भगवान् श्रीकृष्ण का अवतरण जन्माष्टमी नहीं वरन् अवताराष्टमी है | | The Voice TV

Quote :

आचार्य चाणक्य: "समय और शिक्षा का सही उपयोग ही व्यक्ति को सफल बना देता है।"

Editor's Choice

भगवान् श्रीकृष्ण का अवतरण जन्माष्टमी नहीं वरन् अवताराष्टमी है |

Date : 26-Aug-2024

"ॐ कृं कृष्णाय नम:"। हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। 64 कलाओं से परिपूर्ण एकमात्र पूर्ण अवतार श्री कृष्ण भगवान् ही हैं। एतदर्थ श्रीकृष्ण के अवतरण को जन्माष्टमी की जगह अवताराष्टमी कहना सर्वथा उचित होगा। शब्द ब्रम्ह होते हैं, इसलिए शब्दों का प्रयोग करते समय सावधानी बरतना नितांत आवश्यक है। जब स्वयं श्रीकृष्ण ने ही कहा है कि मैं अवतरित होता हूँ, तो हम लोगों का जन्माष्टमी कहना कहाँ तक उचित है? 

बात प्रारंभ करते हैं गीता से क्योंकि यह भारतीय न्याय व्यवस्था में शपथ के लिए विख्यात है। जब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में यह उपदेश मैंने वैवस्वत सूर्य को दिया (गीता, 4/3) तो अर्जुन कहता है हे हरि! आपने तो वसुदेवपुत्र के रूप में अभी कुछ दिन पहले ही जन्म लिया है फिर यह कैसे संभव है?  तब श्रीकृष्ण कहते हैं, प्रिय अर्जुन! मेरे और और तुम्हारे पहले ही कई जन्म हो चुके हैं (गीता, 4/5) जिन्हें मैं जानता हूँ ( परमात्मा होने से) परन्तु तू नहीं जानता (जीवात्मा होने से) अर्थात् , परमेश्वर की जानकारी में सब है, जीवात्मा की जानकारी में नहीं। यद्यपि तपस्या द्वारा सिद्ध पुरुषों को एक सीमा तक यह ज्ञान हो सकता है।
श्रीमद्भागवत में शौनक आदि ऋषि, इतिहासवेत्ता सूत जी से पूछते हैँ! क्या करने की इच्छा से श्रीकृष्ण अवतरित हुए? (भागवत, 1/1/12) और आप हमें उनके विभिन्न अवतारों और लीलाओं की कथा सुनायें ( भागवत, 1/1/17-18)। यहाँ पर चिंतन किया जाये तो बोध होता है कि  अवतार शब्द का प्रयोग परमात्मा के धरा पर आगमन का द्योतक है। और जन्म शब्द जीवात्माओं के लिए अधिक युक्तिसंगत है यद्यपि पहले ही कह चुके हैं कि व्यक्ति के गौरव में वृद्धि का विचार करने के उद्देश्य से उसके लिए भी अवतरण जैसा शब्द प्रयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। 
उत्तररामचरित में भवभूति, शतकों में  भर्तृहरि, शंकरदिग्विजय आदि संदर्भों  में अवतार शब्द ईश्वर के धरा पर आगमन के लिए प्रयुक्त है। किसी व्यक्ति का देहावसान दिवस भी गरिमामय बन जाये इसलिए पखवाड़े के चांद्र दिवस की अवसान तिथि के साथ पुण्य लगाकर पुण्यतिथि के रूप में दिवंगत के कीर्ति को याद किया जाता है। वस्तुत:  दिव्य आत्माओं की पुण्यतिथि न होकर "लीलासंवरण तिथि" या "लीलासंवरण दिवस"कहना  अधिक उपयुक्त हो सकता है।

RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement