भारत का सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे प्रचलित रूप से “चिकन नेक” कहा जाता है, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से देश की सबसे संवेदनशील और रणनीतिक बिंदुओं में से एक है। मात्र लगभग 22 किलोमीटर चौड़ी यह संकरी पट्टी भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर के सात राज्यों और लगभग साढ़े चार करोड़ नागरिकों से जोड़ती है। बदलते क्षेत्रीय हालात लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर चीन की आक्रामक गतिविधियां, बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और उससे उपजी अवैध घुसपैठ के बीच इस कॉरिडोर को सुदृढ़ करना अब विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यता बन चुका है। ऐसे में बिहार के किशनगंज जिले में प्रस्तावित भारतीय सेना का अग्रिम शिविर इसी दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
सिलिगुड़ी कॉरिडोर न केवल सैन्य रसद, व्यापारिक मार्गों और आपदा प्रबंधन के लिए अहम है, बल्कि यह देश की सामरिक एकता का प्रतीक भी है। इसके पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान और पूर्व व दक्षिण में बांग्लादेश की सीमाएं इसे और अधिक संवेदनशील बनाती हैं। यदि किसी भी कारण प्राकृतिक आपदा जैसे तीस्ता नदी क्षेत्र में बार-बार आने वाली बाढ़ या शत्रुतापूर्ण कार्रवाई, से इस मार्ग में व्यवधान उत्पन्न होता है, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत मुख्यधारा से कट सकता है, जिससे देश की रक्षा क्षमता पर गंभीर असर पड़ेगा।
भारतीय सेना की योजना किशनगंज के बहादुरगंज–कोचाधामन प्रखंडों में लगभग 250 एकड़ भूमि अधिग्रहित कर एक अग्रिम सैन्य अड्डा स्थापित करने की है। यह पहल असम के बामुनी, पश्चिम बंगाल के चोपड़ा और किशनगंज में नए सैन्य ठिकानों की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बहुस्तरीय खतरों के खिलाफ त्वरित तैनाती क्षमता को मजबूत करना है। भारत–बांग्लादेश–नेपाल त्रिजंक्शन के निकट स्थित किशनगंज सिलिगुड़ी कॉरिडोर के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य कर सकता है। यहां से सीमा पार गतिविधियों पर निगरानी, तस्करी पर नियंत्रण और संकट के समय मानवीय सहायता को तेज़ी से पहुंचाना संभव होगा। ये ऐसी भूमिकाएं हैं, जिन्हें भारतीय सेना ने डोकलाम गतिरोध (2017) से लेकर बिहार और बंगाल में बाढ़ राहत अभियानों तक बखूबी निभाया है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस रणनीतिक परियोजना को स्थानीय राजनीति का विषय बना दिया गया है। बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा सैन्य स्थापना पर सवाल उठाना, और अतीत में सर्जिकल स्ट्राइक (2016) व बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019) जैसी कार्रवाइयों पर संदेह जताने की पृष्ठभूमि, यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं संकीर्ण हित राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर हावी हो रहे हैं। यह विरोध भी तब हो रहा है जब वहां के स्थानीय किसानों ने पहले जमीन देने के लिए सहमति दे दी, जिलाधिकारी दफ्तर में जाकर जमीन स्थानांतरण पर हस्ताक्षर कर दिया, सेना से इसके लिए जमीन के एवज में भारी रकम ले ली और अब स्थानीय मुस्लिम सांसदों और जनप्रतिनिधियों के उकसावे के बाद सैन्य छावनी बनाने की राह में उग्र प्रदर्शन करते हुए रोड़ा बनकर खड़े हो गए हैं। यह कश्मीर में भारत के खिलाफ दुश्मन देशों के उकसावे पर होने वाले प्रदर्शन रणनीति की तरह ही बेहद चिंताजनक स्थिति बन गई है।
किशनगंज जैसे सीमावर्ती जिले में, जहां जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर पहले से ही संवेदनशीलता है, इस तरह का विरोध भारत की अखंडता के लिए प्रतिकूल संदेश दे सकता है। बांग्लादेश के करीब होने की वजह से यहां 70 फ़ीसदी से अधिक आबादी मुस्लिम है और स्थानीय मूल निवासी हिंदू समुदाय को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। लगातार घुसपैठ यहां न केवल राज्य, बल्कि देश के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। खासकर चिकन नेक के करीब होना, इसे और अधिक चिंताजनक बना रहा है। किशनगंज में जनसंख्या संरचना में आए बदलावों और बांग्लादेश से अवैध आव्रजन के आरोपों ने सुरक्षा चिंताओं को और गहरा किया है। सीमाओं की भौगोलिक जटिलता और प्रशासनिक ढिलाई ने इस समस्या को बढ़ाया है। ऐसे में सैन्य उपस्थिति न केवल सुरक्षा को मजबूती देगी, बल्कि कानून-व्यवस्था और सीमाई निगरानी को भी सुदृढ़ करेगी। यह भी उल्लेखनीय है कि जहां एक ओर असम में अवैध घुसपैठ के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए हैं, वहीं अन्य क्षेत्रों में अपेक्षित कठोरता की कमी पर सवाल उठते रहे हैं।
सैन्य छावनी का अर्थ केवल हथियारबंद सुरक्षा नहीं है। इसके साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार, आधारभूत ढांचे का विकास, सड़क और संचार सुविधाओं में सुधार तथा आपदा के समय त्वरित राहत जैसी बहुआयामी संभावनाएं जुड़ी होती हैं। 2023 की सिक्किम बाढ़ जैसी घटनाओं में सेना की भूमिका इस बात का प्रमाण है कि स्थायी सैन्य उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। एनडीआरएफ विशेषज्ञों और स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों का भी मानना है कि किशनगंज जैसे बाढ़-प्रवण क्षेत्र में सेना की मौजूदगी जान-माल की रक्षा में निर्णायक सिद्ध होगी।
खास बात ये है कि वर्तमान समय में भारत जब बांग्लादेश के साथ प्रत्यर्पण समझौतों और संयुक्त गश्त जैसे सहयोगी कदम बढ़ा रहा है, तब किशनगंज में सेना शिविर का निर्माण बिना बाधा आगे बढ़ना चाहिए। तथाकथित राष्ट्रविरोधी आपत्तियों को यदि समय रहते रोका नहीं गया, तो वे देशविरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ा सकती हैं। आज आवश्यकता है पारदर्शी संवाद, समावेशी विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अडिग प्रतिबद्धता की। सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता। किशनगंज में प्रस्तावित सेना छावनी केवल एक सैन्य ढांचा नहीं, बल्कि भारत की एकता, संप्रभुता और भविष्य की सुरक्षा का मजबूत स्तंभ है।
