जिस तरह से दुनिया में एआई का प्रभाव बढ रहा है, तमाम क्षेत्रों में इसका उपयोग बढ रहा है । शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक, खेती किसानी से लेकर मौसम तक विज्ञान से लेकर तकनीक तक हर जगह एआई का प्रभाव बढता जा रहा है । अंतरिक्ष में AI की क्रांति ने भारत के इसरो को नई ताकत दी है। भारत का अंतरिक्ष सफर अब न केवल स्मार्ट और तेज़ हो रहा है, बल्कि आत्मनिर्भर भी बन रहा है.. और इसकी वजह है आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी AI । मिशन की योजना से लेकर अंतरिक्ष में दिशा तय करने तक… AI अब इसरो के अंतरिक्ष मिशनों का अहम हिस्सा बन चुका है। जहां पहले हर आदेश धरती से भेजा जाता था,वहीं आज एआई की मदद से अंतरिक्ष यान खुद सोचने और फैसले लेने में सक्षम हो रहे हैं। AI से लैस सैटेलाइट्स रियल टाइम में बड़े डेटा का विश्लेषण करते हैं ।
मौसम के बदलते मिज़ाज को समझना हो यानी प्राकृतिक आपदाओं पर नज़र रखनी हो या धरती के संसाधनों की सटीक मैपिंग करनी हो AI हर काम को तेज़ और भरोसेमंद बना रहा है । चंद्रयान और आदित्य-एल1 जैसे गहरे अंतरिक्ष मिशनों में AI की भूमिका और भी अहम है। जहां धरती से संपर्क में देरी होती है, वहां AI सिस्टम खुद रास्ता तय करते हैं, खामियों को पहचानते हैं और अंतरिक्ष यान को सुरक्षित रखते हैं। धरती पर भी AI इसरो की ताकत बढ़ा रहा है। मशीन लर्निंग की मदद से तकनीकी खराबियों का पहले से अनुमान लगाया जा रहा है, जिससे खर्च घट रहा है और मिशन पूरे होने का समय भी कम हो रहा है। आने वाले गगनयान मिशन में, जहां भारतीय अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में कदम रखेंगे, वहां उनकी सुरक्षा, लाइफ सपोर्ट और आपातकालीन स्थितियों में AI की भूमिका बेहद अहम होगी। स्वदेशी तकनीक और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के साथ, भारत सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं रह रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अंतरिक्ष मिशनों का मार्गदर्शन भी कर रहा है।
जलवायु परिवर्तन के बढते प्रभावों के बीच भारत जलवायु कार्रवाई, आपदा-रोधी क्षमता और सतत विकास को मज़बूत करने के लिए AI को एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में अपना रहा है।भारत दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देशों में शामिल है। इसकी 85 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी चरम मौसम के ख़तरों के दायरे में है। परंपरागत तौर पर, जलवायु से निपटने की रणनीतियाँ पुराने आँकड़ों पर निर्भर रहती थीं और हमारी प्रतिक्रिया नुकसान होने के बाद तय होती थी लेकिन आज AI की मदद से भारत देर से कदम उठाने से आगे बढ़कर पूर्वानुमान की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। सरकार की कई प्रमुख पहलें AI को कृषि, मौसम विज्ञान, आपदा प्रबंधन और संसाधन संरक्षण से जोड़ रही हैं, जिससे विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकें।
बात देश के अन्नदाताओं को AI से जोड़ते हुए बेहतर जलवायु परिवर्तन की करें तो कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के साथ मिलकर AI आधारित स्थानीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली का परीक्षण किया है। इस तकनीक से वर्षा का अनुमान अधिक सटीक हुआ है और 13 राज्यों के लाखों किसानों को एम-किसान SMS सेवा के जरिए समय रहते जानकारी मिल रही है। इससे किसान बुवाई, सिंचाई और फसल चयन जैसे फैसले मौसम के अनुरूप ले पा रहे हैं।
मौसम और आपदा पूर्वानुमान में भी AI अहम भूमिका निभा रहा है। मिशन मौसम के तहत AI और मशीन लर्निंग की मदद से बारिश, चक्रवात, बिजली गिरना, और कोहरा जैसी घटनाओं की भविष्यवाणी पहले से ज्यादा सटीक हो रही है। भारत मौसम पूर्वानुमान प्रणाली उच्च-रिज़ॉल्यूशन मॉडल के जरिए स्थानीय स्तर तक मौसम की जानकारी पहुँचाने का प्रयास कर रही है, जिससे आपदा की तैयारी बेहतर होती है और जलवायु से निपटने की क्षमता बढ़ती है।
AI पर्यावरण संरक्षण को भी मज़बूती दे रहा है। सैटेलाइट-आधारित विश्लेषण 7.1 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले वन क्षेत्र की निगरानी करते हैं, जिससे वनों की कटाई, जंगल की आग और अवैध खनन का लगभग रियल-टाइम में पता लगाया जा सकता है। मानव-वन्यजीव के संघर्ष को कम करने के लिए वन्यजीवों की आवाजाही पर नज़र रखी जा रही है, जबकि जैव विविधता से जुड़े आँकड़े संरक्षण योजना बनाने में मदद कर रहे हैं।
भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के साथ-साथ, AI मॉडल समुद्र के स्तर में वृद्धि, तटरेखा के क्षरण और चक्रवात जोखिम का आकलन करते हैं, और तटीय क्षेत्रों में रहने ववा लोगों को जलवायु अनिश्चितता से पैदा होने वाली चुनौतियों के लिए तैयार होने में मदद करते हैं। शहरों में, AI प्लेटफ़ॉर्म वायु प्रदूषण का मानचित्रण करते हैं , भीषण गर्मी की भविष्यवाणी करते हैं और बढ़ते तापमान तथा गिरती वायु गुणवत्ता से जूझ रहे शहरों के लिए योजना तैयार करने में मदद कर रहे हैं ।
राष्ट्रीय AI मिशन के तहत भारत जलवायु समाधान के लिए AI के ज़िम्मेदार, पारदर्शी और समावेशी उपयोग पर ज़ोर दे रहा है।वैश्विक स्तर पर भी जलवायु मॉडलिंग और उत्सर्जन ट्रैकिंग के लिए AI अपनाया जा रहा है।
ऊर्जा क्षेत्र में भी स्मार्ट ग्रिड सिस्टम AI के जरिए सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन का सटीक अनुमान लगाया जाता हैं, जिससे बिजली ग्रिड अधिक स्थिर रहता है और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग बढ़ता है। वहीं पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का डीप ओशन मिशन समुद्री खनिजों की खोज और पर्यावरणीय मूल्यांकन के लिए AI और रोबोटिक्स का सहारा ले रहा है। वहीं, पुणे स्थित एक AI इनक्यूबेशन पहल के तहत जलवायु लचीलापन परियोजनाएं वाहनों से उत्सर्जन कम करने और वृक्षारोपण के जरिए कार्बन अवशोषण बढ़ाने के लिए भविष्यसूचक मॉडलिंग का प्रयोग कर रही हैं।
19–20 फरवरी 2026 को भारत ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ की मेजबानी कर रहा है, जो यह दिखाता है कि देश AI को सिर्फ आर्थिक विकास के लिए नहीं, बल्कि जलवायु समाधान, सतत विकास और वैश्विक सहयोग के लिए भी केंद्र में रख रहा है। संदेश साफ है AI का भविष्य सिर्फ स्मार्ट मशीनें नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, हरित और टिकाऊ पृथ्वी है, और इस दिशा में भारत निर्णायक कदम बढ़ा चुका है ।
