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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन और योगदान

Date : 28-Feb-2026

 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी, विद्वान, समाजसेवी और भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका जीवन सादगी, त्याग, राष्ट्रभक्ति और उच्च आदर्शों का प्रेरणादायक उदाहरण है। वे उन महान नेताओं में से थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की सेवा में समर्पित कर दिया। भारतीय संविधान लागू होने के बाद जब भारत एक गणराज्य बना, तब वे देश के पहले राष्ट्रपति चुने गए और इस पद की गरिमा को अत्यंत सादगी और ईमानदारी के साथ निभाया।


डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को बिहार के सारण जिले (वर्तमान सीवान) के जीरादेई नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के विद्वान थे तथा माता कमलेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। बचपन से ही राजेन्द्र प्रसाद अत्यंत मेधावी छात्र थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा घर पर प्राप्त की और बाद में छपरा तथा पटना में पढ़ाई की। वे उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता गए, जहाँ उन्होंने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित किया। कहा जाता है कि एक बार परीक्षा की उत्तर पुस्तिका जाँचते समय परीक्षक ने लिखा था – “Examinee is better than examiner” अर्थात परीक्षार्थी परीक्षक से भी अधिक योग्य है। यह उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।

उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और वकालत प्रारंभ की। वे एक सफल वकील थे और अच्छी आय अर्जित कर रहे थे, लेकिन देश की दयनीय स्थिति ने उनके मन को व्यथित कर दिया। जब Mahatma Gandhi ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व संभाला, तब राजेन्द्र प्रसाद उनके संपर्क में आए और उनके विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए। 1917 के चंपारण सत्याग्रह में उन्होंने गांधीजी का पूरा साथ दिया। यही वह समय था जब उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना जीवन देश की सेवा के लिए समर्पित कर देंगे। उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इन आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। कठिनाइयों और यातनाओं के बावजूद उनका मनोबल कभी कमजोर नहीं पड़ा। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे और संगठन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका व्यक्तित्व अत्यंत शांत, विनम्र और संतुलित था, जिससे वे सभी वर्गों के लोगों में लोकप्रिय थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब संविधान सभा का गठन हुआ, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को उसका अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने संविधान निर्माण की प्रक्रिया को धैर्य और कुशलता से संचालित किया। 26 जनवरी 1950 को भारत के गणराज्य बनने पर वे देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने 1950 से 1962 तक सेवा की। वे अब तक के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले राष्ट्रपति रहे हैं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने संविधान की मर्यादा को बनाए रखा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया। उनका जीवन अत्यंत सादा था; वे राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी सामान्य जीवन शैली अपनाते थे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एक कुशल लेखक भी थे। उन्होंने ‘आत्मकथा’, ‘भारत विभाजित’ (India Divided) जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ लिखीं, जिनमें उनके विचारों और अनुभवों का वर्णन मिलता है। उनकी लेखनी में गहराई, स्पष्टता और राष्ट्र के प्रति समर्पण झलकता है। वे शिक्षा और ग्रामीण विकास के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि देश की उन्नति का आधार गाँवों की प्रगति में निहित है।

उनकी सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें 1962 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे। 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हो गया। उनके निधन से देश ने एक महान सपूत को खो दिया।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और विनम्रता में होती है। वे भारतीय लोकतंत्र की मजबूत नींव रखने वाले नेताओं में से एक थे। उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।

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