विजया एकादशी: कठिन लक्ष्यों की प्राप्ति और विजय का मार्ग | The Voice TV

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विजया एकादशी: कठिन लक्ष्यों की प्राप्ति और विजय का मार्ग

Date : 13-Feb-2026

 हिंदू धर्म में एकादशी व्रतों का स्थान सर्वोच्च माना गया है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'विजया एकादशी' के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी अपने भक्तों को शत्रुओं पर विजय और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करने वाली मानी गई है। चाहे वह मानसिक द्वंद्व हो, आर्थिक समस्या हो या बाहरी बाधाएं—विजया एकादशी का विधि-विधान से पालन करने पर मनुष्य को ईश्वरीय शक्ति का अनुभव होता है। भारतीय संस्कृति में यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और संकल्प की शक्ति का प्रतीक है।


पौराणिक संदर्भ और भगवान राम की विजय
विजया एकादशी का महत्व पद्म पुराण और स्कंद पुराण में विस्तार से वर्णित है। इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्री राम से जुड़ी है। त्रेतायुग में जब भगवान राम माता सीता की खोज में अपनी वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचे, तो उनके सामने विशाल समुद्र को पार करने की बड़ी चुनौती थी। तब लक्ष्मण जी के सुझाव पर श्री राम ने वकदालभ्य ऋषि से परामर्श किया।

ऋषि ने उन्हें बताया कि यदि वे अपनी सेना सहित फाल्गुन कृष्ण एकादशी का व्रत 'विजया एकादशी' के रूप में करें, तो उन्हें समुद्र पार करने और रावण पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य प्राप्त होगा। भगवान राम ने विधिपूर्वक यह व्रत किया और इसके प्रभाव से न केवल समुद्र ने उन्हें मार्ग दिया, बल्कि अंततः उन्होंने धर्म की स्थापना करते हुए रावण को पराजित किया। तब से यह एकादशी 'विजया एकादशी' के रूप में विख्यात हुई।

इस व्रत को रखने के लिए संयम और शुद्धि अनिवार्य है। व्रत का विधान दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाता है।

कलश स्थापना: एकादशी के दिन सुबह स्नान के बाद स्वर्ण, चाँदी, ताँबे या मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है। कलश को अनाज (सप्तधान्य) के ऊपर रखा जाता है।

विष्णु पूजन: कलश पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर उनकी धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य से पूजा की जाती है।

रात्रि जागरण: इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। भक्त रात भर भजन-कीर्तन के माध्यम से विष्णु जी की आराधना करते हैं।

दान और पारण: द्वादशी के दिन कलश और पूजा की सामग्री किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर दी जाती है, जिसके बाद व्रत का पारण (भोजन) किया जाता है।


विजया एकादशी का पालन करने से मनुष्य के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आध्यात्मिक रूप से यह व्रत अंतःकरण की शुद्धि करता है और व्यक्ति को अपने आंतरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ और अहंकार—पर विजय पाने में मदद करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से, एकादशी का उपवास पाचन तंत्र को विश्राम देता है और शरीर के विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालने में सहायक होता है। चंद्रमा की स्थिति के कारण इस समय जल तत्व का प्रभाव अधिक होता है, और उपवास रखने से मन को एकाग्र करना सरल हो जाता है।


आज के आधुनिक युग में, जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी अदृश्य युद्ध (तनाव, असफलता, स्वास्थ्य) से लड़ रहा है, विजया एकादशी का व्रत एक मानसिक शक्ति प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि सही रणनीति, अटूट विश्वास और आध्यात्मिक अनुशासन के बल पर किसी भी बड़ी से बड़ी बाधा को पार किया जा सकता है। यह पर्व हमें संकल्प लेने और उसे पूरा करने का साहस देता है।


विजया एकादशी का उपवास और कथा श्रवण करने मात्र से व्यक्ति के संचित पापों का नाश होता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ इस दिन भगवान पुरुषोत्तम की आराधना करते हैं, उन्हें न केवल इस लोक में यश और कीर्ति प्राप्त होती है, बल्कि मृत्युोपरांत मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। यह महापर्व हमें स्मरण कराता है कि जहाँ धर्म और सत्य का साथ होता है, वहाँ विजय निश्चित होती है।

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