भारत के पहले फील्ड मार्शल का जीवन और योगदान
के.एम. करियप्पा, भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल, न केवल भारत की स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख नाम थे, बल्कि उनके द्वारा किए गए योगदान भारतीय सेना के इतिहास में अमिट रहते हैं। 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना के पहले प्रमुख नियुक्त किए गए करियप्पा भारतीय सेना के पहले पांच सितारा अधिकारी थे। भारतीय सेना में तीन दशकों तक सेवा देने के बाद, वह 1953 में रिटायर हो गए, लेकिन उनकी सेवा और प्रभाव इसके बाद भी जारी रहा। उनका निधन 15 मई 1993 को बेंगलुरु में हुआ, और उनका जीवन हमें न केवल एक महान सैन्य नेता, बल्कि एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में हमेशा याद रहेगा।
प्रारंभिक जीवन और सेना में प्रवेश
के.एम. करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक के मदिकेरी में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा माडिकेरी सेंट्रल हाई स्कूल से हुई, और आगे की पढ़ाई उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से की थी। करियप्पा का सेना में करियर 1919 में शुरू हुआ जब उन्हें भारतीय-ब्रिटिश फौज की राजपूत रेजिमेंट में सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर कमीशन मिला। इसके बाद उन्होंने इंदौर स्थित आर्मी ट्रेनिंग स्कूल से अपनी सैन्य ट्रेनिंग पूरी की, और भारतीय सेना में एक प्रभावी अधिकारी के रूप में अपनी यात्रा शुरू की।
सेना दिवस और उनका विशेष कनेक्शन
15 जनवरी 1949, भारतीय सेना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन था। इसी दिन के.एम. करियप्पा को भारतीय सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया और ब्रिटिश शासन के बाद पहली बार भारतीय अधिकारी को कमांडर इन चीफ की जिम्मेदारी दी गई। इस दिन को भारतीय सेना के 'सेना दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इससे पहले, भारतीय सेना के प्रमुख पद पर हमेशा ब्रिटिश अधिकारी होते थे, लेकिन करियप्पा के पदभार ग्रहण करने के साथ ही यह बदल गया। इस ऐतिहासिक दिन ने भारतीय सेना में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक स्थापित किया।
फील्ड मार्शल का पद और सेवानिवृत्ति
1953 में सेना से रिटायर होने के बाद, के.एम. करियप्पा को ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारतीय राजदूत के तौर पर नियुक्त किया गया। उन्होंने अपने सैन्य अनुभव का लाभ अन्य देशों की सेनाओं को पुनर्गठित करने में भी दिया। 1986 में भारत सरकार ने उन्हें 'फील्ड मार्शल' का पद प्रदान किया, जो भारतीय सेना के सर्वोच्च सैन्य रैंक के रूप में पहचाना जाता है।
एक प्रेरणादायक कूटनीतिज्ञ और सैन्य रणनीतिकार
सेवानिवृत्ति के बाद भी, करियप्पा भारतीय सेना के विकास में अपनी भूमिका निभाते रहे। वह कर्नाटक के कोडागू जिले के मदिकेरी में बस गए, जहां उनकी जीवन यात्रा को सम्मान दिया जाता रहा। उन्हें अपने योगदान के लिए कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले, जिनमें 'ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर', 'मेंशनड इन डिस्पैचेस' और 'लीजन ऑफ मेरिट' जैसे सम्मान शामिल थे।
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान से जुड़ी एक दिलचस्प घटना
करियप्पा के जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान घटी। इस युद्ध में उनका बेटा, के.सी. नंदा करियप्पा, भारतीय एयरफोर्स के पायलट के रूप में पाकिस्तान पर हमला कर रहा था। दुर्भाग्यवश, वह पाकिस्तानी सीमा में प्रवेश कर गए और पाकिस्तानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया। जब यह जानकारी पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान तक पहुंची, तो उन्होंने करियप्पा से संपर्क किया। अयूब खान ने भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख से अनुरोध किया कि वह अपने बेटे की रिहाई के लिए हस्तक्षेप करें। करियप्पा ने इस पर कहा, "पाकिस्तान में बंद सभी भारतीय सैनिक मेरे बेटे हैं। अगर तुम मेरे बेटे को छोड़ना चाहते हो, तो सभी को छोड़ो।" इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने नंदा करियप्पा को मुक्त कर दिया, जो उनके अनुशासन और भाईचारे के प्रति गहरे विश्वास को दर्शाता है।
निष्कर्ष
फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा का जीवन भारतीय सेना और राष्ट्र के लिए एक प्रेरणा बनकर रहा। उनकी वीरता, निष्ठा और दूरदर्शिता ने भारतीय सेना को न केवल एक सशक्त सैन्य बल बनाया, बल्कि देशवासियों को संघर्ष और बलिदान की महत्ता भी समझाई। उनकी सेवाओं और कृतित्वों को हम हमेशा सम्मानित करेंगे, और उनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा।
