भारतीय इतिहास में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने सत्ता के गलियारों को छोड़कर सीधे मिट्टी और किसान के जीवन को बदलने का मार्ग चुना। चंडीदास अमृतराव देशमुख, जिन्हें दुनिया 'नानाजी देशमुख' के नाम से जानती है, इसी श्रेणी के एक ऐसे महामानव थे, जिन्होंने आजीवन निस्वार्थ सेवा को अपना धर्म माना। उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया गया। उनका जीवन केवल एक राजनेता का जीवन नहीं, बल्कि एक राष्ट्र निर्माण की लंबी और प्रेरणादायक यात्रा है।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक आधार
नानाजी का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के एक छोटे से गाँव कदौली में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। छोटी उम्र में ही माता-पिता को खोने के बाद उन्होंने जीवन के कठोर अनुभवों को बहुत करीब से देखा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के सीकर में हुई। वे बचपन से ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से गहरे प्रभावित थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ने के बाद, उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। डॉ. हेडगेवार और श्री गुरुजी के सानिध्य में उन्होंने संगठन का कार्य सीखा और देश भर में उसे विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीति में सक्रियता और आपातकाल का संघर्ष
आजादी के बाद, नानाजी ने भारतीय जनसंघ को खड़ा करने और उसे विस्तार देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के करीबी सहयोगियों में से थे। 1970 के दशक में, विशेषकर 1975-77 के आपातकाल (Emergency) के दौरान, नानाजी का व्यक्तित्व एक सजग प्रहरी के रूप में उभरकर सामने आया। उन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए जेल की यातनाएं सही और जनता पार्टी के गठन में मुख्य सूत्रधार बने। मोरारजी देसाई की सरकार में उन्हें मंत्री पद की पेशकश की गई, लेकिन नानाजी ने इसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। उनका मानना था कि राष्ट्र निर्माण का काम केवल सत्ता के माध्यम से नहीं, बल्कि जन-सहयोग से किया जा सकता है।
एक ऐतिहासिक निर्णय: राजनीति से संन्यास
नानाजी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी मोड़ तब आया जब 1977 में, मात्र 60 वर्ष की आयु में, उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। यह भारतीय राजनीति के लिए एक विरली घटना थी। उन्होंने घोषणा की कि वे अपना शेष जीवन ग्रामीण भारत के विकास और आत्म-निर्भरता के लिए समर्पित करेंगे। राजनीति से दूरी बनाकर, उन्होंने चित्रकूट (मध्य प्रदेश) को अपनी कर्मभूमि बनाया और दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की।
ग्रामोदय: नानाजी का स्वप्न
नानाजी देशमुख का मानना था कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। उन्होंने 'ग्रामोदय' का मंत्र दिया। उनके दर्शन के मुख्य बिंदु थे:
हर हाथ को काम: गांवों में स्वरोजगार के अवसर पैदा करना।
हर खेत को पानी: सिंचाई की व्यवस्था करना ताकि कृषि लाभकारी हो।
शिक्षा: ग्रामीण बच्चों को तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करना ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
उन्होंने चित्रकूट के आसपास के 500 गांवों को गोद लिया और उन्हें मॉडल विलेज बनाने की दिशा में कार्य किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि गांवों को आत्मनिर्भर बनाया जाए, तो वे न केवल शहरों पर निर्भरता छोड़ सकते हैं, बल्कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी बन सकते हैं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में 'सरस्वती शिशु मंदिर' जैसे शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से मूल्यों पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया।
स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता का मॉडल
नानाजी ने केवल कृषि ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता पर भी विशेष जोर दिया। उनके द्वारा विकसित 'चित्रकूट मॉडल' आज भी देश भर के समाजसेवियों और नीति निर्माताओं के लिए एक अध्ययन का विषय है। उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र, कृषि विज्ञान केंद्र और ग्रामीण कुटीर उद्योगों की ऐसी श्रृंखला खड़ी की, जिससे वहां के निवासियों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ। उन्होंने हमेशा कहा था कि "दीन-दुखियों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।"
विरासत और सम्मान
27 फरवरी 2010 को नानाजी ने इस संसार से विदा ली। वर्ष 2019 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज सेवा के लिए किसी पद या शक्ति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसके लिए सेवा भाव और समर्पण की आवश्यकता होती है। आज जब भारत 'आत्मनिर्भर' बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, नानाजी के विचार और उनका 'ग्रामोदय' का मॉडल हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है।
