भारतीय राजनीति और दर्शन के क्षेत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक ऐसे नक्षत्र थे, जिन्होंने पश्चिम के भौतिकवाद और साम्यवाद के बीच भारत की अपनी मिट्टी से उपजा 'तीसरा मार्ग' दुनिया को दिया। 25 सितंबर 1916 को राजस्थान के धानुका (जयपुर) में जन्मे दीनदयाल जी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी चिंतक, कुशल संगठनकर्ता और उच्च कोटि के पत्रकार भी थे। उनका संपूर्ण जीवन सादगी, बौद्धिक प्रखरता और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण का उदाहरण है। उनके द्वारा दिया गया 'एकात्म मानववाद' का सिद्धांत आज भी भारत के सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण का आधार बना हुआ है।
दीनदयाल जी का बचपन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। बहुत ही कम आयु में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया, लेकिन कठिन परिस्थितियों ने उनके मनोबल को और अधिक मजबूत बनाया। वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे और अपनी शिक्षा के दौरान उन्होंने कई स्वर्ण पदक और छात्रवृत्तियाँ प्राप्त कीं। छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संपर्क में आए और इसके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। उनकी सादगी का आलम यह था कि वे हमेशा धोती और कुर्ते में रहते थे और उच्च शिक्षित होने के बावजूद उनमें रंच मात्र भी अहंकार नहीं था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सबसे महत्वपूर्ण योगदान 'एकात्म मानववाद' (Integral Humanism) का सिद्धांत है। उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिमी विचारधाराएं—चाहे वह पूंजीवाद हो या समाजवाद—मानव के केवल भौतिक सुखों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जबकि भारतीय संस्कृति मनुष्य को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक 'एकीकृत योग' मानती है। उनके अनुसार, समाज और व्यक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उन्होंने एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था की कल्पना की जिसमें विकास का केंद्र बिंदु मशीन नहीं, बल्कि 'मानव' हो। इसी विचार ने भारत को एक वैकल्पिक राजनीतिक और आर्थिक दर्शन प्रदान किया।
दीनदयाल जी ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान पर जोर दिया, जिसे उन्होंने 'अंत्योदय' का नाम दिया। उनका मानना था कि राष्ट्र की उन्नति तब तक अधूरी है जब तक कि समाज का सबसे गरीब और वंचित व्यक्ति गरिमापूर्ण जीवन न जीने लगे। अंत्योदय केवल एक नारा नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की वह प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों का वितरण सबसे निचले स्तर से शुरू होता है। आज भारत सरकार की अधिकांश कल्याणकारी योजनाएं इसी 'अंत्योदय' के विचार से प्रेरित हैं।
1951 में जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की, तो दीनदयाल जी को इसका महासचिव नियुक्त किया गया। उनकी संगठनात्मक क्षमता इतनी अद्भुत थी कि डॉ. मुखर्जी ने उनके बारे में कहा था— "यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं, तो मैं भारत का राजनीतिक नक्शा बदल सकता हूँ।" उन्होंने राजनीति को सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना। इसके साथ ही, उन्होंने 'राष्ट्रधर्म', 'पाञ्चजन्य' और 'स्वदेश' जैसे पत्रों के माध्यम से वैचारिक पत्रकारिता की नींव रखी। उन्होंने 'सम्राट चंद्रगुप्त' और 'जगतगुरु शंकराचार्य' जैसी पुस्तकें लिखकर भारतीय गौरव को पुनर्जीवित किया।
11 फरवरी 1968 को मुगलसराय स्टेशन के पास एक रहस्यमयी घटना में उनका असामयिक निधन हो गया, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। यद्यपि वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी नीति-निर्माताओं और राष्ट्रभक्तों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन हमें सिखाता है कि महानता पदों से नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और कर्म की निष्ठा से आती है। वे आधुनिक भारत के उन बिरले महापुरुषों में से हैं, जिन्होंने भारतीयता के मूल तत्वों को आधुनिक संदर्भों में परिभाषित किया।
