रविदास जयंती 2026: समानता, भक्ति और सामाजिक चेतना का पर्व | The Voice TV

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रविदास जयंती 2026: समानता, भक्ति और सामाजिक चेतना का पर्व

Date : 01-Feb-2026

 रविदास जयंती 2026 को लेकर देशभर में तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो चुकी हैं। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के वाराणसी में इस अवसर पर अलग ही उत्साह देखने को मिलता है, जहाँ संत गुरु रविदास जी की जयंती अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाई जाती है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समानता और मानवता के संदेश को भी सशक्त रूप से प्रस्तुत करता है।

15वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और कवि गुरु रविदास जी ने अपना संपूर्ण जीवन समाज में फैली कुरीतियों को समाप्त करने और समानता का संदेश फैलाने में समर्पित कर दिया। वे मानते थे कि ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी मनुष्य समान हैं—चाहे वे अमीर हों या गरीब। जरूरतमंदों की सहायता करना और प्रेम, करुणा व भक्ति के मार्ग पर चलना उनके जीवन के मूल सिद्धांत थे।

रविदास जयंती 2026 की तिथि

संत रविदास जी की जयंती प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है।
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 1 फरवरी, रविवार को प्रातः 5:52 बजे से प्रारंभ होकर 2 फरवरी, सोमवार को प्रातः 3:38 बजे तक रहेगी।

इस आधार पर रविदास जयंती 1 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी। इस वर्ष गुरु रविदास जी की 649वीं जयंती श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक एकता के भाव के साथ मनाई जाएगी।

 क्यों मनाई जाती है रविदास जयंती?

रविदास जयंती संत गुरु रविदास जी के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म संवत 1337 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में माघ मास की पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसी कारण हर वर्ष माघ पूर्णिमा को उनकी जयंती मनाने की परंपरा चली आ रही है।

गुरु रविदास जी ने अपने उपदेशों और रचनाओं के माध्यम से समाज को यह शिक्षा दी कि सभी मनुष्य समान हैं और सच्ची भक्ति का मार्ग प्रेम, करुणा और मानव सेवा से होकर जाता है।

 

वाराणसी में रविदास जयंती का विशेष महत्व

वाराणसी में रविदास जयंती का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस अवसर पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु वाराणसी पहुँचते हैं। गुरु रविदास जी की प्रतिमाओं और चित्रों के साथ भव्य शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं, मंदिरों में विशेष आरती होती है और उनके भजनों व पदों का सामूहिक गायन किया जाता है।

यह पर्व न केवल भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, एकता और समानता का संदेश भी देता है, जो गुरु रविदास जी के विचारों की आज भी प्रासंगिकता को दर्शाता है।


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