कुमाऊं में सांस्कृतिक लोक उत्सव है होली | The Voice TV

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कुमाऊं में सांस्कृतिक लोक उत्सव है होली

Date : 02-Feb-2026

 हिमालय की गोद में बसा कुमाऊं अंचल न केवल अपने नैसर्गिक सौंदर्य, सुदीर्घ और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के लिए भी विख्यात है, बल्कि यहां मनाई जाने वाली होली का भी अंदाज निराला है। यही वजह है कि कुमाउंनी होली की विशिष्ट पहचान है। अपना अनोखा रंग है। यहां की होली तन को ही नहीं रंगती, मन को भी उमंग से लबालब भर देती है। कुमाऊं की होली में आंचलिक विशिष्टता है। अनूठा सौंदर्य बोध है। रंग, राग और रागनियों का अदभुत समावेश है। ऋतुराज वसंत को यौवन का सूचक माना जाता है। वसंत ऋतु के आते ही समूची प्रकृति का यौवन एकाएक खिल उठता है। प्रकृति रंग -बिरंगी हो जाती है। विशिष्ट सुगंध और रंग लिए फूल खिलने लगते हैं। देश के अलग - अलग हिस्सों में लोग अपने -अपने अंदाज में वसंतोत्सव के रंग के आगोश में डूब जाते हैं। भारत के कोने -कोने में राग -रंग के उत्सव होली की धूम मच जाती है।

होली भारत के प्राचीनतम त्योहारों में शामिल है। लिहाजा होली पूरे भारत में मनाई जाती है। भारत के अलग - अलग हिस्सों में होली मनाने का अंदाज जुदा है। स्थानीय इतिहास, मान्यता और परंपराओं के मुताबिक समय और क्षेत्र के अनुसार होली का स्वरूप बदल जाता है। होली की इस विविधता को कुमाऊं अंचल में बेहतर तरीके से समझा और अनुभव किया जा सकता है। भारत के दूसरे क्षेत्रों की बनिस्बत कुमाऊं की होली का रंग कुछ अलहदा है। यहां होली महज एक दिन का पर्व नहीं बल्कि महीनों चलने वाला सांस्कृतिक लोक उत्सव है। पहाड़ के कई क्षेत्रों में पूस के पहले इतवार से रामनवमी तक होली की बैठकें जमने लगती हैं। कुमाऊं की होली के मायने हुड़दंग नहीं है। बल्कि राग-रागनियों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। परालौकिक विश्वास है। यहां की होली में स्थानीय परंपराओं, मान्यताओं और मिथकों का समावेश है। सरलता, उन्मुक्तता और आत्मीयता है। रंगों के द्वारा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रिश्ता कायम रखने की कोशिश है। लोक - मानस में निहित आस्था की सशक्त अभिव्यक्ति है।

कुमाऊं की होली में प्रत्येक कालखंड के सामाजिक इतिहास, परंपरा, धर्म और संस्कृति के गहरे रंग दिखाई देते हैं। यहां की होली के गीतों में यथार्थ और कल्पना का अनोखा मिश्रण है। कुमाऊं की होली के गीतों में भक्ति, रस, कला, माधुर्य, आमोद -प्रमोद और हँसी - ठिठोली का अदभुत समावेश है। देवताओं से जुड़े ज्यादातर होली गीतों की विषय- वस्तु पौराणिक आख्यान से जुडी है। रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंग भी होली गीतों की विषय-वस्तु बने हैं। गणेश, शिव, पार्वती की स्तुति, राधा -कृष्ण और राम - सीता द्वारा खेले जाने वाले रंग का वर्णन है। परदेस गए पति की प्रतीक्षा करती नवयौवना की भावनाएं हैं। देवर-भाभी के बीच की हंसी -ठिठोली है। कुमाउंनी होली में ब्रज और उर्दू का गहरा प्रभाव है। विशुद्ध स्थानीय भाषा -बोली में होली के गीत बहुत कम हैं। बावजूद इसके यहां की होली के गीतों में आंचलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता साफ झलकती है। देश के दूसरे हिस्सों में प्रचलित होलियों से मिलती - जुलती हुए भी कुमाउंनी होली कई मायनों में अनोखी है। कुमाउंनी होली में राग - रंग, उल्लास के साथ गीत, संगीत और नृत्य पक्ष भी जुड़ा है। होली के पदों की सामूहिक अभिव्यक्ति, नृत्य और संगीत कुमाऊं की होली को देश के दूसरे हिस्से की होलियों से अलग करती है।

कुमाऊं में होली के तीन रूप प्रचलित हैं। बैठकी होली, खड़ी होली और महिलाओं की होली। यहां पूस के महीने के पहले इतवार से बैठकी होली शुरू हो जाती है। कुमाउंनी बैठकी होली में ताल और रागों का गहरा ताल्लुक है। बैठकी होली में पूस के पहले रविवार से वसंत पंचमी तक भक्ति परख होलियां गाई जाती हैं। इन्हें 'निर्वाण' की होली कहा जाता है। निर्वाण की होली का प्रारंभ गणेश जी की स्तुति से होता है। ' गण पति को भज ले, रसिक वह आदि कहावे।' इसके बाद शिव,राम,कृष्ण और दूसरे देवी -देवताओं की स्तुति की जाती है- ' भव भंजन गुण गाऊं, मैं अपने राम को रिझाऊं।' या ' शिव सुमरिन जिन जाना, सोई तन ब्रह्म समाना।' होली के गीतों में देवताओं की दार्शनिकता और रहस्यात्मकता का वर्णन अधिक होता है- 'क्या जिंदगी का ठिकाना, फिरत मन क्यों रे भुलाना।' निर्वाण की होलियों में आध्यात्मिकता और धार्मिक भावों की प्रधानता होती है- 'वन को चले दोऊ भाई, उन्हें समझावत नाहिं।'

कुमाउंनी बैठकी होली का भी अपना अनूठा अंदाज है। यह शास्त्रीय आधार के रागों को गाने की एक पारंपरिक शैली है। बैठकी होली में हारमोनियम,तबला, ढोलकी, मजीरा और दूसरे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता है। इस होली की खासियत यह है कि इसमें शास्त्रीय गायन की अनुशासनात्मकता होती है। बैठकी होली में कुछ विशिष्ट और रसिक लोग ही हिस्सा लेते हैं। राग - रागनियों पर आधारित होने बावजूद बैठकी होली का अंदाज प्रकारांतर में सामूहिक गायन जैसा ही होता है। बैठकी होली में राग की शुद्धता से ज्यादा भावाभिव्यक्ति और जन - रंजनता को वरीयता दी जाती है। खास बात यह है कि बैठकी होलियों को गाने वाले ज्यादातर लोग शास्त्रीय संगीत के जानकार नहीं होते हैं। शास्त्रीय संगीत की बुनियादी जानकारी नहीं रखने वाले लोग भी राग - रागनियों पर आधारित होलियां बखूबी गाते हैं। होली गायन की यह शैली श्रवण परंपरा से पीढ़ी -दर- पीढ़ी चलती आ रही है। बैठकी होली राग - रागनियों के आधार पर चार अलग - अलग समयचक्रों में विभाजित है। जैसे रात्रि के प्रथम पहर में कल्याण,यमन -कल्याण,श्याम -कल्याण, केदार, हमीर, विहाग और रात्रि के दूसरे पहर में देश, विहाग, काफ़ी,जंगला काफी, तिलंग, खम्माज, झिझोटी, बागेश्री, शहना बगैरह रागों का गायन किया जाता है। तीसरे पहर राग- सहाना, बहार जैजैवन्ती, कान्हड़ा और रात्रि के चौथे पहर सुबह के वक्त परज, जोगिया, सोहनी और भैरवी गाई जाती है। दोहपर में राग - पहाड़ी,सुहा और दिन के तीसरे पहर में राग पीलू और भीम पलासी गाए जाते हैं। निर्वाण की होलियों की विषय -वस्तु आमतौर पर देवी - देवताओं से ही जुडी होती है- 'मालिक सीता- राम, सोच मन काहे को करे।'

कुमाऊं के अनेक क्षेत्रों में रामनवमी तक होलियां गाई जाती हैं। काली कुमाऊं और सोर घाटी में रामनवमी तक निर्वाण की होलियां गाए जाने की परंपरा रही है। वसंत पंचमी से होली का रंग कुछ गाढ़ा हो जाता है। इसके बाद होली के गीतों में सौंदर्य के साथ विरह, वेदना, भावुकता और आकुलता भी झलकने लगती है। होली के ज्यादातर गीत सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करते हैं । 'आयो री फागुन मास,पिया बिन हूं मैं अकेली।' या 'फागुन के दिन चार सखी री, अपनो बलम मोहे माँग हूं दे री।' परदेस गए प्रियतम की राह देखते थक चुकी प्रेयसी का सब्र जबाव देने लगता है - 'जा रे कान्हा जा, संदेशा मोरा पियु तक ले जा। आवन कह गए, अजहूं न आए, फागुन मोरा यूं ही बीती जाए।' या 'बिरहन को रंग फीको, कहूं का से मन की बतियां।' जिनके प्रियतम घर में हैं,उनको कहा जाता है - 'जावो बलम जहां रैन बिताई। ना मोसे बोलो, ना घुंघुरू खोलो, ना छुवो नरम कलाई।' या 'नथुली में उलझेंगे बाल, सिपहिया काहे जुल्फे बढ़ाए।'

शिवरात्रि से खड़ी होली शुरू हो जाती है। खड़ी होली का ग्रामीण इलाकों में प्रचलन अधिक है। इसमें आम लोगों की भागीदारी होती है। यह ढोलक, नगाड़े और मंजीरे की लय पर सामूहिक रूप से गाए जाने वाली होली है। खड़ी होली का स्वरूप नृत्यात्मक होता है। इसी वजह से इसे खड़ी होली कहा जाता है। गोल घेरे में खास पद संचालन करते हुए सामूहिक होली गायन को खड़ी होली कहते हैं। शिवरात्रि को खड़ी होली का शुभारंभ शिव जी की होली से होता है। 'जटन विराजत गंग,भोले नाथ दिगम्बर। शिव के जटन से निकसी गंगा,जा सागर में समाई।' या फिर 'तू भज ले भवानी शंकर को। भाल तिलक सिर गंग विराजे,बास कियो गिरी हिमकर को।' बाद के दिनों में दूसरे देवी - देवताओं की स्तुति में होलियां गाई जाती हैं। 'दसरथ को लछिमन बाल -जती, बार बरस सीता संग रहिए,पाप न लागो एक रती।' सुर,ताल,लय,नृत्य और भाषा- बोली के लिहाज से कुमाऊं की खड़ी होली देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित होलियों से कतई जुदा है। सामूहिक गायन शैली के चलते खड़ी होली में सुर,ताल,लय और नृत्य सभी में एक विशेष प्रकार की सादगी होती है। अधिकांश खड़ी होलियों में संगीत के स्तर पर अंतरा नहीं होता। खड़ी होली 'हां' लय से प्रारंभ होती है और धीरे - धीरे तेज होती चली जाती है। इसमें नृत्य भी हाथों की भावपूर्ण भंगिमा, सहज पद संचालन और शरीर की लचक तथा झौंक तक सीमित होता है। रंग पड़ने के साथ ही चीर बंध जाती है। 'को ए उ बांधनि चीर रघुनन्दन राजा। को ए उ खेलनि फ़ाग रघुनन्दन राजा।' या 'अच्छा हां सीता वन में अकेले कैसे रही। कैसे रही दिन-रात, सीता वन में अकेले कैसे रही।'

पूर्णमासी आते ही होली शृंगार प्रधान हो जाती है। 'तोसे पूछूं बात बहू चादर में दाग कहां लायो.......।' या 'कहो तो यैं रमि जायँ गोरी नैना तुमारे रसा भरे.......।' और

'चलत पवन ऋतु आई फागुन की। जियरा मोरा नहीं मानत री.......।' कुछ दिन बाद होली का शृंगार रस पूरे जोबन में आ जाता है। 'हो झुकि हो मोरे यार जालिम नैना तेरे। नैन बने मिसरी के कुंजे,झुरी -झुरी मरत गंवार। जालिम नैना तेरे.......।' दूसरा पक्ष भी पीछे नहीं रहता। 'तू करि ले अपनों ब्याह देवर हमरो भरोसो झने करियै .......।' कुमाऊं में होली का तीसरा रूप है - महिला होली। महिलाओं की होली का स्वरूप बैठकी या खड़ी होलियों से कुछ भिन्न है। घर - घर महिला होली की बैठकें जमती हैं। खूब स्वांग होते हैं। होलियों की धूम मचती है। महिला होली के गायन का एक निश्चित क्रम होता है। 'सिद्धि के दाता विध्न विनाशन,होली खेलैं गिरिजापति नन्दन।' कुमाऊं की होली में राग -रंग के साथ इस अंचल के धार्मिक,सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के विविध पक्ष जीवंत रूप से जुड़े हैं।

हिमालय का सान्निध्य और भौतिक पर्यावरण यहां के धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष का अभिन्न अंग है। दूसरे लोक उत्सवों की ही तरह कुमाऊं होली भी युगीन चेतना और सामाजिक सरोकारों से अभिन्न रूप से जुडी है। कुमाउंनी होली के गीत समकालीन धार्मिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का भी बखूबी चित्रण करते हैं। इन गीतों में विशिष्ट भौगोलिक और प्राकृतिक विशेषताएं भी दिखाई देती हैं। इसे कवि चारु चन्द्र पाण्डे की रचना के इस अंश से बखूबी महसूस किया जा सकता है -

'बुरुशी का फूलों को कुम कुम मारो,

डाना काना छाजि गै बसंती नारंगी।

पारवती ज्यूकि झिलमिलि चादर,

ह्यूं कि परिन लै रंगे सतरंगी।

लाल भई छ हिमांचल रेखा,

शिव जी की शोभा पिङलि दनिकारी......।'

छलड़ी के दिन स्वांग खेले जाते हैं। होलियारों की टोलियां होली गाते हुए पूरे गांव का भ्रमण करती है। ज्यादातर टोलियां गांव के मंदिरों में जा मिलती हैं। देवताओं को रंग अर्पित कर विदाई की होलियां गाई जाती हैं। 'रंग की गागर सर पै धरे ,आज कन्हैया रंग भरे.......।' रंग के साथ आशीष का दौर भी चलता है। 'गावैं,खेलैं,देवैं आसीस, हो हो हो लख रे। बरस दीवाली बरसै फ़ाग,हो हो हो लख रे। जो नर जीवैं, गावैं फ़ाग,हो हो हो लख रे।' इस मधुर - मोहिल गीत - संगीत, नृत्य वाली कुमाऊं की इस निराली होली में यहां की मिट्टी की सोंधी सुगंध है। होली के जरिए कुमाऊं के समृद्ध लोकजीवन और समृद्ध सांस्कृतिक चेतना की झलक देखी जा सकती है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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