कल भारतीय गणतंत्र की 76वीं वर्षगांठ है। राष्ट्र अपने गणतंत्र दिवस को लेकर बहुत उत्साहित है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस की तैयारियां जोरों पर हैं। अतिरिक्त गणतंत्र का उत्सव और बसंत पंचमी साथ-साथ हैं। वैसे गणतंत्र दिवस और बसंत पंचमी एक दिन के ही उत्सव नहीं हैं। बसंत पंचमी हर बरस आती है। हवाओं में भी गंध होती है। फूलों का यौवन आकर्षित करता है। यह आकर्षण दैहिक नहीं है। शीत ऋतु विदा हो रही है और बसंत उत्सव विस्तृत हो रहा है। नदियां शांत प्रशांत होकर बह रही हैं। बसंत पंचमी सरस्वती की भी जन्मतिथि है।
आनंद का अवसर है कि भारत में दोनों उत्सव साथ-साथ आते हैं। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ की ’सरस्वती वंदना’ राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय है, ”वर दे, वीणावादिनी वर दे! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे! वर दे, वीणावादिनी वर दे।” उत्सवों के कर्मकाण्ड प्रायः सरस्वती वंदना से शुरू होते हैं। सरस्वती वाग्देवी हैं। ज्ञानदात्री हैं। सिद्धिदात्री हैं। वे सामान्य ज्ञान तो देती ही हैं। ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं, ”कवि सरस्वती की कृपा से ही बनते हैं और प्रतिष्ठित होते हैं।” भारत की स्मृतियों के भीतर भी सरस्वती बहती हैं। इसी सरस्वती के तट पर यज्ञ होते थे। गीत गाए जाते थे। ज्ञान की आराधना होती थी। ऋषियों ने सरस्वती को नदीतमा कहा है। कुछ इतिहास के विद्वान सरस्वती को कवि की कल्पना मानते हैं। लेकिन सरस्वती का पता चल चुका है। वैज्ञानिक खोजों से सिद्ध हो या न हो, सरस्वती भारत की श्रुति में और स्मृति में पहले से ज्यादा प्रवाहमान होकर बहती हैं।
बसंत का रूप मनोहारी सुंदरता में दिखाई पड़ता है। मगर स्पर्श में नहीं आता। मन करता है कि फूल की गंध का स्पर्श करूँ। रूप, रस, गंध, सौंदर्यबोध के परिणाम हैं और भारतवासियों का सौंदर्यबोध विश्व में अनूठा है। पौराणिक काल में बसंत को मदनोत्सव भी कहा गया है और मदनोत्सव कोई कर्मकाण्ड नहीं है। प्रकृति के सत्य को देखना पर्याप्त नहीं है। प्रकृति को शिव कल्याणकारी भी होना चाहिए और सत्य व शिव सौंदर्यविहीन नहीं हो सकते। सत्य सत्य है और वही शिव भी है और वही सुंदर। भारतीय सौंदर्यबोध गहरा है। ब्रह्म संपूर्णता है। ब्रह्म का बोध आनंददाई होता है और सौंदर्य का बोध अस्थाई। पूर्वज जानते थे कि सौंदर्य का आकर्षण अल्पकालिक होता है और सौंदर्यबोध भी। संस्कृत कवियों ने सौंदर्य की भावना को एकाग्रता लाने वाला बताया है। अभिनव गुप्त ने इसे दीत विधना पतीत कहा है।
हमारी दृष्टि के सामने अनेक वस्तुएं आती हैं। उनमें से कुछ हमारी भौतिक सत्ता पर अधिकार कर लेती हैं और भौतिक सत्ता का ज्ञान हवा हो जाता है। अद्वैत दर्शन के अनुसार, ”स्थूल या सूक्ष्म जगत में आत्मा की अभिव्यक्ति ही सौंदर्य है।” प्रकृति बहुरूपिया है। ब्रह्म एक है। अभिव्यक्तियां अनेक हैं। प्रकृति में रूप हैं। रंग हैं। सौंदर्य है। रस है। नाद है। गंध है। पृथ्वी सगंधा है। प्रकृति के रूप और रंग का आनंद सौंदर्यबोध देता है। बसंत की वायु नाचते, गीत गाते, डरते डरते, चुपके-चुपके हमें सहलाते हुए चली जाती है। कोयल बोलती है। कोयल की बोली आनंदित करती है। कोयल का गीत सुनाई पड़ता है। हम उन्हें छू नहीं सकते।
अरस्तू ने कला को प्रकृति की अनुकृति बताया है। भारतीय संस्कृति और दर्शन की परंपरा में ऋतुओं के रुपायन के साथ नृत्य और गीत का भी सुंदर विकास हुआ। महाभारत में संगीत का स्पष्ट उल्लेख है। अर्जुन ने इन्द्र से अस्त्र विद्या सीखी। वनपर्व के अनुसार अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा, ”मैं विराटनगर की स्त्रियों को गीत, नृत्य और वाद्य की शिक्षा दूंगा।” महाभारत में संगीत और प्रकृति की आत्मीयता साफ सुनाई पड़ती है। यहां अलग-अलग राग हैं। दिवसों और प्रहारों के भी राग हैं।
ऋग्वेद में बताया गया है कि संगीत और वाणी को सात स्वरों में मापा गया है। सरगम संगीत का माप है, स, रे, ग , म, प, ध, नी, स नाम से विख्यात भारतीय सरगम दुनिया का प्राचीनतम सुरमाप है। भारतीय रागों में प्रकृति की छटा है और छटा सुनाई भी पड़ती है। सौंदर्य को ध्वनि रूप प्रस्तुत करना बड़ा काम है। ध्वनि कान से भीतर जाती है और दृश्य आंख से। जो आंख से दर्शनीय है, उसे कान से सुनना कठिन है। लेकिन भारत में ऐसा असंभव संपन्न हो पाया।
भारत में 6 ऋतुएं हैं और प्रत्येक ऋतु का अपना राग है। भैरव, डिंडोल, मेघ, श्रीराग, दीपक तथा मालकोश मुख्य राग हैं। यहां प्रत्येक राग अर्थ देता है। जिसका विवाह पांच रागिनियों से हुआ है। इस तरह कुल 6 राग और 30 रागिनियां होती हैं। गीत संगीत की व्याख्या करना इस छोटे से आलेख में संभव नहीं है और मैं स्वयं इसका अधिकारी नहीं हूं।
भारत के संविधान निर्माताओं ने भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को ठीक से जाना था इसलिए उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप चित्र संविधान में जोड़े थे। उन्होंने संविधान की हस्तलिखित प्रति में सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र सम्मिलित किए। मुखपृष्ठ पर राम और कृष्ण तथा भाग 1 में सिन्धु सभ्यता की स्मृति वाले मोहनजोदड़ो काल की मोेहरों के चित्र हैं। भाग 2 नागरिकता वाले अंश में वैदिक काल के गुरूकुल आश्रम का दिव्य चित्र है। भाग 3-मौलिक अधिकार वाले पृष्ठ पर श्री राम की लंका विजय व भाग 4-राज्य के नीति निर्देशक तत्वों वाले पन्ने पर कृष्ण अर्जुन उपदेश वाले चित्र हैं। भाग 5 में महात्मा बुद्ध, भाग 6 में स्वामी महाबीर और भाग 7 में सम्राट अशोक के चित्र हैं। भाग 8 में गुप्त काल, भाग 9 में विक्रमादित्य, भाग 10 में नालंदा विश्वविद्यालय, भाग 11 में उड़ीसा का स्थापत्य, भाग 12 में नटराज, भाग 13 में भगीरथ द्वारा गंगावतरण, भाग 14 में मुगलकालीन स्थापत्य, भाग 15 में शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह, भाग 16 में महारानी लक्ष्मीबाई, भाग 17 व 18 में क्रमशः गांधी जी की दाण्डी यात्रा व नोआखाली दंगों में शान्ति मार्च, भाग 19 में नेताजी सुभाष, भाग 20 में हिमालय, भाग 21 में रेगिस्तानी क्षेत्र व भाग 23 में लहराते हिन्दु महासागर की चित्रावलि है।
संविधान पारण के बाद अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने कहा “अब सदस्यों को संविधान की प्रतियों पर हस्ताक्षर करने हैं एक हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति है, इस पर कलाकारों ने चित्र अंकित किये हैं, दूसरी छपी हुई अंग्रेजी व तीसरी हस्तलिखित हिन्दी की।” (संविधानसभा कार्यवाही खण्ड 12 पृष्ठ 4261) भारतीय संस्कृति और इतिहास के छात्रों के लिए संविधान की चित्रमय प्रति प्रेरक हैं।
संविधान राष्ट्र का धारक होता है। यह राजधर्म है। भारत का संविधान दुनिया के किसी भी लिखित संविधान से बड़ा है। इसके कुछ हिस्से सामान्य संविधानों से उच्च स्तरीय हैं। भारत के संविधान निर्माताओं ने देश को संघ राज्य घोषित किया था। प्रत्यक्षतया भारत राज्यों का संघ है। संघीय ढांचे को लेकर अक्सर बहस चलती है। भारत अमेरिकी संघ जैसा संघ नहीं है। अमेरिकी संघ में राज्य स्थाई इकाइयां हैं और भारत में संसद द्वारा एक राज्य को दूसरे राज्य में आधा या पूरा समाहित किया जा सकता है। संविधान के अनेक प्रसंग हैं। 26 जनवरी इसी संविधान के लागू होने की महत्वपूर्ण तिथि है। बसंत की मस्ती में संविधान के प्रसाद का सुख और आनंद लीजिए। आप सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
