समाज में पनप रही समस्याओं का समाधान हिन्दू परिवार व्यवस्था में छुपा है Date : 25-Aug-2024 हमारा परिवार हमारी देव संस्कृति का संवाहक है। व्यक्तिवाद व स्वार्थ भावना की अति के कारण मानव का तनाव और अवसाद के दुष्चक्र में फंसा दिया है। एकाकीपन हावी हो गया है। फलस्वरूप हिंसा और नशे जैसी विकृतियां सामने आ रही हैं। ऐसे में हमारी परिवार व्यवस्था का महत्व बढ़ जाता है। समाज में पनप रही विकृतियों और समस्याओं का समाधान हमारी परिवार व्यवस्था से ही मिल सकता है। हमारे परिवार हमारी शक्ति और आंतरिक ऊर्जा का केंद्र है। इसके बल पर ही हम सामाजिक जीवन का सर्वोच्च प्राप्त कर सकते हैं। यह संस्कृति एवं जीवन मूल्यों की प्राथमिक पाठशाला भी है। परिवार से ही हमारे भीतर सद्गुणों का विकास होता है। किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके परिवार का बहुत बड़ा योगदान होता है। मनुष्य कुटुम्ब व्यवस्था में ही श्रेष्ठ संस्कार ग्रहण करता है। शिशु पर भी पहला प्रभाव परिवार का ही पड़ता है। यदि पारिवारिक वातावरण दिव्य है, हिंदू संस्कृति का नियमानुसार पालन करने वाला हो, तो बच्चे शांत मन के साथ मानसिक रूप से सबल होने लगते हैं। उनकी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्षमता निरंतर बढ़ती है। वे तर्क करना सीखते हैं, अनुशासन उनके जीवन का अभिन्न अंग स्वतः बन जाता है। इसके विपरीत यदि परिवार का वातावरण ठीक न हो तो बच्चा टूटने लगता है। उसका विकास अवरुद्ध होने लगता है। वह मानसिक एवं बौद्धिक रूप से कमजोर होने लगता है। उसके स्वभाव में नकारात्मकता आने लगती है। वह उद्व्गिन व उद्दंड होने लगता है। कभी-कभी वह हिंसक भी हो जाता है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक हमारी परिवार व्यवस्था सुदृढ़ है, संस्कारवान है। जब तक परिवार अपने बच्चों को धर्म, संस्कृति, राष्ट्र प्रेम की सीख देता है, तब तक विश्व की कोई भी शक्ति हमारे समाज को कमजोर नहीं कर सकती। परिवार रूपी संस्था से केवल व्यक्ति का ही नहीं बल्कि राष्ट्र के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त होता है। हमें हमारी पीढ़ी को सिखाने के साथ साथ खुद को भी स्मरण दिलाना होगा कि हमारी संस्कृति ऋषियों द्वारा निर्मित संस्कृति है। इसलिए हर एक गृहस्थ को ऋषि बनना होगा। अपने घर को होटल या गेस्ट हाउस ना बनाकर मंदिर बनाना होगा। हमारा जीवन यंत्रवत ना हो, इसकी हमें संभाल करनी होगी। हममें प्राण हैं, भाव हैं, विचार है, गरिमा है। हम सब मिलकर साथ बैंठे, विचार करें। न केवल अपनी आने वाली पीढियों की वरन देश के भविष्य का चिंतन भी हम सबको करना होगा, तब हम सत्य सनातन परंपरा को मजबूत बनाने में सफल होंगे। लेखिका - प्रियंका कौशल