पुस्तक समीक्षाः महापुरुषों का योग अर्थात महात्मा गांधी | The Voice TV

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पुस्तक समीक्षाः महापुरुषों का योग अर्थात महात्मा गांधी

Date : 09-Mar-2026

मुकुंद

लेखक द्वय चित्रा वर्मा व मदन मोहन वर्मा की किताब ''गांधी जरूरी हैं'' बाजार में आई है। बकौल मदन मोहन वर्मा यह किताब लगभग चार दशक से ज्यादा के सतत अध्ययन के बाद तैयार हो पाई। उन्हें देरी का कोई अफसोस नहीं। वह कहते हैं, '' गांधी को समझना आसान नहीं। इसके लिए 132 ग्रंथों को पढ़ना पड़ा। तब समझ में आया-महापुरुषों का योग अर्थात महात्मा गांधी। '' मोहन मदन वर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में हैं। चित्रा उनकी पत्नी हैं। ख्यातिलब्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल के समग्र संग्रह को संग्रहित करने वाले साहित्यकार गोपाल गोयल कहते हैं-गांधी जरूरी हैं, अनूठी कृति है। यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन की विस्तृत कहानी को चलचित्र की तरह जीवंत करती है। लेखक द्वय ने महात्मा गांधी के समर्पण और संघर्ष को गहराई से प्रस्तुत करते हुए उनके बारे में उठी नकारात्मक धारणाओं को चुनौती दी है।'' वह कहते हैं- '' मदन वर्मा देश सेवा में अपने अनुभवों और गांधीजी के सिद्धांतों को अपनाकर महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।''

इस पुस्तक में गांधीजी के जीवन दर्शन के मूल तत्व - सत्य, अहिंसा, निर्भीकता और सत्याग्रह को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। यह किताब भौतिक निर्भरता के बजाय नैतिक उत्थान, सादा जीवन और उच्च विचार पर जोर देती है। गांधीजी के विचार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए, न कि केवल अक्षर ज्ञान, पर वृहद दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। गांधी के स्वराज को सच्चे स्वराज का अर्थ स्व-शासन बताया गया है। बापू की यह धारणा अंग्रेजी प्रणाली का अंधानुकरण नहीं करने का संदेश देती है। यह पुस्तक यह स्थापित करती है कि 21वीं सदी की संकटग्रस्त दुनिया में गांधीवादी विचार प्रकाश स्तंभ की तरह अनिवार्य हैं।

आमुख समेत 254 पृष्ठों में गुंथी इस पुस्तक में लेखक द्वय का आह्वान है- ''गांधी से हम जितनी दोस्ती करेंगे, उतने ही अच्छे इंसान बनेंगे।'' प्रस्तावना के दो शब्द में कहा गया है- ''महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत का आरम्भ तो देखा परन्तु आजादी के बाद के भारत और उसका विकास, समृद्धि, असमानता व वर्णित समस्याओं को वे नहीं देख सके। ...गांधी जी के जीवनकाल में जो समस्याएं थीं, वह आज भी भारत सहित मौजूदा विश्व में कायम ही नहीं बल्कि कई गुना बढ़ी हुई हैं और जटिल रूप ले ली हैं। ऐसे समय में हमें यह देखना जरूरी है कि गांधी के दिखाए मार्ग में इन समस्याओं का कोई समाधान है या नहीं। प्रासंगिक संदर्भ में गांधीजी के बारे में विश्व विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन ने कहा है कि आने वाली पीढ़ियां यह विश्वास करेंगी ही नहीं कि हाड़-मांस का ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर चला था। '' सर्व सेवा संघ (अखिल भारतीय सर्वोदय मंडल) सेवाग्राम (वर्धा) के अध्यक्ष चंदन पाल प्रस्तावना के मध्यम में यह टिप्पणी करते हैं कि मदन वर्मा ने गांधी जी के तीन बंदरों सहित 11 मूर्तियां स्थापित की हैं।

हरिजन सेवक संघ दिल्ली की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और पद्मश्री से अलंकृत उमाशंकर पाण्डेय का नोट है कि यह कृति न केवल पठनीय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। लेखक द्वय अपनी बात बिना लाग लपेट कर रखते हैं। उन्होंने लिखा- '' हम कोई लेखक नहीं हैं, विगत जीवन के अनुभव और गांधी जी पर पढ़ी पुस्तकों के सकारात्मक पहलू प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। '' इस पुस्तक का पहला संस्करण दो अक्टूबर 2025 को छपकर आया है। लगभग किताबों की बिक्री हो चुकी है। वर्मा दंपति द्वितीय संस्करण लाने की तैयारी कर रहा है। इस किताब में 32 अध्याय हैं। इनमें गांधी की विराटता की झलक देखने को मिलती है। इसमें उल्लेख किया गया है कि दुनिया के 100 से अधिक देशों में उनके नाम पर सड़कें और प्रतिमाएं बनी हुई हैं।

एक आदमी की सेना, गुरुदेव और गांधी, राष्ट्रपिता, वस्त्रों का त्याग, गांधी और आम्बेडकर, गांधी और भगत सिंह, बनारस में गांधी, धन और श्रम का महत्व, वसुधैव कुटुम्बकम, न्याय और वकालत, निर्लिप्त गांधी, कोई पराया नहीं, मार्मिक प्रसंग, आश्रम, गांधीः हिन्दू - मुस्लिम, शराबबंदी और गांधी, अनुकरणीय व रोचक प्रसंग, गांधी ने मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं जाने दिया, अहिंसा, क्षमा, देश की आजादी में बापू का योगदान, गांधी और जेल, आदर्श कैदी, गांधी और सुभाष, उपवास, गांधी और 55 करोड़, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी!, जलियांवाला बाग, देश विभाजन और गांधी, ओआखली, दिल्ली अनशन और महापुरुषों का योग- इस किताब के अध्याय हैं। इनकी हर लाइन में गांधी के आदर्श समाए हैं। 'माउंटबेटन का गांधी जी को वन मैन आर्मी (एक आदमी की सेना) कहना'' को पहले अध्याय में रोचक और विस्तार से बताया गया है। गांधी के महत्व को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के इन शब्दों में समझा जा सकता है-''यदि गांधी जी डेढ़ सौ साल पहले नहीं होते तो और उन्होंने वर्ण और वंश के खिलाफ आवाज नहीं बुलंद की होती तो अमेरिका का बराक ओबामा राष्ट्राध्यक्ष नहीं होता।'' इस किताब में बड़ी बात यह है कि कबीरदास की जीविका का साधन चरखा था और गांधीजी ने चरखे को पूरे देश की जीविका का साधन बना दिया।


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