कहते हैं कि हर पत्थर अपनी कहानी कहता है, बस सुनने वाला चाहिए। मध्यप्रदेश के अनूपपुर ज़िले में बसा अमरकंटक ऐसा ही स्थल है, जहां इतिहास, आस्था और प्रकृति एक साथ सांस लेते हैं। मेकल पर्वतमाला की ऊंचाइयों पर स्थित यह तीर्थ लगभग 1065 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। चारों ओर घने वन, ठंडी हवाएं और पहाड़ी रास्ते—यह यात्रा अपने आप में एक अनुभव बन जाती है।
विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के संगम क्षेत्र में स्थित यह स्थान छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट है। शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण इसे ‘तीर्थराज’ भी कहा जाता है। यहां की सांझ ऐसा आभास कराती है मानो आकाश पर सिंदूरी रंग घुल गया हो।
रोचक तथ्य और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अमरकंटक का अतीत हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में सूर्यवंशी शासकों ने यहां बसाहट की नींव रखी। चेदि और विदर्भ वंशों की स्थापत्य शैली के मंदिर आज भी उस युग की झलक दिखाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव, कपिल मुनि, व्यास और भृगु जैसे ऋषियों ने यहां साधना की थी। यह क्षेत्र औषधीय वनस्पतियों के लिए भी प्रसिद्ध है। काली हल्दी और गुलाबकवाली जैसे दुर्लभ पौधों का उल्लेख यहां मिलता है, हालांकि ये अब विलुप्ति के कगार पर हैं।
यहां का बायोस्फीयर रिज़र्व भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है। घने जंगलों में सागौन और महुआ के वृक्ष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।
प्रमुख दर्शनीय स्थल
1. Narmada River का उद्गम
अमरकंटक वह पावन भूमि है जहां से नर्मदा नदी का प्रवाह आरंभ होता है। इसे ‘मेकलसुता’ और ‘मां रेवा’ के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थित कुंड से निकलकर यह नदी पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है, जो इसे अन्य नदियों से अलग बनाती है। उद्गम परिसर में अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं।
2. कलचुरी कालीन मंदिर समूह
11वीं शताब्दी में कलचुरी नरेश कर्णदेव द्वारा निर्मित मंदिरों का समूह नर्मदा कुंड के समीप देखा जा सकता है। कर्ण मंदिर और पातालेश्वर मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध हैं।
3. सोनमुड़ा
यह स्थान सोन नदी के प्रारंभ बिंदु के रूप में जाना जाता है। यहां से गिरता जलप्रपात मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है। मान्यता है कि सोन नदी आगे चलकर गंगा में समाहित होती है।
4. दूधधारा जलप्रपात
कपिल धारा से आगे स्थित यह प्रपात अपने दूधिया जल के कारण जाना जाता है। नर्मदा का पानी यहां गिरते समय सफेद झाग जैसा प्रतीत होता है।
5. कपिल धारा
नर्मदा का पहला प्रमुख झरना, जो लगभग 100 फीट की ऊंचाई से गिरता है। समीप ही कपिल मुनि का आश्रम और प्राचीन गुफाएं स्थित हैं।
6. ज्वालेश्वर मंदिर
अमरकंटक–शहडोल मार्ग पर स्थित यह शिव मंदिर जोहिला नदी के उद्गम से जुड़ा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है।
7. श्रीयंत्र महामेरु मंदिर
विशेष ज्यामितीय संरचना वाला यह मंदिर घने जंगलों के बीच स्थित है और अपनी अनूठी वास्तु रचना के लिए जाना जाता है।
8. धुनी पानी
नर्मदा मंदिर से दक्षिण दिशा में स्थित यह स्थल अपने औषधीय जलकुंड के लिए प्रसिद्ध है। कथा है कि एक ऋषि की धूनी को शांत करने हेतु यहां जलधारा फूटी थी।
प्रमुख उत्सव
यहां हर वर्ष नर्मदा जयंती अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। उद्गम स्थल पर विशेष आरती और विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दराज़ से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पहुंचने का मार्ग
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर (लगभग 245 किमी) है। रायपुर से भी सड़क मार्ग उपलब्ध है।
रेल मार्ग: बिलासपुर और अनूपपुर प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जहां से सड़क मार्ग द्वारा अमरकंटक पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग: जबलपुर, बिलासपुर, शहडोल और अनूपपुर से नियमित बस और टैक्सी सेवाएं उपलब्ध हैं।
यात्रा का उपयुक्त समय
अक्टूबर से मार्च के बीच यहां का मौसम सुहावना रहता है। वर्षा ऋतु में झरनों की छटा और भी मनमोहक हो जाती है। हालांकि, साल के किसी भी समय यहां आकर प्राकृतिक और आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया जा सकता है।
अमरकंटक प्रकृति प्रेमियों, इतिहास शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं—सभी के लिए एक विशेष अनुभव प्रदान करता है। यहां की वादियां, पवित्र जलधाराएं और शांत वातावरण मन को नई ऊर्जा से भर देते हैं।
