जन्म से ही दोनों हाथ काम नहीं करते, पैरों से लिखकर परीक्षा दे रहे हैं नेपाल के सन्देश बुढामगर | The Voice TV

Quote :

“स्वयं जैसे हो वैसे ही रहो; बाकी सब तो पहले से ही कोई और बन चुके हैं।” ― ऑस्कर वाइल्ड

International

जन्म से ही दोनों हाथ काम नहीं करते, पैरों से लिखकर परीक्षा दे रहे हैं नेपाल के सन्देश बुढामगर

Date : 25-Mar-2026

 काठमांडू, 25 मार्च । रोल्पा की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों पर करीब डेढ़ घंटे पैदल चलकर 12 वर्षीय एक बालक रोज़ परीक्षा केंद्र पहुंचता है। फिर वह अपने पैरों से ही परीक्षा लिखकर वापस लौटता है। उनकी लिखावट में छिपा संघर्ष और मेहनत असाधारण है। ऐसा लगता है कि हर परीक्षा उनके लिए केवल शैक्षिक मूल्यांकन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की भी परीक्षा है। सन्देश की यह प्रस्तुति देखने वाले लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

रोल्पा नगरपालिका–10 धवाङ, धाङ्सी गांव के निवासी सन्देश बुढामगर इस समय अपने पैरों के सहारे अपना भविष्य लिख रहे हैं। नेपाल राष्ट्रीय आधारभूत विद्यालय की कक्षा–5 के छात्र सन्देश परीक्षा देने के लिए दूसरे वॉर्ड में स्थित हिमालय माध्यमिक विद्यालय पहुंचते हैं। वे जिले में चैत 8 गते से शुरू हुई पालिका-स्तरीय वार्षिक परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। परीक्षा के दौरान उनके लिए ज़मीन पर बैठने की व्यवस्था की जाती है और वे पैरों की उंगलियों से कलम पकड़कर लिखते हैं।

परिवार के लोग बताते हैं कि सन्देश के लिए जीवन की शुरुआत आसान नहीं थी। खाना खाने, कपड़े पहनने से लेकर दैनिक कामों में उनके हाथ साथ नहीं देते। जन्म से ही दोनों हाथ काम नहीं करते, लेकिन इसके बावजूद सन्देश ने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। उन्होंने अपनी कमजोरी को ही ताकत में बदलने का संकल्प लिया। नर्सरी कक्षा से ही उन्होंने पैरों से लिखने का अभ्यास शुरू कर दिया। आज वे कहते हैं, “स्कूल जाना शुरू करने के बाद से ही मैंने पैरों से लिखने का अभ्यास किया। अब तो जितना भी लिखना पड़े, मैं आसानी से पैरों से लिख सकता हूं।”

शिक्षक खिम बुढामगर के अनुसार सन्देश उत्तरपुस्तिका के सभी प्रश्नों के उत्तर साफ और समझने योग्य तरीके से पैरों से ही लिखते हैं। दुर्गम गांव में सड़क पहुंचने के बावजूद यातायात की सुविधा न होने के कारण वे रोज़ डेढ़ घंटे पैदल चलकर परीक्षा केंद्र पहुंचते हैं। दुर्गम परिस्थितियों और गरीबी के कारण सन्देश के अभिभावक उनके हाथों के काम न करने का वास्तविक कारण पता नहीं लगा पाए हैं। उचित स्वास्थ्य जांच के अभाव में उनका इलाज भी नहीं हो सका है।

फिर भी, हाथों के काम न करने के बावजूद उनकी पढ़ने की लगन और आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति सभी को एक संदेश देती है—अगर हिम्मत हो तो कोई भी बाधा सफलता के रास्ते को नहीं रोक सकती। सन्देश बुढामगर आज केवल रोल्पा ही नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प रखने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गए हैं।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement