इतिहास के पन्नों में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल जन्म-तिथियों और घटनाओं तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज की चेतना में अमर हो जाते हैं। सावित्रीबाई फुले ऐसा ही एक नाम हैं। वे केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की वह मशाल थीं जिसने महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा के बंद दरवाज़े हमेशा के लिए खोल दिए।
अंधेरे समय में ज्ञान की पहली किरण
उन्नीसवीं सदी का भारत सामाजिक रूढ़ियों और भेदभाव की जकड़ में था। उस समय महिलाओं का पढ़ना ‘पाप’ माना जाता था और उनकी दुनिया घर की चारदीवारी तक सीमित थी। ऐसे दौर में सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को हथियार बनाया और समाज की जड़ हो चुकी कुरीतियों को चुनौती दी। उन्होंने साबित किया कि ज्ञान किसी एक वर्ग या लिंग की बपौती नहीं है।
भारत का पहला बालिका विद्यालय
सावित्रीबाई फुले ने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला। यह कदम केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रतीक था। उन्होंने अछूत माने जाने वाले बच्चों को भी पढ़ाया और यह संदेश दिया कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
समानता और आत्मसम्मान की शिक्षा
सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को केवल अक्षरों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ जीना, अपने अधिकारों को पहचानना और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना सिखाया। उनकी शिक्षा का उद्देश्य समाज में समानता स्थापित करना था।
संघर्षों से भरा रास्ता
उनका जीवन संघर्षों से अछूता नहीं था। जब वे स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो कट्टरपंथी लोग उन पर कीचड़ और पत्थर फेंकते थे। लेकिन उनका साहस अडिग था। वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी रखती थीं, स्कूल पहुँचकर गंदी साड़ी बदलतीं और बच्चों को मुस्कुराकर पढ़ाने लगतीं। उनका विश्वास था कि अपमान भी उन्हें और मजबूत बना रहा है।
सामाजिक सुधार की मिसाल
शिक्षा के साथ-साथ सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ भी मोर्चा खोला।
मानवता का संदेश: जब अछूतों के लिए सार्वजनिक कुएँ बंद थे, तब उन्होंने और ज्योतिबा फुले ने अपने घर का पानी का हौद उनके लिए खोल दिया।
विधवाओं का संरक्षण: उन्होंने विधवा महिलाओं के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई और उनके सम्मानजनक जीवन के लिए ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की।
सेवा में समर्पित अंतिम क्षण
सावित्रीबाई फुले का अंत भी उनके जीवन की तरह सेवा और करुणा से भरा था। पुणे में प्लेग की महामारी के दौरान वे बिना किसी भय के बीमारों की सेवा में जुट गईं। एक संक्रमित बच्चे को अस्पताल पहुँचाते समय वे स्वयं बीमारी की चपेट में आ गईं और अपना जीवन बलिदान कर दिया।
आज की प्रेरणा
सावित्रीबाई फुले आज हर उस महिला और हर उस व्यक्ति की प्रेरणा हैं जो शिक्षा के माध्यम से अपना भविष्य बदलना चाहता है। वे केवल पहली शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि आधुनिक भारत की जननी थीं, जिन्होंने हमें सोचना, सवाल करना और समानता के लिए खड़े होना सिखाया।
