शीतला सप्तमी: आरोग्यता और स्वच्छता का लोक-पर्व | The Voice TV

Quote :

"छोटा सा बदलाव ही जिंदगी की एक बड़ी कामयाबी का हिस्सा होता है"।

Editor's Choice

शीतला सप्तमी: आरोग्यता और स्वच्छता का लोक-पर्व

Date : 10-Mar-2026
भारतीय संस्कृति में ऋतुओं के बदलाव के साथ मनाए जाने वाले पर्वों का विशेष महत्व है। शीतला सप्तमी का त्यौहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन माँ शीतला को समर्पित है, जिन्हें हिंदू धर्म में आरोग्य की देवी और संक्रामक रोगों की रक्षक माना जाता है। शीतला सप्तमी न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों द्वारा निर्धारित एक स्वास्थ्य-विज्ञान भी है।

माता शीतला का स्वरूप और पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ शीतला का अर्थ है 'शीतलता प्रदान करने वाली'। उन्हें गधे की सवारी करने वाली और अपने हाथों में नीम की पत्तियां, कलश, सूप और झाड़ू धारण करने वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। स्कंद पुराण में माता शीतला का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ उन्हें संक्रामक रोगों जैसे चेचक, खसरा और त्वचा संबंधी विकारों से मुक्ति दिलाने वाली देवी कहा गया है। माता शीतला की पूजा का मुख्य उद्देश्य अपने परिवार के सदस्यों को बीमारियों से सुरक्षित रखना और आरोग्यता प्रदान करना होता है।

'बसौड़ा' और खान-पान की परंपरा
शीतला सप्तमी के दिन 'बसौड़ा' या बासी भोजन का विशेष महत्व है। इस प्रथा के पीछे की मुख्य मान्यता यह है कि सप्तमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। लोग एक दिन पहले ही यानी षष्ठी को भोजन बना लेते हैं और सप्तमी को वही शीतल (ठंडा) भोजन ग्रहण करते हैं।

भोजन की विधि: इसमें मुख्य रूप से दही-चावल, पुए, पूरी और पकवान शामिल होते हैं जो पिछले दिन तैयार किए गए होते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आयुर्वेद के अनुसार, वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय शरीर में 'पित्त' का असंतुलन हो सकता है। यह समय संक्रमण फैलने का भी होता है। शीतला सप्तमी पर बासी भोजन ग्रहण करने की परंपरा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण यह है कि यह शरीर के तापमान को नियंत्रित रखती है और पाचन तंत्र को गर्मी के लिए तैयार करती है।

सांस्कृतिक अनुष्ठान और पूजा विधि
शीतला सप्तमी के दिन महिलाएं सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत्त होकर माँ शीतला के मंदिर जाती हैं। वहां वे माँ को जल अर्पित करती हैं और उन्हें बासी भोजन का भोग लगाती हैं।

मंदिर गमन: भक्त माता शीतला को जल और ठंडी चीजें (दही, लस्सी, या ठंडे पकवान) अर्पित करते हैं।

नीम की महत्ता: इस दिन नीम की पत्तियों का विशेष प्रयोग किया जाता है। माना जाता है कि नीम के पेड़ में माता शीतला का वास होता है, इसलिए पेड़ की पूजा करना और पत्तियों को स्वास्थ्य के लिए उपयोग करना शुभ माना जाता है।

पारिवारिक कल्याण: महिलाएं इस दिन अपने बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य, लंबी आयु और समृद्धि की कामना के साथ व्रत रखती हैं।

एक वैज्ञानिक और स्वास्थ्य-परक लोक-पर्व
शीतला सप्तमी मात्र अंधविश्वास नहीं है, बल्कि यह एक स्वच्छता अभियान का रूप भी है। माता के हाथ में 'झाड़ू' इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने आसपास स्वच्छता रखनी चाहिए। जब हम घर की सफाई करते हैं, तो कीटाणु और बीमारियाँ दूर रहती हैं। माता के हाथ में 'कलश' अमृत और जल का प्रतीक है, जो जीवनदायिनी शक्ति है। वहीं, 'नीम' की पत्तियां प्राकृतिक एंटीसेप्टिक का कार्य करती हैं, जो बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से लड़ने में शरीर की मदद करती हैं।

यह पर्व हमें सिखाता है कि किस प्रकार प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर हम अपने स्वास्थ्य को बेहतर रख सकते हैं। बदलते मौसम में शरीर को अतिरिक्त गर्मी (पित्त) से बचाने के लिए ठंडे भोजन का उपभोग करना हमारे पाचन तंत्र को आराम देता है।

सामाजिक एकता का संदेश
शीतला सप्तमी का दिन सामुदायिक मिलन का भी दिन है। मंदिरों में महिलाओं का एकत्रित होना, एक-दूसरे को बसौड़ा बांटना और लोकगीत गाना, सामाजिक बंधनों को और मजबूत करता है। यह त्योहार हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखने और उन प्राचीन प्रथाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है जो आज के आधुनिक युग में भी स्वास्थ्य के नजरिए से प्रासंगिक हैं।

RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload









Advertisement