नई दिल्ली, 14 फरवरी। डाक विभाग की सचिव वंदिता कौल ने शनिवार को कहा कि डाक टिकट हमारे राष्ट्र की विरासत के लघु दूत हैं। ये टिकट भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत के प्रति नई सराहना जगाएंगे।
वंदिता कौल ने यह बात शुक्रवार को यहां के इंडियन हैबिटेट सेंटर में "भारत की कठपुतलियां" विषय पर 8 स्मारक डाक टिकटों का एक सेट जारी करने के दौरान कही। ये टिकट न केवल कठपुतलियों के पारंपरिक पहनावे और स्वरूप को उजागर करते हैं, बल्कि भारत की विविध कलात्मक पहचान और विरासत को भी संजोते हैं।
कौल ने कहा, “भारत की समृद्ध और विविध कठपुतली परंपराओं का जश्न मनाने वाले इस विशेष अंक के माध्यम से हम उन अमर कहानीकारों को सम्मानित करते हैं जिन्होंने पीढ़ियों से हमारी लोककथाओं, मूल्यों और सामूहिक स्मृति को संरक्षित रखा है। आशा है कि ये टिकट भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत के प्रति नई सराहना जगाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को इन जीवंत परंपराओं को संजोने और बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।”
इस अंक के लिए कलात्मक संदर्भ और पाठ संगीत नाटक अकादमी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दारिचा फाउंडेशन और इशारा कठपुतली थिएटर ट्रस्ट के संस्थापक दादी पुदुमजी द्वारा प्रदान किए गए हैं। पांच रुपये के इन 8 डाक टिकटों के सेट को आप देशभर के ऑनलाइन पोर्टल से खरीद सकते हैं। इस स्मारक डाक टिकट में आठ डाक टिकट शामिल हैं। इनमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट पारंपरिक कठपुतली (राजस्थान), यक्षगान सूत्रदा गोम्बेयट्टा (कर्नाटक), डांगर पुतुल (पश्चिम बंगाल), काठी कुंडई (ओडिशा), बेनीर पुतुल (पश्चिम बंगाल), पावकथाकली (केरल), रावणछाया (ओडिशा) और टोलू बोम्मलट्टा (आंध्र प्रदेश) को दर्शाया गया है।
उल्लेखनीय है कि भारत में कठपुतली कला देश की सबसे पुरानी और जीवंत कथा परंपराओं में से एक है, जो इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और कलात्मक प्रतिभा का प्रतीक है। सदियों से कुशल कठपुतली कलाकार संगीत, कथा और दृश्य कला के मिश्रण से भरपूर मनमोहक प्रदर्शनों के माध्यम से महाकाव्यों, लोककथाओं, नैतिक शिक्षाओं और सामाजिक कथाओं को जीवंत करते आए हैं।
