भारत में अनेक पवित्र नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जिनमें नर्मदा नदी का विशेष स्थान है। नर्मदा भारत की पाँचवीं सबसे लंबी नदी मानी जाती है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 1312 किलोमीटर है। यह नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात से होते हुए खंभात की खाड़ी में जाकर समुद्र में विलीन होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नर्मदा को मोक्ष प्रदान करने वाली नदी कहा गया है।
हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है। यह दिन पूरी तरह मां नर्मदा को समर्पित होता है। इस अवसर पर श्रद्धालु मां नर्मदा की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं और दीपदान करते हैं। मान्यता है कि इस दिन नर्मदा की पूजा करने से जीवन के सभी दुख दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
मां नर्मदा का अवतरण कैसे हुआ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भगवान शिव मैखल पर्वत पर कठोर तपस्या में लीन थे। उसी समय भगवान शिव के पसीने से एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ। भगवान शिव ने उस कन्या का नाम ‘नर्मदा’ रखा। नर्मदा शब्द का अर्थ है—सुख प्रदान करने वाली। भगवान शिव ने मां नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति उनके दर्शन करेगा, उसका कल्याण होगा और वह पापों से मुक्त हो जाएगा।
क्यों कहलाती हैं नर्मदा मोक्षदायिनी?
नर्मदा नदी को शंकर स्वरूपा और मैखल राज की पुत्री भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं में नर्मदा को मोक्षदायिनी नदी का दर्जा प्राप्त है। कहा जाता है कि गंगा में एक बार, यमुना में तीन बार और सरस्वती नदी में सात बार स्नान करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य केवल नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
नर्मदा नदी में स्नान करना भी अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति भाव से नर्मदा में स्नान करता है, उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
इसी कारण नर्मदा जयंती का पर्व आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है, और मां नर्मदा को श्रद्धालु मोक्ष प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं।
