुए हत्या की सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली। 23 फरवरी 1934 को सत्र न्यायाधीश ने बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सजा सुनाई और चंद्रमा सिंह को दोष मुक्त कर दिया । बैकुंठ शुक्ल ने सत्र न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय में अपील की ।  18 अप्रैल 1934 को अपील खारिज हुई और हाईकोर्ट ने फांसी की सजा बरकरार रखी । 14 मई 1934 को गया जेल में बैकुंठ शुक्ल को फांसी दे दी गयी। 
 

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