श्री गुरुजी, अर्थात् माधव सदाशिव गोलवलकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक थे। उन्होंने 1940 से 1973 तक संगठन का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में संघ का विस्तार पूरे भारत में हुआ। वे भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभावना और संगठनात्मक अनुशासन के प्रबल समर्थक थे। उनका उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करना था।
श्री गुरुजी का मानना था कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा से नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, परंपरा और मूल्यों से बनता है। उन्होंने समाज में एकता, अनुशासन और सेवा की भावना को बढ़ावा दिया। उनके विचारों का केंद्र “संगठन ही शक्ति है” की भावना पर आधारित था। उन्होंने स्वयंसेवकों को समाज सेवा, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
श्री गुरुजी आध्यात्मिक चिंतन से भी जुड़े हुए थे। उनका विश्वास था कि व्यक्ति का चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण का आधार है। उन्होंने आत्मसंयम, समर्पण और निस्वार्थ सेवा को जीवन का आदर्श बताया। उनके विचारों में भारतीय सनातन परंपरा और नैतिक मूल्यों का विशेष स्थान था।
श्री गुरुजी पर लेखन का उद्देश्य केवल उनके जीवन का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनके विचारों और आदर्शों को समझना भी है। उनके द्वारा दिया गया संगठन, सेवा और संस्कार का संदेश आज भी अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
