भारतीय पुनर्जागरण के इतिहास में स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती का नाम एक ऐसे कर्मठ योद्धा के रूप में अंकित है, जिन्होंने अपनी लेखनी, वाणी और कर्म से सोए हुए राष्ट्र को जगाने का कार्य किया। 22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर जिले में जन्मे मुंशीराम (बचपन का नाम) का स्वामी श्रद्धानंद बनने तक का सफर वैचारिक क्रांति और आत्म-साक्षात्कार की एक अद्भुत कहानी है। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना पूरा जीवन वेदों के प्रचार, दलितों के उत्थान और देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया।
परिवर्तनकारी जीवन यात्रा
स्वामी श्रद्धानंद का प्रारंभिक जीवन भौतिकतावादी था और वे वकालत के पेशे में सफल थे। किंतु, महर्षि दयानंद सरस्वती से हुई एक भेंट ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। उन्होंने न केवल शराब और मांस का त्याग किया, बल्कि सत्य और धर्म की राह पर चलने का कठिन मार्ग चुना। 1917 में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और 'महात्मा मुंशीराम' से 'स्वामी श्रद्धानंद' बन गए। उनका संन्यास पलायनवादी नहीं था, बल्कि वह राष्ट्र की सेवा के लिए एक नया संकल्प था।
शिक्षा में क्रांति: गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना
स्वामी श्रद्धानंद का मानना था कि जब तक भारत की शिक्षा प्रणाली स्वदेशी और संस्कारवान नहीं होगी, तब तक मानसिक गुलामी अंत नहीं होगी। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 1902 में हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के स्थान पर वैदिक शिक्षा, संस्कृत और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर जोर दिया। यह संस्थान आज भी उनके दूरदर्शी सोच का प्रमाण है, जिसने देश को ऐसे नागरिक दिए जो अपनी संस्कृति पर गर्व करते थे।
स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी जी की भूमिका अत्यंत निर्भीक रही। 1919 के रौलट एक्ट के विरोध में उन्होंने दिल्ली में आंदोलन का नेतृत्व किया। एक ऐतिहासिक घटना तब घटी जब चाँदनी चौक पर ब्रिटिश सैनिकों ने उन पर संगीनें तान दीं, तो उन्होंने निर्भीकता से अपनी छाती खोल दी और कहा—"गोली मारो"। उनकी इस वीरता को देखकर अंग्रेज सैनिक भी पीछे हट गए।
उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वे इतिहास के पहले ऐसे गैर-मुस्लिम संन्यासी बने, जिन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद के मिंबर (मंच) से वेदमंत्रों का पाठ किया और हिंदू-मुस्लिम एकता का आह्वान किया। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने जेल यात्राएं भी कीं और कांग्रेस के मंच से हमेशा सत्य की आवाज उठाई।
स्वामी श्रद्धानंद ने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए जो संघर्ष किया, वह अतुलनीय है। उन्होंने 'अछूतोद्धार' को राष्ट्र की पहली प्राथमिकता बताया। इसके साथ ही, उन्होंने 'शुद्धि आंदोलन' के माध्यम से उन लोगों को पुनः अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर दिया जिन्हें जबरन या प्रलोभन देकर मतांतरित किया गया था। वे महिला शिक्षा और नारी सशक्तिकरण के भी प्रबल पक्षधर थे।
23 दिसंबर 1926 को इस महान आत्मा का अंत एक दुखद हत्या के रूप में हुआ, लेकिन उनके विचार अमर हो गए। स्वामी श्रद्धानंद एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कभी सत्य से समझौता नहीं किया। उनके बारे में महात्मा गांधी ने कहा था कि "वे वीरता और त्याग की साक्षात मूर्ति थे।" आज भी उनका जीवन हमें सिखाता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ निर्बल की सेवा और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण है।
