आधुनिक फ्रिज और एसी ने मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों के सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है। ये मिट्टी के बर्तन बनाकर रखते तो हैं लेकिन बिक्री न होने की वजह से खाने के भी लाले पड़ जाते हैं। परिवार कैसे चलेगा। कोई भी मटके खरीदने नहीं आ रहा है। धंधे से जुड़े लोगों ने ठेले पर रखकर मटके बेचने भी बंद कर दिए हैं। देश भर में प्रजापति समाज के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते हैं। कुम्हार अपना पुश्तैनी काम छोड़ नहीं सकते। इसलिए उनके पास मिट्टी के बर्तन और गर्मी के दिनों में घड़े बेचने के अलावा कमाई का दूसरा विकल्प नहीं है। हालात ये हैं कि अब कुम्हार परिवार अपने काम को जिंदा रखने के लिए कर्ज लेकर व्यवसाय कर रहे हैं। लेकिन इससे भी इनकी लागत नहीं निकल रही। कुम्हार (कुंभकार) जाति के लोग मिट्टी से ही अपना रोजी-रोटी एवं जीवनयापन करते हैं। कुम्हार शब्द, कुम्भकार से निकला हुआ प्रतीत होता है, जिसका अर्थ कुम्भ, यानि घड़ा बनाने वाला होता है। इन्हें कुम्भार, प्रजापति, प्रजापत, घूमियार, घूमर, कुमावत, भांडे, कुलाल या कलाल आदि नामों से भी अलग-अलग प्रदेशों में जाना जाता है। कुम्हारों की हस्तकला ही, उनके रोजगार का साधन होता है। कुम्हार अपने हाथों से मिट्टी की वस्तुएं बनाते हैं।
कुम्हार मिट्टी से वस्तुएं बनाने के लिए काली मिट्टी, लाल मिट्टी, रेत व राख आदि को एक साथ मिलाकर, पानी डाल कर अच्छे से मिक्स करते हैं। उसके बाद चाक (चकरी) में मिट्टी को रखकर उनको आकार देते हैं, और भिभिन्न-भिभिन्न वस्तुओं का निर्माण करते हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां, दीया, बोरा, बैल, करसा, क्लास, ठेकुआ, पुरा, मर्की, ओम, देवा, चूल्हा व बच्चों के खिलौने। मिट्टी के बर्तन पकने के बाद, उनको नजदीकी बाजार एवं चौक-चौराहों में बेचने के लिए ले जाते हैं। और उसके बाद, उसी वस्तुओं के पैसे से जो आमदनी उनको प्राप्त होती है, उसी से यह अपना जीवनयापन और अपने बच्चों का पालन पोषण करते हैं। लेकिन इन मिट्टी के बर्तन या खिलौने का मूल्य उतना ज्यादा नहीं रहता, जितनी उसमें मेहनत लगती है। और-तो-और लेने वाला व्यक्ति भी, वस्तुएं लेने पर मोलभाव करके, उसमें पैसा कम करवा ही लेता है।
इन कुम्हारों का रोजगार उतना अच्छा नहीं रहता। क्योंकि, पहले के समय में सभी लोग मिट्टी के बर्तन व मिट्टी के वस्तुएं उपयोग करते थे। वर्तमान समय में मिट्टी के बर्तनों को लोग नहीं के बराबर इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि, सभी लोग स्टील के बर्तन, फाइबर के बर्तन आदि का अधिक यूज करते हैं, जिससे इनकी आमदनी, पहले के समय से कम होती है। गणेश पक्ष, दुर्गा पक्ष व विश्वकर्मा पक्ष आदि में ही इन लोगों को थोड़ी आमदनी हो पाती है और बाकी समय में इनको एक दिन में 100 से 200 रुपये भी मिलना मुश्किल हो जाता है। बहुत से कुम्हार, आमदनी अच्छी ना होने के कारण, मिट्टी के वस्तुएं बनाना छोड़ चुके हैं। और कुछ अन्य काम, अपने जीवनयापन करने के लिए पकड़ लिए हैं और उसी में लगे हुए हैं। वह लोग इस काम को और करना नहीं चाहते, क्योंकि, इसमें मेहनत अधिक और आमदनी कम है।
वर्तमान में कुम्हारों का स्थिति बहुत ही खराब है, क्योंकि, पहले की तरह लोगों ने मिट्टी के समान का उपयोग करना बंद कर दिया है। इस कारण, इनके पास जो बनी हुई वस्तु भी रहती है, वह भी बिक नहीं पाती है, जिससे इनको नुकसान ही उठाना पड़ता है। बाकी मिट्टी के वस्तुएं, अपने सीजन में ही बिक पाती हैं। बाकी समय इनका बिकना मुश्किल हो जाता है। मिट्टी व पानी की समस्या ने भी इस धंधे की कमर तोड़ दी है। पहले इस व्यवसाय के लिए यह गांव काफी चर्चित था। लेकिन समय बीतने के साथ सब कुछ खत्म होने लगा है। गांव में कच्चे मकानों की संख्या काफी कम हो गई है। जिस कारण छत में लगने वाले खपड़े की बिक्री नहीं के बराबर होती है। सबसे ज्यादा परेशानी मिट्टी के लिए होती है। पहले मिट्टी वन विभाग की जमीन से लाई जाती थी। वर्तमान में इस पर रोक लगा दी गई है। पानी की समस्या एवं कोयले के दाम में बढ़ोतरी ने भी इस धंधे की कमर तोड़ कर रख दी है। परिवार के चार सदस्यों की कड़ी मेहनत के बाद एक दिन में 250 खपड़े का निर्माण हो पाता है, जिसे पकाकर तीन हजार रुपये में बेचा जाता है। लागत के अनुसार उन्हें लाभ नहीं मिल पाता है।
मिट्टी के बर्तन बनाने के अलावा इनके पास और कोई दूसरा रोजगार नहीं है, न ही कृषि करने के लिए इनके पास भूमि है। और न अन्य साधन, जिससे आय हो पाए। यह जैसे-तैसे करके अपने परिवार को पाल रहे हैं। मौजूदा दौर में एल्युमीनियम, थर्माकोल व प्लास्टिक बर्तनों का खूब चलन है, जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। हमारे पूर्वज अपने समय में मिट्टी, लोहे व कांसे के बने बर्तनों का उपयोग करते थे। इसलिए उन्हें मौजूदा दौर की बीमारियां नहीं होती थी। यदि आप भी, अपने पूर्वजों की भांति स्वस्थ्य जीवनयापन करना चाहते हैं तो मिट्टी के बने बर्तनों का उपयोग भोजन बनाने के लिए करें, ताकि आपके स्वस्थ्य के साथ ही इन कुम्हारों की माली हालत में सुधार हो सके।
लेखिका: प्रियंका सौरभ
देश की आज़ादी के बाद जैसे इन क्रांतिकारियों का अस्तित्व ही खत्म हो गया।
इन्हीं में से एक हैं बटुकेश्वर दत्त! वही बटुकेश्वर दत्त जिन्होंने भगत सिंह के साथ असेंबली में बम फेंका, उनके साथ गिरफ्तार हुए और जब भगत सिंह को सांडर्स की हत्या के लिए फांसी की सजा हुई तो इन्हें काला पानी की सजा मिली।
भगत सिंह तो चले गये लेकिन लोगों के दिल में ऐसी जगह पा ली जो सदियों तक रहेगी। पर बटुकेश्वर, जिन्होंने आजीवन कारावास में जेल की प्रताड़नायें सही, और फिर जेल से बाहर आने के बाद भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान दिया, उन्होंने आजादी के बाद की ज़िन्दगी गुमनामी में जी।
विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। ‘काकोरी’ ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस तरह से बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं, जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ पर्चों के माध्यम से अपनी बात को प्रचारित करने के लिए किया गया था।
असेम्बली में बम फेंकने के बाद बटुकेश्वर दत्त तथा भगतसिंह ने भागकर बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं पर अन्य लोगों को पुलिस परेशान करती है।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त पर ‘लाहौर षड़यंत्र केस’ का मुक़दमा चलाया गया। जिसमें भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा दी गई थी, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा काटने के लिए काला पानी जेल, अंडमान भेज दिया गया।
फांसी की सजा न मिलने पर देशभक्ति की भावना से भरे बटुकेश्वर बहुत निराश हुए। उन्होंने ये बात भगत सिंह तक पहुंचाई भी कि वतन पर शहीद होना ज्यादा फख्र की बात है, तब भगत सिंह ने उनको ये पत्र लिखा कि वे दुनिया को ये दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।
जेल में ही बटुकेश्वर दत्त ने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में वे बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से टीबी की गंभीर बीमारी लेकर लौटे बटुकेश्वर दत्त अपने इलाज के बाद फिर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गये। जिसके कारण एक बार फिर वे गिरफ्तार हुए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए।
साल 1947 में देश आजाद हो गया। वे पटना में रहने लगे। लेकिन उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा। रोजगार के लिए कभी सिगरेट कंपनी एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बनकर उन्हें पटना की सड़कों में घूमना पड़ा।
वे बिहार विधान परिषद के सदस्य भी बनाए थे. 1964 में बटुकेश्वर दत्त के बीमार होने पर उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल ले जाया गया | जीवन के अंतिम समय में उन्हें सरकार की तरफ से तवज्जो देर से मिली जिसके कारण देश ने उन्हें खो दिया.
बाद में पता चला कि उनको कैंसर है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बाकी हैं। कुछ समय बाद पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन उनसे मिलने पहुंचे। आंसूओ से भरी आंखों के साथ बटुकेश्वर दत्त ने मुख्यमंत्री से कहा,
“मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।”
20 जुलाई 1965 को भारत माँ का यह वीर इस दुनिया को अलविदा कह गया। बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।
भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने जाने वाले मंगल पांडे ने 1857 में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।अंग्रेजो से स्वतंत्रता पाने के लिए हमारे देश के कई नवयुवको ने कुर्बानी दी थी उन्होंने भारत देश को आज़ाद करने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी थी लेकिन जिस एक ने इस लड़ाई का आरंभ किया था वो थे मंगल पाण्डेय | मंगल पाण्डेय ने आज़ादी के प्रति लड़ाई की शुरुआत 27 मार्च 1857 में की थी |
मंगल पाण्डेय ने 22 वर्ष की उम्र में ही ब्रिटिश इर्ष्ट इंडिया कंपनी की सेना मे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की 34वी बटालियन मे भर्ती किये गए।अंग्रेजी शासन ने अपने इस बटालियन को एन्फील्ड राइफल दी थी, जिसका निशाना अचूक था। इस बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया काफी पुरानी थी। इसमें गोली भरने के लिए कारतूस को दांतों से खोलना होता था और मंगल पांडेय ने इसका विरोध कर दिया था, क्योंकि ऐसी बात फैल चुकी थी कि इस कारतूस में गाय व सुअर के मांस का उपयोग किया जा रहा है।27 मार्च 1857 को बैरकपुर परेड मैदान कलकत्ता के निकट मंगल पाण्डेय जो दुगवा रहीमपुर(फैजाबाद) के रहने वाले थे रेजीमेण्ट के अफ़सर लेफ़्टीनेण्ट बाग पर हमला कर के उसे घायल कर दिया। जनरल ने जमादार ईश्वरी प्रसाद ने मंगल पांडेय को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया पर ज़मीदार ने मना कर दिया।
सिवाय एक सिपाही शेख पलटु को छोड़ कर सारी रेजीमेण्ट ने मंगल पाण्डेय को गिरफ़्तार करने से मना कर दिया। मंगल पाण्डेय ने अपने साथियों को खुलेआम विद्रोह करने के लिये कहा पर किसी के ना मानने पर उन्होने अपनी बंदूक से अपनी प्राण लेने का प्रयास किया। परन्तु वे इस प्रयास में केवल घायल हुये। 6अप्रैल 1857को मंगल पाण्डेय का कोर्ट मार्शल कर दिया गया और 8 अप्रैल को फ़ांसी दे दी गयी।
मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिंगारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही 10मई सन् 1857 को मेरठ की छावनी में कोतवाल धनसिंह गुर्जर के नेतृत्व में बगावत हो गयी। ओर गुर्जर धनसिंह कोतवाल इस के जनक के रूप में सामने आए यह विप्लव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद ही हिंदुस्तान में चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहाँ की जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके।
इस प्रकार मंगल पाण्डेय आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत करने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानी बने उनका दिया गया बलिदान व्यर्थ नही गया बल्कि वह युवाओ में आज़ादी की लड़ाई के लिए एक चिंगारी बन गया जिसने उस लड़ाई की आग लगा दी |
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के महान नेता और साहित्यकार थे। वह विधायक और राज्य सभा के सांसद भी रहे ।
डॉ. खूबचंद बघेल द्वारा सामाजिक उत्थान के लिए चलाये गए प्रसिद्ध आंदोलन
छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा
डॉ. बघेल महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ गांधीजी से जुड़ने का फैसला किया और साल 1930 में गांधीजी के आंदोलन से जुड़ गए। 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पहली बार गिरफ्तार किया गया। इसके बाद उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। आजादी के बाद उन्होंने 1951 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और आचार्य कृपलानी के साथ ‘किसान मजदुर प्रजा पार्टी’ से जुड़ गए। डॉ. बघेल को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वप्नदृष्टा भी कहा जाता है।
सात एक विशेष संख्या है। चाहे गणित (अभाज्य संख्याएं और संख्या सिद्धांत), संगीत (सात संगीतमय स्वर), खगोल विज्ञान (चंद्र चरण में दिन) या पौराणिक कथा (सप्त चक्र, सप्त समुद्र या सप्त ऋषि) हो, सात का चक्र हमारे चारों ओर निरंतर मौजूद है। इसलिए यह प्रयास उचित है कि इस महीने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के सात साल पूरे होने पर, हम इस बात की जांच करने के लिए कुछ समय निकालें कि स्वतंत्रता के बाद के सबसे बड़े कर सुधार, जीएसटी, जिसे 1 जुलाई, 2017 की मध्य-रात्रि को लागू किया गया था, का प्रदर्शन कैसा रहा है। तब से, जीएसटी ने बड़े पैमाने पर अकादमिक ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अनुपालन के सरलीकरण, लॉजिस्टिक्स में सुधार से लेकर मजबूत राजस्व संग्रह तक के प्रत्येक आयाम की विस्तार से जांच की गई है।
जीएसटी के विषय से जुड़े कई दृष्टिकोणों में से एक है- जीएसटी के राजस्व प्रदर्शन पर हाल में हुई चर्चा. जो अन्य बातों के साथ-साथ यह दर्शाती है कि सकल राजस्व संग्रह में तेज वृद्धि दर्ज की जा रही है, लेकिन इस वृद्धि के अनुरूप शुद्ध राजस्व नहीं बढ़ा है। शुद्ध राजस्व हाल ही में जीएसटी-पूर्व स्तरों पर पहुंच पाया है। शुद्ध संग्रह में इस गिरावट को कुछ चिंता के साथ देखा जा रहा है। इसके अलावा, विशेष रूप से धन वापसी (रिफंड) के साथ डेटा की उपलब्धता की कमी तथा जीएसटी परिषद के कामकाज पर भी कुछ चिंताएं व्यक्त की गई हैं। आइए राजस्व प्रदर्शन से शुरू करते हुए इनमें से प्रत्येक बिंदु पर गहराई से विचार करें।
खुशी की बात है कि शुद्ध राजस्व संग्रह लगातार बढ़ रहा है और जीएसटी लागू होने के बाद इसकी वृद्धि की गति बढ़ी है। दूसरा, जीएसटी शुरू होने के बाद की अवधि में शुद्ध राजस्व की वर्ष-दर-वर्ष आधार पर होने वाली वृद्धि (जीएसटी के शुरू होने से पहले की अवधि में 11.81 प्रतिशत की तुलना में) औसतन 12.76 प्रतिशत रही। यह उपलब्धि महामारी के बाहरी झटके के बावजूद है। तीसरा, हम यह देख सकते हैं कि शुद्ध राजस्व वृद्धि ने लगातार सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। यह नई कर व्यवस्था की प्रणालीगत दक्षताओं को दर्शाता है।
राजस्व संग्रह कर दरों का एक फलन होता है। यहां संदर्भ के लिए, हम इस तथ्य को याद कर सकते हैं कि कर संग्रह संबंधी दक्षता में सुधार के साथ-साथ कर दरों में उल्लेखनीय कमी आई थी। जीएसटी की शुरुआत से पहले, जीएसटी के लिए राजस्व निरपेक्ष दर (आरएनआर) से संबंधित समिति ने 15-15.5 प्रतिशत की दर की सिफारिश की थी। इसके ठीक उलट जीएसटी की शुरुआत के समय इसकी प्रभावी दर 14.4 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया था। बाद में सितंबर 2019 में इसे घटाकर 11.6 प्रतिशत कर दिया गया और मार्च, 20238 में यह 12.2 प्रतिशत हो गया। राजस्व के संदर्भ में, इसे अर्थव्यवस्था के लिए पिछले साल ही 4.3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत (प्रोत्साहन) के रूप में निरूपित किया जा सकता है। यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में भारत की जीएसटी दरें दुनिया में सबसे कम हैं।
एक उठता हुआ ज्वार सभी नावों को ऊपर उठा देता है। राजस्व में वृद्धि एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम होता है, हालांकि सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि के ऊपर राजस्व संग्रह में होने वाली वृद्धि (या उछाल) एक कर प्रणाली की प्रणालीगत दक्षता की असली परीक्षा होती है। इस मामले में, जीएसटी की शुरुआत के बाद से पहले पांच वर्षों के दौरान, सकल घरेलू उत्पाद (मौजूदा कीमतों पर) के मुकाबले शुद्ध राजस्व उछाल 1.02 था, जबकि जीएसटी के बाद के सात वर्षों के दौरान यह 1.28 था। यह जीएसटी द्वारा संभव बनाई गई संग्रह संबंधी क्षमता का एक प्रमाण है।
निस्संदेह, मासिक आधार पर जारी किए गए राजस्व के आंकड़ों में आमतौर पर सकल संग्रह के आंकड़े शामिल होते हैं। शुद्ध आंकड़े केवल फरवरी, 2024 से प्रकाशित किए गए हैं। हालांकि, जीएसटी की शुरुआत के बाद से प्रत्येक वर्ष की वार्षिक सांख्यिकीय रिपोर्ट प्रकाशित की गई है और सार्वजनिक रूप से रखी गई है। इन रिपोर्टों में निर्यात के कारण किए जाने वाले जीएसटी रिफंड से संबंधित महीने-वार विवरण शामिल हैं। इसलिए रिफंड संबंधी आंकड़ों की सार्वजनिक दृश्यता, थोड़े अंतराल पर ही सही, बनी हुई है।
हम, बिना किसी आधार के, इस दावे की जांच करने के लिए आगे बढ़ते हैं कि जीएसटी परिषद में केन्द्र का “प्रभुत्व” है1 जीएसटी की शुरुआत के साथ, केन्द्र और राज्यों ने नए कर के प्रशासन से संबंधित मामलों में, खासतौर पर नीति निर्माण, दरों के निर्धारण, कानूनों/नियमों का मसौदा तैयार करने, अनुपालनों के समन्वय आदि जैसे क्षेत्रों में अपनी संप्रभुता को एकाकार किया। कभी-कभी इसे राज्यों की शक्तियों पर प्रतिबंध के रूप में उद्धृत किया जाता है। हालांकि, यह केन्द्र सरकार के लिए भी समान रूप से एक “प्रतिबंध” है। जीएसटी परिषद ने अपनी समितियों के समर्थन से कई जटिल मुद्दों पर विचार किया है और वह कई ऐसी सिफारिशें लेकर आगे आई है, जिससे कानून के प्रशासन में एकरूपता और दरों की संरचना में स्थिरता आई है।
यह सहकारी संघवाद की भावना का एक प्रमाण है। जीएसटी परिषद के सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इसके अलावा, अनुपालनों को बेहतर बनाने के उद्देश्य से सभी त्रुटियों को दूर करने या छूट को तर्कसंगत बनाने के परिषद के सभी निर्णयों से केन्द्र और राज्यों को समान रूप से लाभ पहुंचा है।
उपरोक्त चर्चा से, तीन बिंदु उभर कर सामने आते हैं- सबसे पहले जीएसटी की संग्रह संबंधी क्षमताएं स्पष्ट, सुसंगत एवं प्रारंभिक हैं और मुख्य रूप से अंतर्जात कारकों के कारण हैं। यही बात रिफंड के शुद्ध राजस्व संग्रह को देखने के समय भी लागू होती है। तीसरा, जीएसटी ने अपेक्षाकृत कम कर दरों और बाहरी झटकों के बावजूद राजस्व में लगातार वृद्धि की है। जैसे-जैसे जीएसटी अपने प्रगति के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, ऐसे कई क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए दर संरचना का सरलीकरण, जीएसटी के दायरे से बाहर रह गई वस्तुओं को शामिल करना और साथ ही एक कुशल अपीलीय तंत्र जैसे प्रशासनिक मुद्दे। हालांकि अब जबकि जीएसटी के सात वर्ष पूरे हो गए हैं, उत्सव मनाने के लिए काफी कुछ है।
लेखक:- देवी प्रसाद मिश्रा
निजीकरण के इस युग में आज भी सरकारी बैंकों का अस्तित्व प्रासंगिक बना हुआ है। 19 जुलाई, 1969 को तत्कालीन सरकार ने देश के 14 प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया था। साल 1969 के बाद 1980 में पुनः 6 बैंक राष्ट्रीयकृत हुए। 19 जुलाई 2024 को बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 55 वर्ष पूरे हो रहे हैं। आर्थिक तौर पर सरकार को लग रहा था कि प्राइवेट बैंक देश के सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे थे। उस समय देश के 14 बड़े बैंकों के पास देश की लगभग 80 फीसदी पूंजी थी। इनमें जमा पैसा उन्हीं सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था, जहां लाभ के ज्यादा अवसर थे। वहीं सरकार की मंशा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात में निवेश करने की थी। दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के मुताबिक 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रुपया डूब गया था। 1969 में राष्ट्रीयकरण के बाद से आज तक भी कई प्राइवेट बैंक डूबने की स्थिति में आए जिन्हें सरकारी बैंकों द्वारा ही संभाला गया। यस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक का ताजा उदाहरण हमारे सामने है । लेकिन आज तक कोई सरकारी बैंक नहीं डूबा, क्योंकि इन पर सरकार और रिजर्व बैंक का पूरा नियंत्रण है। 2023-24 में इन्हीं सरकारी बैंकों ने 1.41 लाख करोड़ का लाभ कमाया है और अभी तक चार बैंकों ने 6481 करोड़ लाभांश के रूप में सरकार को दिया है ।
सरकारी बैंकों को गांवों तक पहुंचने के मकसद से 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई। आज देश में 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की 26 राज्यों और 3 केन्द्रीय शासित प्रदेशों में लगभग 22000 शाखाएं हैं। 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरे चरण में छह निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके विपरीत 1991 के आर्थिक सुधार के बाद सरकार बैंकों के निजीकरण की ओर आगे बढ़ी , जिसे 'नई आर्थिक नीति या एलपीजी नीति' के रूप में भी जाना जाता है। 1994 में नए प्राइवेट बैंकों का युग प्रारम्भ हुआ । आज देश में 8 न्यू प्राइवेट जनरेशन बैंक और 13 ओल्ड प्राइवेट जनरेशन बैंक कुल मिलकर 21 प्राइवेट बैंक काम कर रहे हैं। 2018 में सरकार ने इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक की स्थापना की जिसका उद्देश्य पोस्ट ऑफिस के नेटवर्क का इस्तेमाल करके बैंकिंग को गांव-गांव तक पहुंचाना था । इसके साथ-साथ और कई प्राइवेट पेमेंट बैंकों की भी शुरुआत हुई ।
55 वर्षों के कार्यकाल में सरकारी बैंकों ने बैंकिंग को आम जनता तक पहुंचाने का काम तेजी से किया है। जो बैंक आम जनता तक नहीं पहुंच पाए थे, सरकारी बैंकों के सहयोग से लगभग 51 करोड़ जनधन खाते खुलवाकर आम जनता को बैंकों से जोड़ा है। पिछले दस वर्षों में मोदी सरकार की योजनाओं जैसे जनधन खाते खोलना, मुद्रा लोन, प्रधानमंत्री बीमा योजना, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री स्वनिधि ऋण योजना, किसान सम्मान की किश्त देने का काम, किसान क्रेडिट कार्ड का क्रियान्वयन इन सरकारी बैंकों ने उत्साह से किया है। प्राइवेट बैंक का इसमें योगदान न के बराबर रहा है ।
2008 में एसोसिएट बैंकों का स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में विलय शुरू हुआ जिससे 2017 तक सभी 7 एसोसिएट बैंकों का अस्तित्व समाप्त हो गया । 2019 में सरकारी बैंकों की विलय प्रक्रिया शुरू हुई और 2020 आते-आते 8 बैंकों का अस्तित्व समाप्त हो गया और सरकारी क्षेत्र में 12 बैंक रह गए । सरकार का कहना है की आज के समय में छोटे-छोटे बैंकों की आवश्यकता नहीं है बल्कि 6 से 7 बड़े बैंकों की आवश्यकता है । लेकिन सरकार का यह तथ्य सही नहीं है क्योंकि 2008 में विश्व में बैंकिंग में संकट के समय बड़े- बड़े बैंक भी ध्वस्त हो गए थे ।
सरकार के केन्द्रीय बजट 2021-22 में वित्तमंत्री द्वारा बताए गए विनिवेश के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण करने के लिए विधेयक पेश किया गया था । निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सरकार इन कानूनों के प्रावधानों को बदलना चाहती है । लेकिन निजीकरण के कारण होने वाले दुष्परिणामों को भी नहीं भूलना चाहिए। निजीकरण से राष्ट्रीयकरण के पहले का दौर फिर से आ सकता है, क्योंकि निजी बैंक एक विशेष वर्ग की जरूरतें पूरी करने में लग जायेंगे ओर आम जनता के लिए बैंकिंग की सुविधाएं महंगी और उनके पहुंच से बाहर हो सकती हैं। देश में चाहे नोटबंदी का समय हो या कोविड-19 की प्राकृतिक आपदा, सरकारी बैंकों ने इन विकट परिस्थितियों में भी आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने में अपना रोल बखूबी निभाया है। ऐसे में यदि सरकार 55 वर्षों के बाद इन बैंकों के साथ बार-बार नए-नए प्रयोग करके यदि फिर से निजीकरण की ओर बढ़ती है तो अच्छा नहीं होगा। इसकी जगह सरकार को इन सरकारी बैंकों को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। क्योंकि निजीकरण से बेरोजगारी बढ़ने की संभावना है, शाखाएं बंद होंगी और वित्तीय सहायता देने जैसी गतिविधियां प्रभावित होंगी। निजीकरण से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए रोजगार के अवसर कम होंगे क्योंकि निजी क्षेत्र कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण नीतियों का पालन नहीं करता है। निजी क्षेत्र के बैंक अधिक संपन्न वर्गों और महानगरीय व शहरी क्षेत्रों की आबादी पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, जिसका प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में होता है। इसलिए सरकार को इन बैंकों के निजीकरण के फैसले पर रोक लगानी चाहिए ओर इसकी जगह इन सरकारी बैंकों को और मजबूत करना चाहिए, ताकि ये बैंक देश को विकसित भारत बनाने और विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने में अपना योगदान कर सकें ।
लेखक:- अश्वनी राणा
