वे बोले –‘’भाइयो ! मैने स्वंय और आप सबने इस तीर्थ के उद्धार में जो कुछ दिया हैं, वह अपने धन का एक भाग ही हैं किन्तु भीम पता नही कितने दिनो से परिश्रम के बाद सात पैसे बचा पाया था | उसने तो अपना सर्वस्व ही दान कर दिया है | उसका दान ही सबसे बड़ा दान हैं ,यह निर्णय करने में मुझसे कोई भूल नही हुई है न ? ’’ जनता शांत , किसी को कुछ कहने का साहस नही हुआ | सबने मस्तक झुका रखे थे | उनमे से कोई भी व्यक्ति ऐसा नही निकला , जो इस निर्णय का विरोध व्यक्त कर सके |
