प्रतिवर्ष 21 फरवरी को, जिसे अक्सर वसंत पंचमी के पावन पर्व के साथ जोड़कर देखा जाता है, प्रसिद्ध हिंदी कवि, निबंधकार और उपन्यासकार सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1896-1961) की जयंती मनाई जाती है। इस गरिमामयी आयोजन के माध्यम से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। उनके द्वारा रचित क्रांतिकारी, प्रेममय और देशभक्तिपूर्ण कविताओं के कारण उन्हें छायावाद युग के एक अत्यंत प्रभावशाली स्तंभ के रूप में पहचाना जाता है। इन समारोहों के दौरान अक्सर कविता पाठ और विभिन्न साहित्यिक सम्मान कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनसे हिंदी साहित्य के प्रति उनके असीम योगदान का स्मरण किया जाता है। उनके साहित्य को केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम माना जाता है।
निराला जी का जन्म 21 फरवरी, 1899 को बंगाल प्रेसीडेंसी के मिदनापुर में हुआ था। उनके जीवन की यात्रा को संघर्षों की एक लंबी श्रृंखला के रूप में देखा जाता है, जहाँ उनके द्वारा बहुत ही कम आयु में पारिवारिक वियोग और आर्थिक अभावों का सामना किया गया। औपचारिक शिक्षा के स्थान पर उनके द्वारा स्वाध्याय को प्राथमिकता दी गई, जिसके परिणामस्वरूप उनके द्वारा हिंदी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी जैसी भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त किया गया। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को संपादन और स्वतंत्र लेखन के क्षेत्रों में उनकी सक्रियता द्वारा पहचाना जा सकता है। उनके जीवन की विषमताओं ने ही उनके भीतर के उस विद्रोही कवि को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर साहित्य की दुनिया में क्रांति ला दी।
हिंदी काव्य जगत में निराला जी को एक महान विद्रोही के रूप में याद किया जाता है क्योंकि उनके द्वारा कविता को पारंपरिक छंदों और व्याकरणिक बंधनों से मुक्त करने का साहसिक कार्य किया गया। उनके द्वारा "मुक्त छंद" (Free Verse) की शुरुआत की गई, जिसने तत्कालीन रूढ़िवादी आलोचकों के बीच व्यापक विमर्श और विरोध को जन्म दिया। उनकी रचनाओं में सामाजिक न्याय, मानवतावाद और गहन भावनात्मक अभिव्यक्तियों को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। उनके द्वारा रचित "राम की शक्ति पूजा", "सरोज स्मृति" और "कुकुरमुत्ता" जैसी कालजयी कृतियों को हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों के रूप में स्वीकार किया जाता है।
विभिन्न साहित्यिक संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा उनकी जयंती के उपलक्ष्य में सेमिनार, परिचर्चा और काव्य गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों में निराला जी के प्रगतिशील साहित्यिक दृष्टिकोण और उनके द्वारा किए गए भाषाई प्रयोगों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता है। वर्ष 2026 में आयोजित विशेष स्मरणोत्सवों के दौरान इस बात पर व्यापक चर्चा की गई कि उनकी कविताएँ किस प्रकार समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों की समस्याओं से गहराई से जुड़ी हुई थीं। उनके द्वारा रचित साहित्य ने श्रमिक वर्ग और शोषितों की पीड़ा को जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया, वह आज के समय में भी सामाजिक विषमता पर एक कड़ा प्रहार माना जाता है।
हिंदी साहित्य के विकास में निराला जी के प्रभाव को अत्यंत गहरा और अमिट माना जाता है। उनकी रचनाओं को भाषा के क्रमिक विकास में प्रमुख मील के पत्थर के रूप में स्वीकार किया जाता है। उनके द्वारा हिंदी शब्दकोश को जो विस्तार और ओज प्रदान किया गया, उसने आने वाली पीढ़ियों के लेखकों के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया। उनके स्वाभिमानी व्यक्तित्व को 'महाप्राण' की संज्ञा दी गई, क्योंकि उनके द्वारा कभी भी परिस्थितियों के आगे समझौता नहीं किया गया। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण माना जाता है कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय दिलाना और उसे स्वाभिमान से जीना सिखाना है।
